दीर्घकालिक लक्ष्य से वंचित रह जाएंगे नीतीश कुमार

दीर्घकालिक लक्ष्य से वंचित रह जाएंगे नीतीश कुमार

देश के राष्ट्रपति चुनाव को लेकर राजनीतिक गहमा-गहमी का दौर जारी है। केन्द्र में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन द्वारा रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किये जाने के बाद विपक्षी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यूपीए ने भी कांग्रेस की राज्यसभा सांसद एवं पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया है। राष्ट्रपति पद के लिये मतदान 17 जुलाई एवं परिणाम की घोषणा 20 जुलाई को होनी है। इस दृष्टि से इस महत्वपूर्ण व रोचक चुनाव के लिये राजनीतिक जुगलबंदी व खेमेबाजी का दौर जारी है। भाजपा नेताओं द्वारा रामनाथ कोविंद की जीत का दावा किया जा रहा है तो यूपीए नेताओं को भरोसा है कि मीरा कुमार की जीत आसानी से हो जाएगी।
एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम के तहत बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी जदयू द्वारा राष्ट्रपति पद के लिये रामनाथ कोविंद को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व राज्य में लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल एवं कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाकर राज्य के विधानसभा चुनाव में आसान जीत दर्ज करने वाले नीतीश कुमार मौजूदा समय में इन दोनों ही दलों के समर्थन की बदौलत राज्य के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हैं। लेकिन नीतीश कुमार द्वारा राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए प्रत्याशी रामनाथ कोविंद को समर्थन देने के ऐलान के बाद कांग्रेस व राष्ट्रीय जनता दल सहित उन विपक्षी राजनीतिक दलों की उम्मीदों को करारा झटका लगा है जिन्होंने यह सोच रखा था कि वह नीतीश कुमार की मदद से देश में गैर भाजपाई दलों को एकजुट करके 2019 के लोकसभा चुनाव में एक मजबूत राजनीतिक विकल्प की स्थापना करेंगे। 
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हालाकि नीतीश कुमार का यह निर्णय खुद उनके लिये भी नुकसानदायक साबित हो सकता है क्योंकि ऐसी संभावना जताई जा रही थी कि बिहार की तर्ज पर महागठबंधन को राष्ट्रव्यापी स्वरूप देकर नीतीश कुमार 2019 के लोकसभा चुनाव में खुद के लिये प्रधानमंत्री पद की दावेदारी प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन अब अगर नीतीश कुमार ने राष्ट्रपति चुनाव के लिये रामनाथ कोविंद के समर्थन का ऐलान कर दिया है तो वह अपने दीर्घकालिक लक्ष्य से वंचित रह जाएंगे। क्योंकि नीतीश का यह निर्णय कांग्रेस व राष्ट्रीय जनता दल को काफी नागवार गुजरा है तथा संभावना जताई जा रही है कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद इस सियासी घटनाक्रम का असर बिहार की नीतीश सरकार के स्थायित्व पर भी पड़ सकता है। गठबंधन धर्म की विवशता के चलते कांग्रेस व राजद द्वारा भले ही नीतीश कुमार के खिलाफ अभी कुछ नहीं कहा जा रहा है लेकिन दोनों ही दलों की नाराजगी स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रही है। 
शिखा राय दक्षिणी, जयेन्द्र डबास उत्तरी और संतोष पाल पूर्वी निगम में सदन के नेता
 
अब नीतीश कुमार द्वारा विपक्षी राजनीतिक दलों से अलग रास्ता अख्तियार किये जाने के क्या सियासी नतीजे होंगे यह तो भविष्य में देखने वाली बात होगी लेकिन इससे यह तो साबित होता ही है कि मौजूदा समय में राजनीतिक दलों की कोई भी स्थायी विचारधारा व दृष्टिकोण नहीं रह गये हैं। राजनीतिक दल व उनके नेता अपनी सुविधा व हितों के हिसाब से अपना नजरिया भी निर्धारित करते रहते हैं। अब राजद व जदयू के आपसी संबंधों की ही बात करें तो आरजेडी प्रमुख लालू यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को गठबंधन में जारी बयानबाजी पर विराम लगाने के सिलसिले में फोन किया था ताकि सियासी गतिरोध व मतभेद खत्म किये जाने के साथ ही दोनों ही दलों की नेताओं की परस्पर विरोधी बयानबाजी पर अंकुश लगाया जा सके।
अब देखना यह होगा कि लालू यादव की यह पहल कितना रंग लाती है। क्योंकि नीतीश कुमार की राजनीतिक कार्य संस्कृति के आधार पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि वह अपने बयानों के माध्यम से कई बार विपक्षी राजनीतिक दलों व अपने महागठबंधन के लिये मुश्किलें खड़ी कर देते हैं। ऐसे में विपक्षी राजनीतिक दलों के मन में इस आशंका को बल मिलने लगता है कि कहीं नीतीश कुमार पाला बदलकर भाजपा के खेमे में शामिल न हो जाएं। केन्द्र की भाजपा सरकार द्वारा कुछ माह पूर्व जब देश में नोटबंदी लागू की गई थी तब भी नीतीश कुमार ने केन्द्र सरकार के इस फैसले का समर्थन करते हुए नोटबंदी को देश के लिये फायदेमंद बताया था जबकि अन्य 
विपक्षी राजनीतिक दल व उनके नेता नोटबंदी का मुखर विरोध कर रहे थे।

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