दांपत्य जीवन का दुखद मोड़ है तलाक

दांपत्य जीवन का दुखद मोड़ है तलाक

विवाह इतना बड़ा दायित्व है, जिसे ओढऩे से पहले कर्ताओं की विचारशीलता इतनी परिपक्व होनी चाहिए कि वे संभावित प्रतिकूलताओं में फंस गए तो उसका समाधान कैसे करेंगे? पारस्परिक समाधान न निकलने पर दूसरा रास्ता तलाक का रह जाता है। पाश्चात्य देशों में प्राय: आधे विवाह तलाक में परिणित होते हैं। जब यूरोप अमेरिका की संस्कृति को सराहा और अपनाया जा रहा है तो आज न सही, कल वह अनुकरण भी अपनाना होगा। स्वाभिमान अब लड़कियों में भी जग रहा है। वे भी दास युग की ओर लौटना नहीं चाहती। स्नेह, सम्मान और सहयोग का अभाव उन्हें अखरता है। रोटी कपड़े के लिए विवाह थोड़े ही होते हैं। उसके पीछे उद्देश्य, आदर्श और दायित्व भी जुड़े होते हैं। वे यदि लडख़ड़ाने लगें और उपेक्षा का दौर चल पड़े तो कहा नहीं जा सकता कि भावुकता उसे कब तक सहन करेगी? अब कोने में बैठकर आंसू बहा लेने और मन को समझा लेने की स्थिति भी तो नहीं रही। हत्या, आत्महत्या से एक सीढ़ी नीचे उतरने पर अस्त-व्यस्त दांपत्य जीवन में घोषित तलाक ही एक उपाय बचता है। बरबस गले न बंधे रहने की बात का जिस प्रकार समर्थन किया जा सकता है, उसी प्रकार यह उलझन भी कम जटिल नहीं है कि यदि गोदी में बच्चा या बच्चे हों तो उस स्थिति में जो अनेकों समस्याएं उत्पन्न होती हैं, उनको किस प्रकार सुलझाया जाये। विदेशों में खर्चीले शिशु पालन गृह हैं जिनमें अभिभावकों के पूरा पैसा देने पर बच्चों की अच्छी व्यवस्था हो जाती है। सरकार भी उस प्रबंध में उदार है। हर अव्यवस्थित बच्चे की जिम्मेदारी सरकार उठाती है पर यहां तो ऐसा कुछ है नहीं। बच्चों का स्वाभाविक लगाव प्राय: माता के साथ होता है पर तलाक के बाद पिता बच्चों को कानूनी हक जता कर उसे माता से छीनने का प्रयत्न करता है।
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 इसके पीछे उसका उद्देश्य शिशु-स्नेह नहीं वरन उससे तथा उसकी माता से बदला लेने के लिए त्रस देने भर की मंशा होती है। माता-पिता छूटने की तरह बच्चा छूटना भी एक सहृदय नारी के लिए इतना बड़ा त्रस है जिसमें वह तिलमिला जाती है। परित्यक्ताओं के सम्मुख सबसे विकट प्रश्न यह है कि उनके बालकों के भरण पोषण और संरक्षण का दायित्व कैसे उठे? बच्चों के रहते दूसरा विवाह कैसे हो। ऐसे बच्चों के तिरस्कृत रहने पर उनकी सुसंस्कारिता कैसे विकसित हो? दूसरा यह कि पिता-परिवार पर कन्याओं के अधिकार को वैसी मान्यता मिले, जैसी विवाह से पहले थी।
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 तीसरा यह कि ऐसी विषम परिस्थितियों में फंसी महिलाओं के शिक्षण दायित्व को सरकार उठाये। चौथा विवाह बंधन में बंधते ही जो शिशु जन्म की संभावना बनती है, उसे तभी होने दिया जाय जब दोनों के बीच घनिष्ठता की सुनिश्चितता दिख पड़े। अगले दिनों और भी उग्र होने वाली इस समस्या का समाधान हमें समय रहते सोचना चाहिए।
– कर्मवीर अनुरागी

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