तो ये नरकंकाल बन सकते हैं गले की हड्डी!

तो ये नरकंकाल बन सकते हैं गले की हड्डी!

  skeletonयह सच है कि प्राकृतिक आपदा का कहर कांग्रेस शासनकाल में उत्तराखण्ड पर टूटा था जिसमें देश विदेश के पांच हजार श्रद्धालू एक ही दिन में काल का ग्रास बन गए थे। लेकिन राजनीतिक हालात बदलने के कारण इस आपदा की आंच से कांग्रेस तो झुलसने से बच गई मगर यह आपदा और इस आपदा के तहत मारे गए श्रद्धालुओं के नरकंकाल आजतक मिलना भाजपा के लिए सिरदर्द बन गया है।भले ही भाजपा नरकंकाल मुददे पर कांग्रेस को कितना भी घेरने की कोशिश करे परन्तु भाजपा के पास इस सवाल का कोई जवाब नही है कि प्राकृतिक आपदा के समय दिल्ली में चैन की नींद सो रहे तत्कालीन मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा अब भाजपा के नेता है और उनके प्रति जवाबदेही भाजपा को ही तय करनी है।हादसे के कई साल बीतने के बाद भी नरकंकालों का बड़ी संख्या में मिलना उस समय की बहुगुणा सरकार की लापरवाही का प्रबल प्रमाण है जिसने उस समय हादसे में मारे गए श्रद्धालुओं के शवों को खोजने तक की जहमत नही उठाई और केवल हवाहवाई राहत कार्यों की सफलता गिनाते रहे।लेकिन कांग्रेस हाईकमान को समय रहते तत्कालीन मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा की विफलताओं का पता चल गया था,इसी कारण कांग्रेस ने उन्हें सीएम की कुर्सी से हटाकर हरीश रावत को सीएम बनाया जिन्होंने  दिन रात एक करके आपदा से जूझ रहे उत्तराखण्ड को रिकार्ड समय में फिर से खड़ा करने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।
जनता के पैसों पर ऐश करते पूंजीपति और राजनेता
भाजपा के दामन पर आए दिन दाग लग रहे है। लोग भाजपा से सवाल पूछ रहे है कि आखिर उनके अच्छे दिन कब आएगे।उनके खाते में 15-15 लाख रूपये कब डाले जाएगे,चुनाव के समय महगांई कम करने का वायदा करने वाली भाजपा के ढाई साल के शासनकाल में महगांई आज भी चरम पर क्यों है? इन सवालों के जवाब किसी भी भाजपाई के पास नही है। कांग्रेस से भाजपा में गए विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत समेत दस बागियों के दाग धोने में ही भाजपा को पसीने छूट रहे है। ये दस के दस बागी भाजपा से टिकट चाहते है लेकिन पहले से ही भाजपा के निष्ठावान एवं टिकट पाने का सपना संजोये भाजपाईयों की इन बागियों ने नींद उडा दी है। जिसे लेकर भाजपा के अन्दर ही घमासान मचा हुआ है।यही हाल उत्तराखण्ड में भी देखने को मिल रहा है। भाजपा कभी खण्डूरी है जरूरी का नारा लगाने लगती है और जब दूसरे नेता आंखे तरेरने लगते है तो बिना चेहरे के चुनाव मैदान में जाने की बात करने लगती है। जबसे  प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी  की पसन्द से अमित शाह  ने भाजपा की कमान संभाली है और उन्होने लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज व अरूण जेटली जैसे दिग्गजो को किनारे लगाकर नरेन्द्र मोदी को एक मात्र भाजपा का चेहरा माना है तभी से भाजपा टुकडों में बटकर कभी दिल्ली तो कभी बिहार की हार का सामना कर रही है। लगता है आज भी भाजपा के पास अटल बिहारी वाजपेयी के सिवाय कोई ऐसा नेता नही है जो सभी को स्वीकार्य हो। इसी कारण कभी कर्नाटक, राजस्थान तो कभी उत्तर प्रदेश तो कभी बिहार और उत्तराखण्ड में भाजपा नेतृत्व को उन्ही की पार्टी नेताओं से चुनौती मिल रही है। जिससे भाजपा लगातार हाशिए की तरफ जा रही है लेकिन भाजपा इस स्थिति से बेखबर सत्ता में बने रहने का दिवास्वप्न देख रही है।
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भाजपा उत्तराखण्ड में हरीश रावत का भी सामना नही कर पा रही है। हरीश रावत देश की राजनीति में एक ऐसा नाम है जिनकी तुलना उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य का मुख्यमन्त्री होते हुए देश के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी से की जाने लगी है। जब से भारतीय संविधान की धारा 356 का दुरूपयोग कर हरीश रावत सरकार को गिराने का मोदी सरकार ने असफल प्रयास किया और हरीश रावत पार्टी के दस विधायकों के बागी हो जाने पर भी सरकार को बचाने में कामयाब हो गए उससे हरीश रावत का कद राष्टृीय स्तर पर ऊंचा हुआ है।   हरीश रावत जहां देश में एक बडे नेता के रूप में उभरे है वही उनके द्वारा अपनी सरकार बचाने के लिए किये गए राजनीतिक व कानूनी संधर्ष के सफल परिणाम से अन्य गैर भाजपा शासित राज्यों को स्थिरता की संजीवनी मिली है।कहा जाए तो हरीश रावत एक दिन में ही बड़े नेता नही बन गए ।उनके अन्दर की सादगी,कर्मठता,विद्वता और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद उनके बड़ा बनने का एक बड़ा कारण है। हरीश रावत देश के पहले ऐसे मुख्यमन्त्री है जो अपने पद पर रहते हुए आज भी अपने कार्यकर्ताओं के बीच अधिक से अधिक वक्त गुजारना पसन्द करते है। वे ढाई साल से सीएम की कुर्सी पर है फिर भी आज तक सीएम आवास को उन्होने अपना आशियाना नही बनाया और देहरादून के बीजापुर अतिथिगृह के एक हिस्से में रहकर राज्य के विकास को गति दे रहे है। मुख्यमन्त्री हरीश रावत के लिए शायद ही ऐसा कोई दिन होता हो  जिस दिन वे अपने कार्यकर्ताओं से ही नहीं विरोधियों से न मिलते हो। साथ ही आम जनता के लिए भी उनके दरवाजे हमेशा खुले रहते है।ऐसे में भाजपा के ही गले की हडडी बना नरकंकाल मुददा हरीश रावत के लिए परेशानी का सबब नही बन पाएगा क्योकि उन्होने नरकंकालों को खोजने और उनका श्रद्धाभाव के साथ अन्तिम सस्ंकार करने की मुहिम समय रहते शुरू कर दी है।एक दूसरे पर नरकंकाल मामले में आरोप प्रत्यारोप के चलते लगता है यह मुददा चुनाव तक ठन्डा होने वाला नही है। यानि नरकंकाल की आंच से चाहे भाजपा झुलसे या कांग्रेस दोनो में से किसी एक का झुलसना तय है। (विनायक फीचर्स)आप ये ख़बरें और ज्यादा पढना चाहते है तो दैनिक रॉयल unnamed
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