दंगों में अव्वल उत्तर प्रदेश, फिर भी अखिलेश के साथ सेक्युलरवादी..!

दंगों में अव्वल उत्तर प्रदेश, फिर भी अखिलेश के साथ सेक्युलरवादी..!

उत्तर प्रदेश सांप्रदायिक हिंसा से बीते साल भी जलता रहा। जब सारे देश में सांप्रदायिक दंगों के मामले घटे तो भी उत्तर प्रदेश सरकार राज्य में दंगों के मामलों को रोक नहीं सकी। अफसोस कि साल 2016 में सांप्रदायिक हिंसा के चलते उत्तर प्रदेश में खून-खराबा होता रहा। उत्तर प्रदेश सांप्रदायिक हिंसा के मामले में देश का सबसे अव्वल और बदनाम राज्य बना रहा। गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने लोकसभा में विगत मंगलवार को बताया कि साल 2016 में उत्तर प्रदेश में 162 सांप्रदायिक हिंसा के मामले दर्ज किए गए। वहीं साल 2015 में उत्तर प्रदेश में 155 सांप्रदायिक हिंसा के मामले हुए थे। 2016 में हुए सांप्रदायिक हिंसा में 29 लोग मारे गए और 488 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। वहीं साल 2015 में सांप्रदायिक हिंसा से 22 लोगों की जान गई थी जबकि 419 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। यानी सांप्रदायिकता के आग में झुलसता रहा उत्तर प्रदेश। फिऱ भी साथ सेक्युलरवादी और अब जिस अखिलेश यादव की सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश में धर्म के नाम पर हिन्दू-मुसलमान लड़ते-मरते रहे, उसी सरकार के समर्थन में कई कथित सेक्युलरवादी खड़े हैं। इनमें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से जुड़े इतिहासकार डा. इरफान हबीब भी हैं। वे अलीगढ़ में कांग्रेस के उम्मीदवार विवेक बंसल के हक में वोट देने के लिए जनता से अपील कर रहे हैं। कह रहे हैं कि गंगा-जमुनी संस्कृति को बचाने के लिए जनता कांग्रेस के उम्मीदवार को विजयी बनाए। आपको मालूम ही है कि राज्य में समाजवादी पार्टी-कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।
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 हबीब साहब तब चुप थे जब 1984 में कांग्रेस के गुंडे सिखों का कत्ल कर रहे थे। वे कथित सेक्युलरवादियों की फौज के सरदार हैं। मुजफ्फरनगर दंगे और आईएसआई और जरा याद कर लें कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर किया गया वह दावा कि पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई मुज़फ़्फ़रनगर के दंगा पीड़ित मुसलमानों के संपर्क में है। उन्होंने इंदौर में 26 अक्तूबर,2014 को एक सभा में इस तरह का बयान दिया था। देश के छोटे-बड़े नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे तोल-मोल के बोलेंगे। वे तथ्यों के साथ खिलवाड़ नहीं करेंगे। राहुल गांधी के उपर्युक्त दावे की फौरन हवा निकल गई थी क्योंकि जब उनके दावे पर सवालिया निशान लगे तो वे सामने नहीं आए प्रमाणों के साथ। उनके बयान के बाद तगड़ा बवाल हुआ था। उनकी विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों ने चौतरफा निंदा की। पहली नजर में तो लग रहा था कि राहुल गांधी ने मुसलमानों को रिझाने के लिए बयान दिया, ताकि मुसलमान उनसे अपने को जोड़कर देखें।
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 पर,मुस्लिम संगठनों का कहना था कि उन्होंने मुसलमानों की देशभक्ति पर सवालिया निशान खड़ा किया। तब निर्वाचन आयोग ने राहुल गांधी को उनके इस भाषण के लिए नोटिस जारी किया था, जिसमें उन्होंने बीजेपी पर सांप्रदायिक घृणा फैलाने का आरोप लगाया था और साथ ही मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों के इंटर-सर्विसिज इंटेलिजेंस के संपर्क में होने का दावा किया था। अब वही राहुल गांधी मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं अखिलेश यादव के साथ। वे इस सवाल का जवाब नहीं दे रहे कि उत्तर प्रदेश में दंगे क्यों नहीं रोक पा रही है अखिलेश सरकार? राहुल गांधी ये भी नहीं बता रहे कि उन्होंने मुजफ्फरनगर दंगों के पीड़ितों के पुनर्वास के लिए खुद क्या किया ?
 

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