देश की लाचारी है ! कुछ शहर जो बन गए हैं ट्रैफिक जाम सिटी

देश की लाचारी है ! कुछ शहर जो बन गए हैं ट्रैफिक जाम सिटी

 कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू कभी देश का गार्डन सिटी हुआ करता था पर अब वह ट्रैफिक जाम सिटी बन गया है। लगभग पूरे बेंगलुरू में सड़कों पर 12-14 घंटे ट्रैफिक जाम रहता है। ऊंचाई पर बसे इस शहर की ठंडक गाडिय़ों के निकले धुएं, अंधाधुंध भवन निर्माण और बढ़ती आबादी के कारण समाप्त हो गई है। राज्य सरकार ने 1,000 करोड़ रूपए खर्च करके बेंगलुरू के मध्य से स्टील फ्रेम पर 6.7 किलोमीटर का फ्लाईओवर बनाने की योजना बनाई पर शहरवासी उसका विरोध कर रहे हैं कि उससे शहर का सौंदर्य नष्ट हो जाएगा।
अभी कुछ ही वर्ष पहले दिल्ली से तांगे बाहर किए गए हैं। साइकिल रिक्शे अपने वजूद के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। मोटरकारों और अन्य मोटर वाहनों के प्रति इस तरह का रवैया अपनाया जा रहा है कि लोग दस-पांच मिनट की दूरी तय करने के लिए भी इनका उपयोग कर रहे हैं। बाकी समय से वाहन सड़क और फुटपाथ पर या कॉलोनी की गलियों में खड़े रहते हैं।
इससे आवागमन में सबको असुविधा होती है। यहां तक कि सैंकड़ों किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलने के लिए बनाई गई मोटर-गाडिय़ां यों रेंगती हुई चलने को बाध्य होती हैं कि पैदल यात्री इनसे आगे निकल जाते हैं।
व्यस्त समय में महानगरों में कारों और मोटरसाइकिलों के पहिए भी जाम में फंसने पर यों ही रूके रहते हैं जैसे अन्य वाहनों के पहिए। यदि पदयात्र, साइकिल और सार्वजनिक परिवहन (जिनमें बस, आटो रिक्शे और साइकिल रिक्शे भी शामिल हैं) के अनुकूल सड़कों को बनाया जाए और अनावश्यक निजी मोटर वाहनों को हतोत्साहित किया जाए तो हमारा शहरी जीवन ज्यादा सुकूनभरा हो सकता है।
इस तरह की समस्याएं सारे शहरों में हैं। यह तो अब पक्का है कि गांवों-कस्बों से भारी संख्या में लोग पहले निकट के बड़े शहर में जाएंगे और फिर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू में पैर जमाने की कोशिश करेंगे क्योंकि इन्हीं शहरों में कैरियर बन रहे हैं और इन्हीं में जीवन की विविधता मिलती है। बाकी शहर और कस्बे अभी भी 19वीं सदी में जी रहे हैं जहां अपनी मर्जी से जीना-रहना भी कठिन है। ऐसे में इन बड़े शहरों को अपने में और भीड़ को खपाना पड़ेगा। चाहे इनका सौंदर्य नष्ट हो, आने-जाने की सुविधा तो देनी ही होगी।
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हमारा समाज बाजारवादी नीतियों का यों शिकार है कि लोग बैंक से ऋण ले कर मोटर वाहन खरीद रहे हैं। किस्त दर किस्त बैंक ऋण चुकाते हुए लोग अपने जरूरी खर्चों में भी कटौती कर रहे हैं। लोग मोटर वाहन इसलिए नहीं खरीद रहे हैं कि उन्हें इनकी जरूरत है बल्कि वे इसलिए खरीद रहे हैं कि इससे उनके रूतबे में इजाफा होता है। यह संसाधनों की बरबादी नहीं तो और क्या है? हमारा समाज यों झूठी शानो-शौकत का शिकार हो कर कर्जखोरी की गिरफ्त में आ रहा है।
