तीन तलाक की फांस, भाजपा ने बिगाड़ी सबकी बात: सियाराम पांडेय ‘शांत’

तीन तलाक की फांस, भाजपा ने बिगाड़ी सबकी बात: सियाराम पांडेय ‘शांत’

तीन तलाक पर प्रतिबंध की बात कहकर भाजपा ने सपा, बसपा और कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया है। बात यहीं तक होती तोे भी गनीमत थी, लेकिन भाजपा ने तो सपा, बसपा और कांग्रेस के प्रमुखों से उनकी राय मांग ली है। सर्वोच्च न्यायालय के रुख के बाद केंद्र सरकार ने इस मामलेे को विधि आयोग को सौंप दिया कि वह इस मामलेे में आम राय बनाए और विधि आयोग के अध्यक्ष बीएस चैहान ने इस बावत प्रश्नावली भेजकर 21 नवंबर तक सभी राजनीतिक दलों सेे उनकी राय भी मांग ली थी। यह अलग बात है कि बहुत सारे राजनीतिक दलों ने इस संवेदनशील मामले में अभी तक डकार भी नहीं ली है, राय देना तो बहुत दूर की बात है। बीच चुनाव में भाजपा ने तीन तलाक पर विपक्ष की राय क्या मांगी, उनकी हालत ‘भई गति सांप-छछूंदर केरी’ वाली होकर रह गई है। कहां तो सपा और बसपा मुसलमानों पर डोरे डाल रही थीं। दोनों ही पार्टियां मुसलमानों को यह समझाने में जुटी थीं कि उनसे बड़ा उनका हितैषी दूसरा कोई नहीं है। मायावती तो पहले ही दिन से मुसलमानों को यह समझा रही हैं कि अगर उन्होंने सपा और कांग्रेस गठबंधन कोे अपना मत दिया तो उनका वोट बेकार चला जाएगा। भाजपा जीत जाएगी। उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री आज़म खान ने भी कहा है कि मायावती अगर 303 मुसलमानों को टिकट दें तो वे आज ही बसपा ज्वाॅइन कर लें। उन्होंने बसपा द्वारा मुसलमानों को सौ टिकट दिए जाने का स्वागत भी किया और लगे हाथ यह भी कह दिया कि ऐसा उन्होंने भाजपा को फायदा पहुंचाने की गरज से किया है। मतलब साफ है कि दोनों ही दल एक दूसरे पर आरोप लगाने में जुटे हैं।
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 कांग्रेस को कुल जमा 103 सीटें ही गठबंधन के तहत मिली हैं, उसमें भी उसने ज्यादातर मुस्लिम नेताओं को टिकट दिया है। उसका प्रयास अपने खोए मुस्लिम जनाधार को वापस पाना है। भाजपा ने भले ही एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट न दिया हो, लेकिन उसकी नजर मुस्लिमों की आधी आबाादी पर है। भले ही वह सभी मुस्लिम महिलाओं को प्रभावित न कर सके लेकिन तीन तलाक के मुद्दे को उठाकर उसने विपक्ष की नाक में पानी तोे भर ही दिया है। मुस्लिम उलेमा भी परेशान हैं। कुछ भाजपा के पक्ष में हैं तो अधिकांश उसके विरोध में खड़े हो गए हैं। मुस्लिम महिलाएं इतना तो सोच ही सकती हैं कि इतने राजनीतिक दलों के बीच कोई तो है जो उनकी बात कर रहा है। उनके सम्मान और अधिकार के लिए लड़ने कोे तैयार है। यहां तो अपने ही तलाक दे रहे हैं, भाजपा कम से कम उन्हें अपना तो समझती है। उत्तर प्रदेेश विधान सभा चुनाव में जहां सपा और बसपा दोनों ही मुसलमानों को लुभाने में जुटे हैं, वहीं चुनाव बाद तीन तलाक पर पाबंदी की बात कहकर भाजपा ने उनकी गणित बिगाड़ दी है। यह एक ऐसा पेचीदा और संवेदनशील मामला है जिस पर न तो बोला जा सकता है और न ही चुप रहा जा सकता है। चुप रहने पर मुस्लिम महिलाओं के बीच संदेश जाएगा कि सपा, बसपा, कांग्रेस या फिर अन्य राजनीतिक दलों को उनके हितों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। उन्हें बस मुस्लिम पुरुषों से ही मतलब है। 
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कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद केंद्र सरकार तीन तलाक प्रथा को हटाने के लिये बड़ा कदम उठा सकती है। मुुस्लिम महिलाओं की जिंदगी और सम्मान को चोट पहुंचाने वाली इस प्रथा को तत्काल बंद किये जाने की जरूरत है। गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने भीे इस पर केंद्र सरकार से उसकी राय जानी थी तब भी केंद्र सरकार ने इस कुरीति को खत्म करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई थी। भाजपा सरकार के मंत्री ने दावा किया सिर्फ केंद्र सरकार ही महिलाओं का सम्मान करती है। शेष किसी भी