दुनिया को क्यों दहलाना चाहता है दाइश?

दुनिया को क्यों दहलाना चाहता है दाइश?

Rajeev Ranjan Tiwaआईएसआईएस यानी दाइश दुनिया को दहलाने के लिए निकल पड़ा है। सवाल यह है कि आखिर इसको वह उर्जा कहां से मिल रही है, जो चारों तरफ वह खून की नदियां बहाने पर अमादा है। सवाल अफगानिस्तान के काबुल का ही नहीं है, बल्कि दुनिया के अन्य देश भी दाइश की गतिविधियों से चिंतित हैं। आरोप तो यहां तक लग रहा है कि दुनिया को दहलाने के लिए अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश ही गोपनीय तरीके से दाइश की मदद कर रहा है। इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, यह अलग से जांच का विषय है। फिलहाल चर्चा करते हैं कि अफग़ानिस्तान के उस हज़ारा समुदाय की, जो देश का सबसे निर्धन समुदाय है। यह अफग़़ानिस्तान की कुल आबादी का 9 फीसदी है और यह इस देश का तीसरा सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। काबुल में 23 जुलाई को हुए आत्मघाती हमले में लगभग सात दर्जन इन्हीं बेगुनाहों की मौत हुई है और लगभग ढाई सौ से अधिक लोग घायल हो गए। धमाके जिस जगह पर हुए वहां हज़ारा समुदाय के हज़ारों लोग प्रदर्शन कर रहे थे। चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट यानी दाइस ने हमले की जिम्मेदारी ली है। धमाका देह मज़ांग चौक पर हुआ, जहां हज़ारा समुदाय के हज़ारों लोग विरोध प्रदर्शन के लिए जुटे थे। वो प्रस्तावित बिजली सप्लाई लाइन का रास्ता बदलने के खिलाफ मार्च निकाल रहे थे। दुनिया को दहला देने वाली इस घटना के पीछे के कारणों को जानने से पहले यदि दाइस के जन्म की चर्चा करें तो वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। बताते हैं कि इराक़ में दाइश ने क़तर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब इमारात और अमेरिका जैसे देशों की मदद से अपना प्रभाव बढ़ाया। फिर जब इराक़ी नागरिकों ने हश्दुश्शअबी नामक संगठन बनाकर सेना की मदद शुरू की तो दाइश कमज़ोर पडऩे लगा। बताते हैं कि दाइश के रूप में जो अंतरराष्ट्रीय साजि़श इराक़ और ईरान के खिलाफ़ रची गई वह अब अपनी अंतिम सांसें ले रही है, लेकिन इस आतंकी संगठन की मदद करने वाले देश अब अपनी नीतियों की बलि ख़ुद चढ़ रहे हैं, जिन्होंने अपने लक्ष्यों को साधने के लिए आतंकवाद की मदद ली। यूं कहें कि दुनिया को दहलाने के लिए दाइश अब भष्मासूर बन चुका है।
चूंकि चर्चा काबुल हमले की हो रही है, इसलिए यह बताना जरूरी है कि 1990 के दशक में तालिबान के शासन के दौरान कथित भेदभाव व हिंसा की वजह से हजारा समुदाय के हजारों लोग पाकिस्तान, ईरान व ताजिकिस्तान चले गए थे। खुद खून-खराबा करने वाला तालिबान ने 23 जुलाई को दाइश के हमले की निंदा की है, जबकि इसी तालिबान के हमलावरों ने 30 जून को काबुल के बाहर एक पुलिस दल पर हमला कर 30 कैडेट्स और कुछ आम लोगों को मार दिया था। यह हमला पुलिस एकेडेमी की बसों पर तब हुआ, जब पुलिस दल वारदाक प्रांत से काबुल की ओर जा रहे थे। गौरतलब है कि दुनिया के सबसे बेरहम आतंकी गुट आईएसआईएस ने दुनिया के कई देशों में खून की नदियां बहाई हैं। जिधर से इसके आतंकी गुजरते हैं वहां लाशों के ढेर लग जाते हैं। ये आतंकी सेना की तरह हमला करते हैं। इंसानों को जानवरों से भी ज्यादा बेरहमी से काटने वाले आतंकी दुनिया को दहशतजदा करने के लिए अपने बर्बर कारनामों के वीडियो भी बनाते हैं। दुनिया के सभी बड़े देश मान चुके हैं कि ये गुट सिर्फ एक क्षेत्र के लिए ही खतरा नहीं, बल्कि पूरी दुनिया इसकी चपेट में है। इसलिए सभी बड़े देश इसके खिलाफ लड़ाई में एकजुट हैं। इस जंग का आगाज हो चुका है और सबसे पहला हमला बोला गया है इस आतंकी गुट के नाम पर। अभी तक आईएसआईएस के नाम से मशहूर इस संगठन को दिसंबर 2014 में नया नाम दिया गया दाइश। दुनिया के ताकतवर देशों ने एलान किया कि इस संगठन को इस्लामिक स्टेट नहीं बल्कि दाइश के नाम से पुकारा जाए। दरअसल, आतंकी संगठन को इस्लामिक स्टेट कहे जाने पर सबसे पहले फ्रांस ने आपत्ति जताई थी। फ्रांस ने ही इस गुट को दाइश का नाम दिया था। अरबी भाषा में दाइश का मतलब आस्तीन का सांप या फिर वो शख्स जो अपने पैरों तले किसी को कुचलने वाला माना जाता है।
