नई पीढ़ी में नशाखोरी की प्रवृत्ति..नशे के जाल से बचकर रहें युवा..!

नई पीढ़ी में नशाखोरी की प्रवृत्ति..नशे के जाल से बचकर रहें युवा..!

 वर्तमान में हमारे समाज में विशेषकर नई पीढ़ी में नशाखोरी की प्रवृत्ति घातक रूप से बढ़ रही है। शराब या बीयर पीना तो जैसे आधुनिक कहलाने का एक मानदण्ड बन गया है। इसके साथ ही चरस, अफीम, हशीश, हेरोइन, ब्राउन सुगर, भांग, गांजा और कैंसर के मूल धूम्रपान व पान मसाला का भी प्रचलन एक संक्रामक रोग के रूप में दिन प्रतिदिन फैलता जा रहा है। अनेक कड़े कानूनों एवं डॉक्टरों की चेतावनी के बावजूद भी इनका प्रयोग कम नहीं हो रहा है।
आजकल टी. वी. आदि में जो विज्ञापन आते हैं, उनका भी इस दृष्प्रवृत्ति को बढ़ाने में काफी योगदान है। बड़े-बड़े लोकप्रिय सिने कलाकार इन मादक द्रव्यों का सेवन करते हुए मात्र दिखाई ही नहीं देते बल्कि कपटपूर्ण भाषा में इनके कृत्रिम गुण भी बताते हैं। यह दुष्ट परम्परा मात्र मादक पदार्थों तक ही सीमित नहीं है। नकली सौन्दर्य प्रसाधनों एवं उत्तेजक दवाइयां भी प्रचारित की जा रही है। काम शक्ति बढ़ाने के कृत्रिम साधनों एवं दवाईयों का भी खुलकर प्रचार हो रहा है। ये सब कार्य नई पीढ़ी को पतन के घोर अंधकार की ओर ले जा रहे हैं।
हमारा दायित्व:- हमें अपने परिवार के नवयुवकों को इनके जाल से बचाने के लिए बड़ी सावधानी से सतर्क रहना है। यहां कुछ उपाय दिये जा रहे हैं।
– अपने परिवार के नवयुवकों के साथ मधुर संबंध स्थापित करना तथा घर का वातावरण प्रेममय व आध्यात्मिक बनाना।
– हमारा लड़का जितनी देर घर से गायब रहता है, इसका पता लगाना।
– वह किन लोगों के साथ उठता बैठता है, उनका चरित्र व पेशा क्या है। इसकी गुप्त रूप से जानकारी रखना।
– हमारे लड़के की आदतों में कोई अस्वाभाविक परिवर्तन तो नहीं हो रहा है।
– उसके विद्यालय आने जाने या खेल आदि का समय निर्धारित करना।
– कभी-कभी सपरिवार अच्छी फिल्म देखने व सत्संग में ले जाना।
– परिवार का अभिभावक स्वयं नशे से मुक्त रहे।
– यदि जरा भी संदेह हो तो डॉक्टर से जांच कराने हेतु नशा मुक्ति केन्द्रों में ले जाना तथा हर नशे की बुराइयों से परिचित कराना।
यहां नशा करने के कतिपय दुष्परिणामों का उल्लेख किया जाता है।नाखूनों की देखभाल…नियमित रूप से करें मेनीक्योर ..!

