तेजी से बढ़ता जा रहा लिव इन रिलेशनशिप का प्रचलन..!

तेजी से बढ़ता जा रहा लिव इन रिलेशनशिप का प्रचलन..!

आजकल दिल्ली, मुंबई व अन्य महानगरों में युवक-युवतियों में बिना शादी किए ही एक साथ रहने का प्रचलन तेजी से बढ़ता जा रहा है। नौकरीपेशा लड़के-लड़कियों के अलावा कालेज या यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राएं भी इसकी चपेट में आ गए हैं। गुजरात व महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह प्रथा अधिक पाई जाती है। वहां लोग खुलेआम अपने संबंधों को स्वीकारते हैं। उनके अनुसार ‘लिव इन रिलेशनशिप’ का संबंध विवाह से अधिक मजबूत होता है क्योंकि इस रिश्ते में किसी प्रकार के उत्तरदायित्व, बंधन इत्यादि नहीं होते। असीम व सुचित्र लगभग पांच साल से साथ रह रहे हैं। वे दोनों बहुत खुश हैं। सुचित्र अपने संबंधों को स्वीकारते हुए कहती हैं, ‘हम दोनों इस रिश्ते को लेकर दृढ़ हैं। हम शादी के झंझट में नहीं पडऩा चाहते। हमारा विश्वास है कि हमारे संबंध ताउम्र ऐसे ही मजबूत बने रह सकते हैं।’ आज लिव इन रिलेशनशिप के बढऩे का कारण है कि अभिभावक अपनी बेटियों का पालन पोषण लड़कों की तरह ही करते हैं। वे लड़कियों को उच्च शिक्षा हेतु बाहर भी भेजते हैं। कई बार होस्टल में सीमित सीटें होने के कारण रहने की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाती तो उन्हें पेइंग गेस्ट बनकर रहना पड़ता है। तब यह आवश्यक नहीं कि किसी लड़की को एक अलग कमरा मिल ही जाए। ऐसे में उसे किसी दूसरे, चाहे वह लड़का हो या लड़की, पेइंग गेस्ट के साथ व्यवस्थित होकर रहना पड़ता है, जिससे साथ रहते हुए धीरे-धीरे उनके संबंधों में प्रगाढ़ता आने लगती है और वे एक-दूसरे के साथ इस हद तक घुलमिल जाते हैं कि उन्हें शादी की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती। यह प्रचलन आमतौर पर उच्च वर्ग और मीडिया से जुड़े लोगों में अधिक पाया जाता है। ऐसे संबंधों में सबसे अहम् बात यह होती है कि परिवार और सोसायटी आदि की कोई जिम्मेदारी नहीं रहती। एक-दूसरे के संबंधियों व मित्रों के प्रति कोई अतिरिक्त बोझ नहीं होता।
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उन दोनों में एक-दूसरे के काम के प्रति, कैरियर के प्रति कोई तनाव नहीं होता। वे एक दूसरे पर अपनी पाबंदियां या मर्जी नहीं थोपते। हालांकि समाज व परिवार की नजरों में यह रिश्ता बहुत ही घटिया स्तर का होता है मगर कुछ अभिभावक इसे सहमति प्रदान भी करते हैं। उनका मानना है कि जब बच्चे धोखा खाएंगे तो उन्हें खुद ही समझ आ जाएगी। वैसे देखा जाए तो इस प्रकार के संबंधों से समाज खोखला हो रहा है। अमेरिका में तो यह इस हद तक पहुंच चुका है कि हर बच्चे के दो-तीन मां-बाप होते हैं। अब अमेरिकावासी इसका परिणाम भुगत चुके हैं और वे धीरे धीरे इस राह से वापिस आ रहे हैं।
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भारत में भी अभी ऐसे जोड़ों का प्रतिशत बहुत कम है क्योंकि भारतीय अभी पूरी तरह से इस से वाकिफ नहीं हैं। अभी यह प्रचलन बड़े शहरों तक ही सीमित है मगर जब यह छोटे शहरों की ओर बढऩे लगेगा, तब हमारी भारतीय संस्कृति की जड़ें तक हिल जाएंगी, अत: हमें इस प्रथा को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिएं।
– भाषणा बांसल

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