बता दें कि इराक़ का मूसिल शहर से आईएसआईएस ने अपना खूनी खेल शुरू किया था। अब इराक़ में दाइश के क़ब्ज़े वाले शहर की आज़ादी के लिए आपरेशन जारी है। फलत: मूसिल के आसपास के इलाक़े आज़ाद होते जा रहे हैं। इसमें एक विवाद का मुद्दा अमेरिका की जि़द है। अमेरिका मूसिल आपरेशन में शामिल होने के लिए अपने सैनिकों को भेजना चाहता है। इसका इराक़ में विरोध हो रहा है। इराक़ के दो प्रभावशाली नेताओं मुक़तदा सद्र और हादी अलआमेरी ने कहा है कि इराक़ को अमेरिका की मदद नहीं चाहिए। इराक इस बात के लिए दृढ़ संकल्पित है कि वर्ष 2016 में इराक़ से दाइश को खत्म कर दिया जाएगा। इराक़ की सेना अपने प्रांतों को आतंकियों से आजाद कराने के लिए अभियान चला रही है। जिन शहरों को आतंकियों के क़ब्ज़े से छुड़ाया गया है, वहां के लोगों का पुनर्वास भी जारी है। इस बीच ईरानी विदेश मंत्री जवाद जऱीफ़ ने कहा कि काबुल हमला दाइश की नीचता को दर्शाता है। अपने ट्वीटर पेज पर उन्होंने शिया-सुन्नी से चरमपंथियों के ख़िलाफ़ एकजुट होने की अपील की है। वहीं रूस के विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोफ़ ने कहा कि दाइश को हराने के लिए विश्व समुदाय को एकजुट होना चाहिए। एक जानकारी के मुताबिक दाइश का मुख्य संचालनकर्ता सद्दाम हुसैन का सैन्य अधिकारी था, जिसे सेना से निकाल दिया गया था। उसके बाद ही उसने दाइश का गठन किया। वर्ष 2003 में अमेरिका ने इराक़ पर आक्रमण के बाद सद्दाम की सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को सेना से निकाल दिया। बाद में इन्हीं सैन्य अधिकारियों ने आतंकी गुट की स्थापना की और बहुत से आतंकी गुट आकर इससे मिल गए। दाइश के ही आतंकियों ने इराक़ में सांप्रदायिक हिंसा व जातिवाद को हवा दी। हालात ये है कि मध्य.पूर्व के बारे में पश्चिम की नीतियां ही वर्तमान रक्त रंजित घटनाओं का कारण बन रही हैं।
अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में आईएस यानी दाइश का यह पहला बड़ा हमला है। शिया-सुन्नी सौहार्द के लिए मशहूर इस देश में पंथिक कलह के बीज बोने के इरादे से ये धमाके उस समय किये गये जब बड़ी संख्या में हजारा शिया समुदाय के लोग करोड़ो डॉलर की लागत से बिछायी जा रही बिजली की लाइन को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। उधर, इस्लामी रिपब्लिक ईरान के जनरल सैयद मसऊद जज़ाएरी ने दाइश के खिलाफ अमेरिकी गठबंधन को बहुत हास्यास्पद और सबसे बड़ा झूठ बताया। उनके अनुसार, अमेरिकियों ने दाइश को हथियारों के कई खेप दिए हैं। उन्होंने कहा कि यह संभावना है कि अमेरिका यह घोषणा कर सकता है कि उसने ग़लती से दाइश को हथियार दिए हैं। अमेरिका ने ज़ायोनी शासन के विरुद्ध प्रतिरोध नष्ट करने और उनमें मतभेद फैलाने की कोशिशें की हैं। अमेरिका अब भी विभिन्न समूहों के बीच मतभेद डाल लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है। अमेरिका क्षेत्र के संचार और इंटेलिजेंस सिस्टम पर पूरा वर्चस्व रखता है। इसमें दाइश के कंट्रोल वाले क्षेत्र भी हैं। अमेरिका अब भी खुल्लम खुल्ला आतंकियों का समर्थन कर रहा है और उन्हें तरह-तरह के नवीनतम हथियारों से लैस कर रहा है। बहरहाल, 23 जुलाई को जिस तरह दाइस ने काबुल में धमाके कर खूनी खेल खेला है, उससे स्पष्ट हो गया है कि उसने अब अफग़ानिस्तान में भी दस्तक दे दी है। यद्यपि वहां की सेना और पुलिस आतंकी गुट से युद्ध कर रही है, पर उसे उतनी कामयाबी नहीं मिल रही है, जितनी चाहिए। जानकारी के मुताबिक दाइश ने एक वीडियो जारी कर दिखाया है कि उसने देश के यमगान नगर में अपने झंडे को लहराए और अब अपनी गतिविधियां आरंभ कर दी है। अफग़ानिस्तान के फराह, ज़ाबुल, ग़ज़्नी, कुन्नड, ग़ौर और क़ुन्दूज़ प्रांतों में भी दाइस की उपस्थिति की रिपोर्टें मिली हैं। कहा जा रहा है कि दाइश अभी अफग़ानिस्तान में अपने सदस्य बना रहा है। इसका अर्थ यह है कि दाइश विदेशी समर्थन से अफग़ानिस्तान में अपनी स्थिति मज़बूत कर रहा है। इससे वहां के हालात और जटिल हो जाएंगे, क्योंकि तालिबान और दाइश के सदस्यों के मध्य लड़ाई छिड़ सकती है। खैर, देखते हैं कि दाइश अपना कितना विस्तार कर पाता है?
राजीव रंजन तिवारी

Share it
Share it
Share it
Top