राजनीतिक दल में महिलाओं के लिए न तो बड़ा स्थान है और न ही कोई सम्मानजनक पद। तीन तलाक महिलाओं के साथ लैंगिग भेदभाव करता है, हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि पर्सनल लॉ के आधार पर किसी को संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। महिलाओं की गरिमा के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। हालांकि केंद्र सरकार के इस कदम का दिग्विजय सिंह और शरद यादव सरीखे नेताओं ने विरोध भी किया था। दिग्विजय ने तो अदालतों को ही सलाह दे डाली थी कि वे धर्म और धर्मोें की रिवायतों केे मामले में दखलन्दाजी न करें। इसका सोशल मीडिया पर काफी विरोध भी हुआ था। दिग्विजय सिंह अपनी सफाई तक नहीं दे पाए थे। सर्वोच्च न्यायालय ने तो यहां तक कह दिया है कि तीन तलाक और बहुविवाह इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। तीन तलाक के लिए इस्लाम में कोई जगह नहीं है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी यही बात कही थी। तीन तलाक असंवैधानिक है। मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन है। कोई पर्सनल लाॅ बोर्ड संविधान से ऊपर नहीं है। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने तोे कहा है कि कुरान में कहीं भी तीन तलाक का उल्लेख नहीं है।
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 यह तो मुस्लिम लाॅ बोर्ड के दिमाग की उपज है। वहीं मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी का मानना हैै कि शरीयत के हिसाब से तीन तलाक जायज है। भाजपा तर्क दे रही है कि अगर तीन तलाक जायज होता तो दुनिया के 20 देशोें ने इस कुप्रथा को अपने यहां से खत्म क्योें कर दिया। जब तीन तलाक वहां खत्म हो सकता है तोे हिंदुस्तान में क्यों नहीं। सपा, बसपा और कांग्रेस नेे इस संवेेदनशील मामले में अपना मुंह अभी तक क्यों नहीं खोला है। उन्हें लगता है कि इस पर कुछ भी बोलने का मतलब है नाराजगी मोल लेना। मुस्लिम नाराज हों तो भी और मुस्लिम महिलाएं नाराज हों तोे भी, नुकसान तो उन्हीं का होना है। भाजपा के दोनोें हाथों में लड्डू है। मुस्लिम महिलाओें का कुछ मत भी उसके खाते में आ गया तो भी विरोधी दलों को शिकस्त देने के अपने मकसद में वह कामयाब हो जाएगी। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में 3.84 करोड़ मुसलमान हैं। पूरे प्रदेश में 19 प्रतिशत मुसलमान हैं। प्रदेश के 21 जिलों में 20 प्रतिशत सेे अधिक आबादी मुसलमानों की है। रामपुर जिले में 50.57 प्रतिशत मुसलमान हैं। देश की कुल आबादी में मुस्लिम 14 प्रतिशत हैं। उन्हें नाराज करना कोई नहीं चाहेगा लेकिन भाजपा नेे तीन तलाक और बहुविवाह जैसी कुप्रथा पर अपनी राय रखनेे का साहस किया है और मुस्लिम घरोें में भी अपने लिए जगह बनाई है। अगर चार-पांच प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं भी भाजपा के साथ आ गईं तो प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है। हालांकि मुस्लिमों के बड़े नेता इस फिराक में हैं कि मुस्लिम मतों का विभाजन न हो लेकिन सपा और कांग्रेस गठबंधन तथा बसपा अपने-अपने स्तर पर उन्हें अपने खेमे में लाने के लिए प्रयासरत हैं।
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 मुस्लिम मतों का जितना ही विभाजन होगा, भाजपा उतने ही लाभ में रहेेगी। हाल के दिनों में साक्षी महाराज के चार-चार बीवियों और चालीस बच्चों वाले बयान को लें या साध्वी निरंजन ज्योति के बयान जिसमें कहा गया था कि महिलाओं को पैर की जूती समझनेे वाले ही तीन तलाक जैसी अमानवीय कुप्रथा का समर्थन करते हैं, इसके पीछे मुस्लिम महिलाओं कोे जागरूक करने और अपने हिताहित को समझने की प्रेेरणा देेना ही प्रमुख है। एक मुस्लिम लेखक ने गत दिनों सरकारी आांकड़ों के हवाले से इस बात पर चिंता जाहिर की थी कि मुस्लिम महिलाओं की बहुत बड़ी तादाद निकाह नहीं करती। कहीं इसके बीच तलाक का भय तो नहीं काम कर रहा,यह सोचने वाली बात है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो 