तेज बहादुर के मामले में हो न्याय

तेज बहादुर के मामले में हो न्याय

खराब खाने की बात कहकर मीडिया में सुर्खियां बटोरने वाले बीएसएफ के जवान तेज बहादुर को बीएसएफ से बर्खास्त कर दिया गया है। इसके एक दिन बाद रेवाड़ी स्थित अपने गांव पहुंचे तेज बहादुर का कहना है कि उनकी लड़ाई अकेले की नहीं बल्कि सभी सैनिकों की लड़ाई है। तेज बहादुर का यह भी कहना है कि उन्हें भरोसा है कि उन्हें इस मामले में न्याय मिलेगा। अपने गांव पहुंचे तेज बहादुर के गांव में उनका भव्य स्वागत हुआ ।
तेज बहादुर यादव ने कहा है कि मैंने खराब खाने के सबूत दिए थे, लेकिन मुझे न्याय नहीं मिला। मैं इस मामले में कोर्ट जाऊंगा और मुझे न्याय मिलने का पूरा भरोसा है। मैं अपनी आखिरी सांस तक सैनिकों के लिए लड़ाई लड़ूंगा। ऐसी शिकायतें पहले भी आईं हैं, लेकिन किसी ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। यह मेरा कर्तव्य था कि मैं सरकार के सामने सच्चाई लाऊं। तेज बहादुर यादव ने कहा कि उन्होंने अपनी आवाज इसलिए उठाई ताकि आने वाली पीढिय़ों को ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े। इस पूरे मामले से नाराज यादव ने सरकार से सपोर्ट की अपील की है। यादव ने कहा कि ऐसा नहीं हुआ तो वह कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाने से नहीं चूकेंगे। बीएसएफ एक्ट और नियमों के मुताबिक, वह तीन महीने के भीतर याचिका या सजा के फैसले के खिलाफ उच्च संस्था में अपील कर सकते हैं। वैसे तेज बहादुर को बीएसएप से बर्खास्त किये जाने की काफी आलोचना हो रही है। सवाल उठाया जा रहा है कि अगर सेना जैसे प्रतिष्ठित एवं अनुशासित निकाय में इस तरह बड़े अधिकारियों की तानाशाही एवं मनमानी चलेगी तथा उनके द्वारा सैनिकों के खान-पान तक का ध्यान न रखे जाने के साथ ही विरोध में आवाज उठाने पर उन्हें बर्खास्त कर दिया जायेगा तब तो इससे सैनिकों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
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बीएसएफ द्वारा तेज बहादुर को बर्खास्त करने के बजाय अगर सैनिक की शिकायत पर संज्ञान लेते हुए उपयुक्त कार्रवाई करते हुए खामियां दुरूस्त करने की कोशिश की गई होती तो शायद इससे भारतीय सेना की प्रतिष्ठा एवं गरिमा में बढ़ोत्तरी होती लेकिन बीएसएफ द्वारा मानवीय उसूलों का ध्यान नहीं रख गया तथा एक सैनिक को इस तरह बर्खास्त कर दिया गया। तेज बहादुर द्वारा कहा गया है कि अब वह इस मामले में न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे तो इससे यह भी स्पष्ट है कि बीएसएफ से जुड़ा हुआ यह मामला अब अदालत की दहलीज तक पहुंचेगा तथा संभव है कि न्यायालय से तेज बहादुर को इंसाफ मिल सके। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि देश की हिफाजत के लिये अपनी जान तक की बाजी लगाने के लिये तैयार रहने वाले सैनिकों के प्रति सरकार व सैन्य अधिकारी इस ढंग से संवेदनहीन क्यों हो गये हैं। बीएसएफ द्वारा अगर तेज बहादुर पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाया जा रहा है तथा सेना की छवि खराब करने की तोहमत भी मढ़ी जा रही है तो यह और भी विचित्र और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। साथ ही सवाल यह भी उठता है कि जिस सेना पर सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर खर्च किये जाने का दावा किया जा रहा है, भारतीय सेना की विश्व के विकसित देशों की सैन्य ताकत से तुलना की जा रही है, वहां अगर सैनिकों को खाने के ही लाले पडऩे लगेंगे तो इससे देश की छवि को काफी नुकसान पहुंचेगा। बेहतर होता कि बीएसएफ द्वारा तेज बहादुर की आवाज दबाने तथा उन्हें बर्खास्त करने का अमानवीय कदम उठाए जाने के बजाय आलोचना बर्दाश्त करने और व्यवस्था दुरूस्त करने की कोशिश की गई होती।
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तेज बहादुर के मामले में राजनीतिक बयानबाजी का दौर भी शुरू हो गया है। ऐसे में प्रबल संभावना है कि अब इस मुद्दे पर देश की राजनीति भी गर्माए। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी द्वारा मांग की गई है कि तेज बहादुर को निष्काषित सैनिक की जगह विसिल ब्लोअर की तरह तवज्जो दी जानी चाहिए। तिवारी का कहना है कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। वह बीएसएफ में चल रही अनियमितताओं को उजागर करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उच्च अधिकारियों ने उनकी बात नहीं सुनी। मनीष तिवारी का यह भी कहना है कि इस मामले को उजागर करके यादव देश की सेवा ही कर रहे थे। वहीं एनसीपी नेता तारिक अनवर ने कहा कि तेज बहादुर की शिकायत को समझा जाना चाहिए था।
-सुधांशु द्विवेदी

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