नक्सलवाद पर हो कड़ा प्रहार

नक्सलवाद पर हो कड़ा प्रहार

छत्तीसगढ़ के सुकमा में सीआरपीएफ जवानों पर नक्सली हमले में 25 जवानों के शहीद होने के बाद अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या देश के शासन तंत्र की तरफ से नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्या के प्रति इसी तरह नरम रवैया अपनाते हुए सिर्फ निंदा-आलोचना का ही दौर चलता रहेगा या सरकार नक्सलाद के समूल सफाए की दिशा में कठोर कदम उठाने का साहस दिखाएगी। नक्सलियों की दरिंदगी व उनकी कायराना सोच के आधार पर यह तो स्पष्ट शब्दों में कहा जा सकता है कि नक्सलियों की कोई मानवीय विचारधारा नहीं है तथा वह बंदूक के दम पर समाज को यूं ही रक्त रंजित करते रहना चाहते हैं। ऐसे में उनके तथाकथित मानवाधिकार व उनसे जुड़े अन्य पहलुओं की चिंता करने का अब कोई औचित्य नहीं रह गया है। अब तो आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि नक्सलियों को उन्हीं की भाषा में जवाब देते हुए बड़े पैमाने पर उनके खिलाफ बल प्रयोग का सहारा लिया जाए तथा नक्सलवाद की जड़ें काट दी जाएं। वैसे तो देश की राजनीतिक बिरादरी में भी कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने निहायत राजनीतिक फायदे के लिये नक्सलियों के प्रति नरम सोच रखते हैं। उन्हें देश, समाज व भारतीय मानव जीवन की कोई चिंता नहीं है तथा नक्सलियों के साथ उनकी सांठ-गांठ की चर्चा आए दिन होती रहती है। साथ ही देश में ऐसे कुछ और लोग भी हैं जो नक्सलियों की तरफदारी करते हुए कई बार गलत तर्कों व तथ्यों का सहारा लेते हैं। साथ ही भारत को रक्तरंजित करते रहने के लिये नक्सलियों को चीन सहित भारत विरोधी अन्य देशों से आर्थिक व सामरिक मदद मिलती रहती है। यह बात सरकार को भी मालुम है। लेकिन देश की सत्ता में आसीन लोग अपनी नाकामी व दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव के चलते नक्सलियों के खिलाफ ठोस कदम नहीं उठा पा रहे हैं। देश में जब भी कहीं नक्सली हमला होता है तो उक्त हमले को नक्सलियों की कायराना हरकत बताकर या हमड़े की कड़ी निंदा का राग अलापकर या अब आर-आर की लड़ाई का दंभ भरकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है।
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 हीं दूसरी ओर नक्सली सरकार की इस अविवेकपूर्ण सोच व दिशाहीन रणनीति से भलीभांति वाकिफ हैं। यही कारण है कि किसी भी नक्सली हमले को अंजाम देने के दुस्साहसिक कदम पर उन्हें जरा भी डर या अफसोस का एहसास नहीं होता है। सुकमा में नक्सलियों द्वारा सीआरपीएफ जवानों की हत्या करने के बाद नक्सलियों द्वारा उनमें से कई के प्राइवेट पार्ट्स काट लिए जाने का जो खबरें सामने आ रही हैं वह रोंगटे खड़े कर देने वाली व खून खौलाने वाली हैं। देश भर में इस नक्सली हमले को लेकर जनाक्रोश साफ दिखाई दे रहा है लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस व त्वरित कदम उठाने के बजाय पूरी प्रक्रिया सिर्फ सरकारी खानापूर्ति के तौर पर ही चल रही है। इससे सत्ता की संवेदनहीनता का अंदाजा बड़ी आसानी के साथ लगाया जा सकता है। वैसे एक बात तो तय है कि नक्सली मानवता विरोधी होने के साथ-साथ आदिवासियों के विकास विरोधी भी हैं। क्यों कि नक्सल प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों में अगर बड़े पैमाने पर विकास कार्य कराए जाएं तो इससे क्षेत्रीय जनमानस को काफी फायदा होता है। उनके जीवन स्तर में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ उनमें चेतना का भी संचार होता है। नक्सलियों को यही बात रास नहीं आ रही है। क्यों कि उन्हें लगता है कि अगर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लोग आर्थिक व सामाजिक रूप से संपन्न हो जाएंगे तो उनकी हम पर से निर्भरता कम हो जाएगी तथा हमारा वजूद खत्म हो जाएगा।
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यही कारण है कि नक्सली हमेशा यज्ञ को भंग करने वाले राक्षसों की तर्ज पर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में होने वाले विकास कार्यों को बाधित करते रहते हैं। फिर चाहे वह सडक़ निर्माण हो या स्कूल भवन का निर्माण। हर जन हितैषी कार्य में नक्सलियों को अपने वजूद के लिये खतरा नजर आता है। चूंकि वह मानवता विरोधी सोच के चंगुल में फंसे हुए हैं तथा नर संहार उनकी फितरत का हिस्सा है। उनमें नैतिक मूल्यों का तो अकाल ही पड़ा रहता है। ऐसे में वह अंदर से बहुत डरे हुए रहते हैं तथा ईष्र्या और अवसाद से ग्रस्त रहकर वह आये दिन मासूम लोगों पर हमले या अन्य नक्सली गतिविधियों को अंजाम देते रहते हैं। सरकार के पास नक्सलवाद से निपटने की न तो कोई स्पष्ट रणनीति है और न ही इच्छाशक्ति है। सत्ता में आसीन लोग तो बस किसी भी समस्या के समाधान के मामले में हवा हवाई बातें तथा कागजी खानापूर्ति करना ही जानते हैं तो फिर नक्सलवाद के मामले में भी यही हो रहा है। सरकार को चाहिये कि वह अब दुविधा व सुविधा से पूरी तरह मुक्त होकर नक्सलवाद के समूल सफाए का साहस दिखाए । इसके लिये उसे भले ही बड़े पैमाने पर बल प्रयोग व आर्मी के इस्तेमाल का निर्णय क्यों नहीं लेना पड़े। सरकार अगर सही मायने में देश के मासूम लोगों व सुरक्षा बलों के जवानों की हितचिंतक है तो फिर अब नक्सलवाद पर कड़ा प्रहार किया ही जाना चाहिये। -सुधांशु द्विवेदी

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