दुनिया के अनोखे रीति-रिवाज…!

दुनिया के अनोखे रीति-रिवाज…!

‘मालद्वीप’ द्वीप समूह के निवासी अपने रिवाज के अनुसार खाना बिल्कुल अंधेरे में खाते हैं। उनका विश्वास है कि यदि किसी ने उनको खाना खाते देख लिया तो उनकी जगह उसका पेट भर जाएगा और वे खुद भूखे रह जाएंगे, अत: इसी डर के मारे वे लोग अंधेरे में पनाह ले कर और एक-दूसरे से छुपाकर खाना खाते हैं। यहां तक कि वे अपनी मां, पत्नी, बहन अर्थात् करीबी से करीबी रिश्तेदार के सामने भी खाना नहीं खाते।
नीलगिरी पर्वत के इलाके में जब किसी के घर लड़का पैदा होता है तो उसे सब से पहले घुड़साल में ले जाया जाता है और उस बच्चे को सात बार छत की तरफ और सात बार जमीन की तरफ फेंका जाता है तथा प्रार्थना की जाती है कि बच्चे और देश की गाय-भैंसों पर देवता शुभ दृष्टि रखें। फिर बच्चे को गुनगुने पानी में डाल दिया जाता है और उसके बाद उसको तेल से नहलाया जाता है।
यह सब कर चुकने के बाद बच्चे का कद नापा जाता है और उसे एक चमड़े में सी दिया जाता है जो विशेष रूप से इसीलिए होता है। एक साल बाद जब बच्चे के एक-दो दांत निकल आते हैं तो उसे आजाद कर दिया जाता है। बच्चों का वजन कराना उन लोगों में बहुत बड़ा पाप समझा जाता है।
मातो टापू के बादशाह को जब छींक आती है तो सारे देश में घोषणा कर दी जाती है। इस घोषणा के बाद ही देश के बूढ़े, जवान और बच्चे खुशी जाहिर करने के लिए डफ बजाते हैं। आमतौर पर बादशाह को साल में एक बार ही छींक आती है और इसको बहुत ही अच्छा शगुन माना जाता है।
अजवायन से घरेलू उपचार

तिब्बत के लोगों का विश्वास था कि यदि उनके यहां किसी की मृत्यु हो जाए तो वह मरने के बाद भी जिंदा रहता है,अत:वे मुर्दे की ममी बना कर किसी गुफा में छोड़ देते थे और गुफा की दांईं ओर सुराख कर देते थे ताकि आवश्यकता के अनुसार मुर्दा हवा प्राप्त कर सके। आमतौर पर तिब्बती यह विश्वास रखते थे कि मुर्दा एक महीने तक जिंदा रहता है,इसलिए उसको नियमित रूप से सूराखों के जरिए खुराक पहुंचाई जाती थी। उनका विश्वास था कि वह एक महीने तक हाथ निकाल कर अपनी पसन्द की चीज मांगता है और जब हाथ निकलना बंद हो जाता है यद्यपि यह बात विश्वास योग्य नहीं है तो उसे मृत मान लिया जाता है और एक महीने बाद सुराख बिलकुल बंद कर दिया जाता है।
डियोटायर में एक रस्म के अनुसार वहां हर साल घोड़ों का मेला लगता है। मेले के दिन छोटे मोटे अपराधियों को छूट दे दी जाती है कि वे मेले की सीमा के अंदर जो अपराध करना चाहें,कर सकते हैं लेकिन सूरज डूबने से कुछ पलों पहले उन्हें मेले की सीमा से बाहर निकल जाना पड़ता है। यदि वे ऐसा नहीं करते तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। रूमानिया में डीनेब नदी की पूजा बेहद जरूरी है और इस पूजा के लिए एक दिन निश्चित है। उस दिन रूमानिया निवासी छीनोब नदी के किनारे इकटठा हो जाते हैं और उनका पादरी चांदी की एक सूली नदी में फैंक देता हैं और सब लोग नदी में कूद कर पागलों की भांति सूली को खोजते हैं।
जब हो गले में खिचखिच…!

बाल्टिक में एक इलाका दराहलीना है। यहां के लोग घोड़े का मांस बहुत शौक से खाते हैं। ये लोग ‘याकूट’ कहलाते हैं। इनका विश्वास है कि घोड़े का मांस सब से पवित्र होता है। चार याकूट पूरा घोड़ा खा जाते हैं। यहां का रिवाज है कि जब किसी लड़की की शादी होती है तो वह घोड़े की टांगें और सिर उबाल कर चांदी के थाल में मेहमानों के सामने रखती है।
मेहमानों और विशेषकर दूल्हे के लिए जरूरी होता है कि वह सब मांस खा जाए। यदि दूल्हे ने ऐसा न किया तो अपशकुन समझा जाता है। केरल के चूराली कबीले के लोग आज के इस वैज्ञानिक युग में भी घोंसले बनाकर रहते हैं। ये लोग ट्रावनकोर की झील परयाल के चारों ओर बसे हुए हैं। ये लोग धरती को बहुत गंदा समझते हैं लेकिन इसके बावजूद भी ये लोग अपना भोजन पेड़ के नीचे की धरती पर ही बनाते हैं जिन पर उनका घोंसला होता है। परयाल झील के आस पास बड़े-बड़े पेड़ों पर बने ये घोंसले बांस और खजूर के पेड़ों व पत्तों से बनाए जाते हैं।
इनकी विवाह की रस्में काफी विचित्र हैं। किसी भी ऐसे युवक की शादी नहीं हो सकती जो अपने व्यक्तिगत घोंसले का मालिक न हो। अत: शादी से पहले युवकों को अपने लिए घोंसला बनाना होता है। यह घोंसला स्वयं दूल्हे को ही बनाना होता है।
– गुरिन्द्र भरतगढिय़ा

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