20 से 34 साल आयु वर्ग की मुस्लिम महिलाओं को दूसरे समुदायों की तुलना में तलाक दिए जाने की ज्यादा आशंका होती है, लेकिन इन आंकड़ों से एक और चिंताजनक बात सामने आती है कि नौजवान मुस्लिम महिलाओं में शादी करने की दर भी दूसरे समुदाय से कम है। वर्ष 2011 के आंकड़ों के अनुसार 20 से 39 साल की उम्र की 33 लाख 70 हजार मुस्लिम महिलाएं अविवाहित थीं। वर्ष 2011 तक देश में कुल मुस्लिम महिलाओं की आबादी दो करोड़ 10 लाख थी। मतलब करीब 12.87 प्रतिशत महिलाएं अविवाहित थीं। वर्ष 2001 से 2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 20 से 39 आयु वर्ग की मुस्लिम महिलाओं में शादी न करने वाली मुस्लिम महिलाओं की संख्या करीब दोगुनी हो गई। 2001-2011 के दशक में विवाह न करने वाली मुस्लिम महिलाओं की संख्या में 94 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जो दूसरे समुदायों की तुलना में काफी अधिक है।
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 2001-2011 के दशक में शादी न करने वाली बौद्ध महिलाओं की संख्या में 72.78 प्रतिशत, हिंदू महिलाओं में 69.13 प्रतिशत और सिख महिलाओं में 66.21 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की मानें तो शहरी इलाकों में युवा मुस्लिम महिलाएं अविवाहित रहने के विकल्प का ज्यादा चुनाव कर रही हैं। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संयोजक नूर जहां साफिया नीयाज का मानना है कि समुदाय की सामाजिक आर्थिक स्थिति बदलने की वजह से महिलाएं इस तरह के विकल्प ज्यादा अपना रही हैं। इश्तराक एजुकेशन सोसाइटी की जनरल सेक्रेटरी और एसोसिएशन ऑफ मुस्लिम प्रोफेशनल्स की सदस्य रूबीना फिरोज की मानें तो अविवाहित रहने का यह चलन ग्रामीण इलाकों में शायद न हो या कि कम हो, लेकिन शहरी इलाकों में मुस्लिम महिलाएं पहले से ज्यादा सशक्त हुई हैं। वे पुरुषों पर आत्मनिर्भर रहना नहीं चाहतीं। सच्चर समिति की रिपोर्ट बताती है कि अन्य समुदायों के मुकाबले मुस्लिम महिलाएं सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक लिहाज से काफी पिछड़ी हैं, लेकिन तमाम मुश्किलों के बावजूद वे विभिन्न क्षेत्रों में ख्याति भी अर्जित कर रही हैं। देश भर में मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर 53.7 फीसद है। इनमें से अधिकांश महिलाएं केवल अक्षर ज्ञान तक ही सीमित हैं। सात से 16 वर्ष आयु वर्ग की स्कूल जाने वाली लड़कियों की दर केवल 3.11 फीसदी है। शहरी क्षेत्रों में 4.3 फीसदी और ग्रामीण इलाकों में 2.26 फीसदी लड़कियां ही स्कूल जाती हैं। वर्ष 2001 में शहरी इलाकों में 70.9 फीसदी लड़कियां प्राथमिक स्तर तक की शिक्षा हासिल कर पाईं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 47.8 फीसदी रही। वर्ष 1948 में यह दर क्रमशः 13.9 और 4.0 फीसदी थी। वर्ष 2001 में आठवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़कियों का प्रतिशत शहरी इलाकों में 51.1 और ग्रामीण इलाकों में 29.4 रहा। वर्ष 1948 में शहरी इलाकों में 5.2 फीसदी और ग्रामीण इलाकों में 0.9 फीसद लड़कियां ही मिडिल स्तर तक शिक्षा हासिल कर पाईं। वर्ष 2001 में मैट्रिक स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़कियों की दर शहरी इलाकों में 32.2 फीसदी और ग्रामीण इलाकों में 11.2 फीसदी रही। साल 1948 में यह दर क्रमशः 3.2 और 0.4 फीसदी थी। कम पढ़ी लिखी या लगभग अशिक्षित महिलाओं का तलाक के बाद क्या भविष्य होगा। उन पर अकेले अपना ही भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी ही नहीं होती। उनके साथ छोटे-छोटे बच्चे भी होते हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो छोटे बच्चों का भविष्य भी दांव पर लग जाता है। भाजपा का यह फैसला भले ही इस समय मुसलमानों को नागवार गुजर रहा हो, लेकिन इसमें दीर्घकालिक हित तो उन्हीं का है। जिस दिन उन्हें यह बात समझ में आ गई, अन्य राजनीतिक दल स्वतः धराशायी हो जाएंगे।

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