देश को चाहिए ‘कैशलेस क्रांति’

देश को चाहिए ‘कैशलेस क्रांति’

 आजादी के बाद देश में नव-प्रवर्तन की लहर चली, सामाजिक समरसता के साथ-साथ विकास की गाथा चरमोत्कर्ष पर पहुंची। इसी पराक्रम में हरित क्रांति, श्वेत क्रांति, अक्षर क्रांति, नीली क्रांति और कौशल क्रांति का परचम लहराया। बतौर अब अर्थक्रांति के बाद संचार क्रांति के सहारे देश को ‘कैशलेस क्रांति’ चाहिए। क्या हम इसके पहरेदार बनकर देश को लाभ पहुंचाएंगे ? या निरकुंश तंत्र की भांति अंतर्कलह में गमगीन रहेंगे? चाहे जो भी हो, कैशलेस भारत का आगाज हो गया है तो हम क्यों पीछे रहें। फिर देर किस बात की, चलिए हम सब नकद-रहित लेन-देन की दिशा में आगे बढें और आज ही नकद-रहित बैंक सेवाओं का इस्तेमाल शुरू करें। बेहतर भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ लडाई के लिए कैशलेस भुगतान को अपनाएं। चिल्लर की किल्लत, कमीशनखोरी, जमाखोरी और करचोरी पर लगाम लगाने के वास्ते कैशलेस क्रांति का अग्रदूत बनें। एक अनुमान के मुताबिक आज भारत में 98 फीसदी नकद और दो फीसदी लेन-देन ही कैशलेस हैं। हालांकि भविष्य में यह स्थिति नहीं रहेंगी क्योंकि सरकार ने कैशलेस सोसाइटी की तरफ कदम बढा दिया है।
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अभीभूत कैशलेस सोसाइटी बनने की दिशा में महत्वपूर्ण उपाए करने होंगे। जिनमें टेलीकॉम कनेक्टिविटी, वाई-फाई सुविधा फ्री, बिजली की समुचित व्यवस्था, बैंकों का विकेंद्रीकरण, यंत्रों और मोबाइल के दामों में रियायतें और नवीनतम टेक्नोलॉजी का संजाल बिछाना आदि। इससे स्थानीयता, सहजता, उपयोगिता और सुरक्षा को बढावा दिया जा सकेगा। खासतौर पर परिचालन तकनीकी परामर्श, सहयोग और डिजीटल साक्षरता का आत्मसात अंतिम छोर तक हर-हाल में मुहैया हो। फलीभूत ही आच्छादित परिणाम परिलच्छित होंगे। गौरतलब है कि, भारत में चीन के बाद सबसे ज्यादा लगभग 70 करोड़ स्मार्टफोन यूजर है। इंटरनेट यूजर्स की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। इस समय देश में 45 करोड इंटरनेट यूजर्स हैं। 2020 तक यह संख्या 70 करोड तक पहुंचने का अनुमान है। इतनी बडी जनसंख्या अगर कैशलेस की तरफ बढती है तो कई नई कंपनियों और नये उद्यमियों को मौका मिलता है कि वे अपना कामकाज फैलाएं। डिजीटल इंडिया के मार्फत युवाओं को रोजगार से जोडें। यह बहुयामी अवसर बड़े दिनों बाद मिला है, इसे दोनों हाथों से लपकना वक्त की नजाकत है। निश्चित तौर पर कैशलेस अभियान भ्रष्टाचार मुक्ति के आगाज के साथ हर हाथ को काम दिलाने में मील का पत्थर साबित होगा। देश में कैशलेस व्यवस्था को लेकर जुबानी जंग छिडी हुई है। कोई इसे बर्बादी का सबब तो कोई दमन और कोई इसे तुगलकी फरमान से नवाज रहा है। इतना ही नहीं तकनीकी अज्ञानता का दुखडा रोते हुए आमजन को बेमतलब उकसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है।
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 देश में कैशलेस प्रणाली को अशिक्षा, गरीबी और साम्प्रदायिकता का रंग देते हुए वर्षो पुरानी दकियानुसी का राग अलाप रहे हैं। प्रलाप, छोडो कल की बातें, कल की बात पुरानी नकद-रहित लेन-देन से होगी सबको आसानी। आज जनता बटन दबा कर वोट देती है, मोबाइल पर बात करती है और बैंकों से लेन-देन करती है। तो एटीम से डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड, प्रीपेडवॉलेट, लॉयल्टी कार्ड और आधार कार्ड से भुगतान भी कर सकती है। जरूरत है तो मौके की, साधन के सहूलियत की तथा अनुपालन के सबक की। यह सब मुनासिब होगा हमारे आपसी तालमेल और जनकांक्षा के निहितार्थ केशलेस लेन-देन को बढावा देने से। अभिनवकारी, कैशलेस या कहें प्लास्टिक मनी- मेरा मोबाइल-मेरा बैंक-मेरा बटुआ के समुचित उपयोग से निःसंदेह देश बदलेगा भी, देश आगे बढेगा भी। बजाय नुक्ताचीनी के जन-गण में कैशलेस की महत्ता, उपयोगिता और क्रियाशीलता का अलख जगाएं ना कि कैशलेस को कैशबैन का लिबास पहनाकर अपना उल्लू सीधा करने का दूषित प्रयास करें। ध्यान रहे, देश कैशलेस की राह में आगे बढ़ा, कैशबेन की नहीं, यह समझना और समझाना जरूरी हैं। मामले में बेवजह हायतौबा मचाने की कोशिश का पटाक्षेप हो, वरना ऐसे मौकापरस्त, विकास विरोधी कुंठितों को कदापि देश माफ नहीं करेगा।-हेमेन्द्र क्षीरसागर

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