त्वरित टिप्पणी: डॉ. प्रभात ओझा….. ‘आप’ की इस हड़बड़ी के मायने

त्वरित टिप्पणी: डॉ. प्रभात ओझा….. ‘आप’ की इस हड़बड़ी के मायने

 पंजाब के मनसा से एक अजीब खबर आई। वहां दिव्यांग दलित नेता बंत सिंह झब्बर और उनके हार पैर काटने के अपराध में जेल जा चुके नवदीप सिंह को एक साथ आम आदमी पार्टी में शामिल कर लिया गया। वैसे पार्टी के बड़े नेताओं को बताया गया तो कुछ समय बाद नवदीप सिंह की सदस्यता रद्द कर दी गई। नवदीप पर बंत सिंह की बेटी के साथ गैंग रेप में शामिल होने का भी आरोप है। बात सन् 2006 की है। तब बंत सिंह अपनी नाबालिग बेटी के साथ गैंगरेप के खिलाफ मुकदमा लड़ रहे थे। नाराज नवदीप सिंह ने बंत सिंह के दोनों हाथ और एक पैर काट डाला था। बंत सिंह ने हार नहीं मानी और नवदीप को सात साल की सजा हुई। बंत सिंह आज दलित नेता के रूप में चर्चित हैं। उधर जमानत पर आये नवदीप के पास बड़ी लैंड प्रापर्टी है। आप के स्थानीय नेताओं को बंत सिंह की दलितों में स्वीकार्यता ने आकर्षित किया होगा और नवदीप ने अपनी ओर से गुजारिश की होगी। सम्भव है कि इसके लिए उसने भरपूर चंदा भी दिया हो। दोनों को आम आदमी पार्टी की सदस्यता हासिल हो गई।
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पता चलने पर नवदीप की सदस्यता जरूर रद्द हुई, फिर भी आप की हड़बड़ी का नमूना तो मिल ही गया। खुद संजय सिंह जैसे बड़े नेता की मौजूदगी में सदस्यता मिलने के बाद बंत ने इस ओर ध्यान दिलाया। सवाल है कि संजय सिंह तक दोनों को पहुंचाने के पहले उनका ब्यौरा क्यों नहीं रखा गया। फिर खुद संजय सिंह ने भी इस तरह के विवरण मंगाने की जरूरत क्यों नहीं समझी। इसे समझने के लिए कुछ और बिंदुओं पर विचार करना होगा।पंजाब का चुनाव कई मायनों में दूसरे राज्यों से अलग है। पांच राज्यों में गोवा के साथ पंजाब अकेला बड़ा राज्य है, जहां आप भी चुनाव लड़ रही है। अरविंद केजरीवाल का यह संगठन किसी भी तरह से राज्य की सत्ता पर काबिज होना चाहता है। ठीक उसी तरह दिल्ली में हुआ था। वहां भी तो ईमानदार और जुझारू युवा के नाम पर किसी को भी टिकट दे दिया गया। इनमें से कई मंत्री बनने के बाद तक एक कमरे के मकान में रहते थे। यह तो पकड़े जाने पर पता चला कि ऐसे कमरे भ्रष्टाचार की किस पराकाष्ठा तक जा सकते हैं।
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पंजाब में भी किसी को उम्मीदवार बनाने से परहेज नहीं है। पिछले दिनों उसने एक आंतरिक सर्वे कराने के बाद खुद ही जोश दिखाना शुरू कर दिया था। जल्द ही खबर आने लगी कि पार्टी की हालत कमजोर हो रही है। बीजेपी से बाहर आकर नवजोत सिंह सिद्धू सरीखे नेता अपने अंदाज से आप को मजबूत करते नजर आ रहे थे। बड़बोलेपन सिद्धू खुद तो चुप रहे, पर उनकी पत्नी नवजोर कौर उनके अगले रास्ते का संकेत देती रहीं। साफ हो चला है कि पति- पत्नी, दोनों ही कांग्रेस का हाथ थाम चुके हैं। ऐसे में केजरीवाल और उनका संगठन बेताब है। चर्चा यहां तक है कि केंद्र शासित दिल्ली में सरकार के पास सीमित अधिकार होने के कारण केजरीवाल की महत्वाकांक्षा पूरी होती नहीं दिख रही है। लिहाजा बहुमत मिलने पर वह पंजाब का रुख कर सकते हैं। ऐसे में पार्टी किसी भी तरह बहुमत हासिल करने के लिए जीतोड़ कोशिश कर रही है। क्या फर्क पड़ता है कि यह बहुमत भुक्तभोगी और अपराधी दोनों को साथ लेकर भी मिल जाय?

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