मदिरा:-
– मदिरा शब्द मद से बना है, जिसका सीधा अर्थ है हमारे मद या अहम् को जगा देना। जब मदिरा का नशा चढ़ता है तो फिर व्यक्ति अपने को ही सब कुछ समझ कर अमर्यादित हो जाता है।
– मदिरा सेवी उन्मत होकर निर्लज्ज बन जाता है। समाज में सम्मान समाप्त हो जाता है।
– यह व्यक्ति के अशुभ भावों को जगाती है।
– व्यक्ति इसे नहीं पीता बल्कि यही उसे पीकर खोखला कर देती है।
– रक्तचाप एवं मधुमेह की यह जननी है।
– इससे पक्षाघात और हृदयाघात का खतरा 90 प्रतिशत बढ़ जाता है।
– लिवर खराब कर यह रक्त को दूषित एवं पाचन क्रिया को नष्ट कर देती है।
– व्यक्ति विवेक शून्य होकर पागलपन की सीमा तक बढ़ जाता है तथा अकर्मण्य बन जाता है।
भांग और अफीम:-
– भांग सबसे पहले बुद्धि पर प्रहार करती है।
– पाचन शक्ति खराब कर के बवासीर, वायु विकार, गठिया आदि को जन्म देती है।
– व्यक्ति सर्वदा निद्रा व आलस्य के वशीभूत हो जाता है तथा मोटापा बढ़ाता है।
– अफीम व्यक्ति को पूर्णतया निष्क्रिय बना देती है। अफीम को छोड़ वह और कुछ सोच ही नहीं सकता है।
– पाचन शक्ति एकदम नष्ट हो जाती है।
– रक्त में कोलेस्ट्रोल बढ़ जाता है। व्यक्ति मधुमेह से ग्रस्त हो जाता है।
हेरोइन:-

– अगर किसी का घर बरबाद करना है तो उसे हेरोइन का सेवन करना सिखा दीजिए।
– उपर्युक्त सारी विकृतियां तो आ ही जाती हैं। समय पर हेरोइन न मिलने से उसे दारूण वेदना होती हैं। वह इसको प्राप्त करने के लिए घर गृहस्थी ही नहीं बेच देता बल्कि चोरी, छिनताई, हत्या ऐसे जघन्य अपराधों को करने में भी संकोच नहीं करता है।
गुटखा:-
– यह मीठा जहर है।
– मुख, जीभ, फेफड़ों के दारूण रोग कैंसर का यही जन्मदाता है।
– जबान की स्वाद लेने की क्षमता समाप्त हो जाती है।
– दांत कमजोर व विकृत हो जाते हैं।
– पाचन शक्ति नष्ट हो जाती है।
– रक्त दूषित हो जाता है।बढ़ती उम्र में लाभदायक है सेब..याददाश्त भी रखता है बरकरार ..!
– मुख की मांसपेशियां अपनी क्षमता खो देती है।
कामोत्तेजक दवाइयों एवं सौन्दर्य प्रसाधनों का सच:- आयुर्वेद जैसी अमृतमयी चिकित्सा पद्धति को बदनाम करने वाले कतिपय स्वार्थी चिकित्सक व हकीम बड़े ही आकर्षक ढंग से ऐसी दवाइयों के विज्ञापन निकालते हैं। ऊपर अवश्य लिखा रहता है कि ये औषधियां शतप्रतिशत आयुर्वेदिक है और इनके सेवन से कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है पर उसमें न तो शास्त्रीय जड़ी बूटियां रहती है और न सेवन करने वाला विपरीत प्रभावों से बच पाता है क्षणिक उत्तेजना को बढ़ाने वाली ये औषधियां कालान्तर में पौरूष शक्ति को ही समाप्त कर देती है।
यही स्थिति कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों की है। कोई कम्पनी अपनी विशेष औषधि के विषय में प्रचार करती है कि सात दिन में रंग गोरा हो जाता है और चेहरे पर कान्ति आ जाती है पर विज्ञान के अनुसार प्राकृतिक वर्ण को कोई बदल नहीं सकता है। इनके सेवन से कालान्तर में त्वचा रूखी हो जाती हैं पर नामी सिने कलाकार इनका प्रचार कर रहे हैं और दूरदर्शन इन्हें दिखा रहा है। आज राष्ट्र निर्माण का जिन पर दायित्व है, वे ही दुष्प्रवृत्तियों को बढ़ा रहे हैं। जब कुएं में भांग पड़ी हो तो कौन-कौन बच सकता है। हां, इनसे मुक्ति पाने के लिए नवयुवकों में योग, ध्यान, अध्यात्म एवं धार्मिक शिक्षा का व्यापक प्रचार हो तथा इन सबसे बढ़कर अपनी संकल्प शक्ति को दृढ़ करें।
– पुष्डकरलाल केडिया

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