दुख से मुक्ति

दुख से मुक्ति

 भगवान बुद्ध कहते हैं, ‘दुख और भय की उत्पति इच्छा के कारण ही होती है। इच्छा से विहीन व्यक्ति दुख और भय से मुक्त रहता है।’ इसका अर्थ हुआ कि दुख का मूल कारण इच्छाएँ ही हैं। इच्छाओं के कारण ही दुख की उत्पत्ति होती है पर क्या इच्छाविहीन होना भी एक इच्छा नहीं? इच्छाओं से मुक्ति के लिए भी एक इच्छा की ज़रूरत है। इच्छाओं से मुक्ति नहीं हो सकती अत: सही इच्छाओं का चुनाव करना ज़रूरी है। महत्त्वपूर्ण इच्छारहित होना नहीं अपितु महत्त्वपूर्ण है ग़लत इच्छाओं से रहित होना और सही इच्छाओं से आप्लावित होना। इच्छाओं के मूल में होते हैं विचार अत: ग़लत विचारों अथवा नकारात्मक भावों से बचकर ही हम उचित इच्छाओं का चयन कर सकते हैं। इच्छाओं के परिष्कार एवं उदात्तीकरण के लिए अनिवार्य है विचारों अथवा भावों का परिष्कार या सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास। बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग भावों के परिष्कार द्वारा इच्छाओं का ही परिष्कार करता है। बुद्ध का सम्यक् मार्ग सकारात्मक दृष्टिकोण के विकास के लिए ही उचित आधार की सृष्टि करता है। याद रखें:
सौंदर्य वृद्धि के लिए कोई जरूरी नहीं है महंगे संसाधन..सुंदरता के लिए हंसना है जरूरी..!

– हम इच्छा रहित नहीं हो सकते
– पहले इच्छाओं को यथावत स्वीकार कीजिए। इच्छाओं को दबाने का प्रयास निरर्थक है।
– इच्छाओं का ध्यानपूर्वक अवलोकन कीजिए। फिर इच्छाओं को सही दिशा में मोडि़ए।
– इच्छाओं और वासनाओं का रूपांतरण कीजिए।
– भावनाएँ ऊर्जा का गतिमय रूप हैं।
अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है शांत नींद..!

– ऊर्जा को हम स्वयं अपने विचार से भावों में परिवर्तित करते हैं।
– यही भाव भौतिक जगत की वास्तविकता बन जाते हैं।
– विचार परिवर्तन द्वारा भावों और इच्छाओं को अपेक्षित उचित आकार दीजिए।
– इसी से भौतिक जगत में उत्तम सृजन संभव है।
इस प्रकार इच्छाओं का परिष्कार ही दुख से मुक्ति का एकमात्र उपाय है।
– सीताराम गुप्ता

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