देते हैं भगवान को धोखा, इन्सां को क्या छोड़ेंगे..?

देते हैं भगवान को धोखा, इन्सां को क्या छोड़ेंगे..?

 दुनियां में बहुत सारे लोग हैं जो भगवान को खुश कर अपना कोई काम निकलवाना चाहते हैं और उसमें भगवान को ठगने की कोशिश भी करते हैं। बाज नहीं आते। सांसारिक कारोबार में ठगी की ऐसी आदत पड़ गई है कि कुछ गड़बड़ किए बिना पूजा-प्रार्थना भी नहीं कर सकते।
ऐसे लोगों को खोजने के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ता। आसपास देखिए, बहुत मुमकिन है कि हम आप भी यही कर रहे हों। दुनिया के साथ ठगी, बेईमानी, धोखाधड़ी करते-करते इन्सान के साथ भी वहीं करने लगा है।
पिछले दिनों टीवी और अखबारों से मालूम हुआ कि वैष्णो देवी के मंदिर में चढ़ाए गए चांदी के छत्रों में साठ प्रतिशत मिलावट पाई गई है। इसी प्रकार गोवर्धन पर्वत पर चढ़ाने के लिए खरीदे गए दूध में साठ प्रतिशत पानी मिला रहता है। मंदिर के पास चढ़ावे के लिए जो प्रसाद मिलता है, उसमें अस्सी प्रतिशत चीनी होती है।
एक फिल्मी गीत की पंक्तियां हैं – देते हैं भगवान को धोखा, इन्सां को क्या छोड़ेंगे। असल में धर्म के नाम पर लोगों ने दुकानें खोल ली है। वे बड़े-बड़े साईन बोर्ड लगाकर भगवान का सौदा कर रहे हैं। क्यों होता है ऐसा? पहले तो कुछ लोग आंख मूंद कर सारी श्रद्धा-भक्ति किसी तथाकथित गुरु पर निछावर कर देते हैं और फिर जब पानी सर से ऊपर बहने लगता है, तब हंगामा खड़ा करते हैं।
प्यार एक बहुत ही प्यारा, बहुत ही धीमा जहर है..!

आज गुरुओं का बाजार लगा है और शिष्यों का जमघट लगा हुआ है क्योंकि शिष्य लालची हो गए हैं और गुरु उस लालच के कारोबारी या दलाल या एजेंट। किसी शिष्य को बिना परिश्रम धनवान बनना है, किसी को बिना दवा-परहेज के जटिल बीमारियों से मुक्ति पानी है, किसी को ठेका या नियुक्ति का ऑर्डर पाना है।
धर्म अफीम का नशा है और लोग धर्मांध बन जाते हैं, धर्म को अफीम की गोली की तरह खाकर। धर्म के नाम पर, ईश्वर के नाम पर हिंसा करने पर उतारू हो जाते हैं। यह कोई नई बात नहीं हैं, सदियों से ऐसा होता आ रहा है कि धर्मांध लोग हिंसक बन जाते हैं। इंसान ही तो हैवान का रूप धारण करते हैं।
अब प्रश्न यह है कि इससे कैसे बचें? भगवान को धोखा देते हैं और भक्त बनते हैं। इसलिए संतों ने कहा है, पहले भगवान को पहचानो, जानो, अनुभव करो। इसके लिए हम तलाश करते हैं कोई मार्गदर्शक, सच्चा गुरु जो अंधकार हटाकर जीवन में प्रकाश भर दे पर सच्चा गुरु, निस्स्वार्थ गुरु है कहां? वह तो चेलों के माध्यम से अपनी ख्याति फैलाने में लगा है। जिस प्रकार कपड़ा बेचने वाला बजाज कहलाता है, सोना-चांदी बेचने वाला ज्वैलर कहलाता है, अनाज बेचने वाला पंसारी होता है, उसी प्रकार धर्म और भगवान बेचने वाले गुरु आ गए हैं बाजार में।
चालीस तक पहुंचने से पहले…रखें अपना ध्यान..!

धर्म के इन ठेकेदारों ने खूब लूट मचाई है और लोगों के धन, समय, श्रद्धा विश्वास को मटियामेट किया है। हमारी ओर से भगवान के साथ धोखाधड़ी नहीं होनी चाहिए। इसका सरलतम उपाय है साक्षात अनुभूति जिससे परम सुख की प्राप्ति होती है और जीवन को सच्ची संतुष्टि मिलती है।
ज्ञान का प्रकाश जीवन में स्वयं हो जाए तो फिर हम धोखा नहीं खा सकते और जब हम धोखा नहीं खाएंगे तो भगवान को भी धोखा नहीं देंगे। भगवान तो प्रेम के भूखे हैं। श्रद्धा व विश्वास के पुष्पों से उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है।
यह खेल आखिर कब तक चलेगा कि भगवान और हममें लुकाछिपी होती रहे तथा जीवन अंधकारमय रहे। भगवान का अनुभव हो जाए, इसके लिए आवश्यकता है ज्ञान का दीप स्वयं प्रज्जवलित करने की जिससे भगवान की सच्ची भक्ति सच्चे हृदय से की जा सके।
– आर.डी. अग्रवाल ‘प्रेमी’

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