जैसे-जैसे सड़क पर मोटर-गाडिय़ां बढ़ रही हैं, सड़क पर मारपीट की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। ये झगड़े-फसाद इस कदर हिंसक होते जा रहे हैं कि जानलेवा हमले में बदल रहे हैं। एकदूसरे से आगे निकलने की होड़ में वाहन एकदूसरे से टकराते हैं और छोटी-बड़ी दुर्घटनाएं अंजाम पाती हैं। इनमें अपंग होने से ले कर मृत्यु तक होना साधारण बात है।
सड़क दुर्घटनाएं बीमारी की एक नई किस्म का रूप अख्तियार कर चुकी हैं। दुनियाभर में हर साल जितने लोग युद्ध में मारे जा रहे हैं उससे कहीं ज्यादा सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं। इन दुर्घटनाओं में गैर मोटर वाहनों के प्रयोगकर्ता मोटर वाहनों की चपेट में आ कर मरते हैं। शायद ही कहीं ऐसा देखा-सुना गया हो कि किसी गैर मोटर वाहन से टकराने से किसी की मृत्यु हुई या कोई गंभीर रूप से घायल हुआ हो।
नागरिकों को जरूरी सुविधाएं देने की जिम्मेदारी सरकार की है। इसके लिए सरकार व स्थानीय प्रशासन योजनाएं बनाते हैं। हर सरकार और नगर निकाय सिर्फ पैसे लूटने के लिए इस तरह की योजनाएं बनाते हैं क्योंकि सत्ताधारी नेता जानते हैं कि जब काम पूरा होगा तब फीता काटने के लिए वे होंगे नहीं। वे टैंडर जारी करते समय रिश्वत ले कर काम को भूल जाते हैं और सारी योजना व दूरदर्शिता धरी रह जाती है। यदि किसी कारण जनता का विरोध होने लगे तो हर नेता सोचता है कि पांच-दस साल में पूरे होने वाले काम में वह नाराजगी क्यों मोल ले।
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यह देश की लाचारी है कि यहां की जनता ने हर काम का जिम्मा या तो निकम्मे अफसरों पर छोड़ रखा है या टैंपरेरी राजनीतिज्ञों पर। हमारे नागरिक अपने आप तो कालोनी की वैलफेयर एसोसिएशन भी नहीं चला पाते और अधपढ़े नेताओं से उम्मीद करते हैं कि वे शहर को चमका दें। शहरों को साफ रखने के लिए झोंपड़ पट्टी से ले कर भव्य भवनों तक को लोग खुद आसानी से साफ रख सकते हैं, वाहन कम खरीद सकते हैं, कम सामान फेंकने की आदत डाल सकते हैं लेकिन चूंकि विरोध करना आसान है, इसलिए वे हल्ला मचाते रहते हैं और इसी का फायदा हमारे नेता व नौकरशाह उठा रहे हैं।
हमारे शहर तभी खुशहाल हो सकते हैं जब इस शहर में रहने वाले सभी लोगों को सड़क पर समान नागरिक की हैसियत हासिल हो। लोगों को अमीर-गरीब के रूप में देखने के बजाय वाहन के प्रयोगकर्ता के तौर पर देखने की जरूरत है। यह श्रेणीकरण भी वाहनों की सुरक्षा के लिए होना चाहिए, उनके बीच भेदभाव के लिए नहीं। दुनिया के बहुतेरे देश सड़क पर लोकतंत्र की इस भावना का आदर करते हैं।
एक ही आदमी विभिन्न समयों में विभिन्न तरह का यात्री होता है- कभी पदयात्री, कभी साइकिल चालक तो कभी कार चालक या कार यात्री। वह कभी बस से सफर करता है, कभी रेल से तो कभी मैट्रो से। जब वाहन बेचने वालों की सुविधा के बजाय वाहन में सफर करने वालों की समान हैसियत की सुविधा के अनुसार सड़कें होंगी तो उनका स्वरूप अपने आप लोकतांत्रिक हो जाएगा।
-नरेंद्र देवांगन

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