तापमान बढने से बढती है बीमारी

तापमान बढने से बढती है बीमारी

ऋतु कोई भी हो, वह अपना तीव्र रूप अवश्य दिखाती है। ऋतु की ऐसी तीव्रता की स्थिति में बीमारियां बढ़ जाती हैं। ग्रीष्म काल में भी तापमान बढऩे के साथ-साथ बीमारियां बढ़ जाती हैं। सीजनल फीवर, समर डायरिया, स्किन डिसीज, लू लगना, इसके अलावा चिकन पॉक्स, घमौरियां एवं बालतोड़ की बीमारियां एवं शिकायतें बढ़ जाती हैं। सबसे ज्यादा परेशानी हृदयरोगी, मनोरोगी एवं आपरेशन के रोगियों को होती है। इनका रोग तापमान बढऩे के साथ-साथ गहराता जाता है। स्थिति गंभीर तक हो जाती है।

खून सूखने लगना:- तापमान बढऩे का प्रभाव लोगों के शरीर पर पडऩे लगता है। पसीने के रूप में शरीर का पानी व नमक निकलने से खून सूखने अर्थात गाढ़ा होने लगता है जिससे हृदय रोगियों के बीपी में तेजी से बदलाव होता है। सांस फूलने लगती है। ठंड या गर्मी की अधिकता दोनों इनके लिए मुसीबतें साथ लाई हैं।
वह यदि तेज धूप में निकलता है अथवा शारीरिक श्रम करता है तो हृदय की गति बढ़ जाती है। पसीने के माध्यम से पानी व सोडियम (बाहर) निकल जाता है जिससे गाढ़ा हुआ खून फेफड़े की कार्यगति को धीमी कर देता है। निर्धारित समय पर वह हृदय को पर्याप्त मात्रा में खून की आपूर्ति नहीं कर पाता है। नसों में खून की कमी होने लगती है और कमजोरी महसूस करने लगता है।
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आगे स्थिति खतरनाक हो जाती है। हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। यह गाढ़ा खून थोड़ा सा जाम हुए हृदय वाल्व को और ब्लाक कर देता है। सीने में दर्द, चक्कर आना, घबराहट और अत्यधिक पसीना निकलना हार्ट अटैक के लक्षण है। इस स्थिति में पीडि़त को तत्काल डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।

पागलपन बढ़ जाना:- बढ़ते तापमान का प्रभाव दिमाग में भी है। अत्यधिक ठण्ड या गर्मी में मस्तिष्क में हार्मोन का समीकरण बिगड़ जाता है जिससे मनोरोगियों की संख्या बढ़ जाती है। पागलों की परेशानियां बढ़ जाती हैं। तापमान के बढऩे से मानसिक असंतुलन बढ़ जाता है। ऐसे व्यक्ति विचित्र व्यवहार एवं व्यर्थ क्रियाकलाप करने लगते हैं। गर्मी में पागलपन, तनाव एवं अवसाद की शिकायत बढ़ जाती है। तापमान के चलते हुआ हार्मोनल उतार-चढ़ाव ऐसा कराता है। शरीर में पानी की कमी का प्रभाव भी पड़ता है।
आपरेशन में संक्रमण:- गर्मी के समय जिनका आपरेशन हुआ है, उनके घाव में संक्रमण (इंफेक्शन) का खतरा बढ़ जाता है। गर्मी के चलते पसीना निकलता है जिससे टांके वाला स्थान गीला होकर संक्रमित हो सकता है। वहीं शरीर में पानी की कमी से चमड़ी सिकुड़ जाती है जिससे आपरेशन के बाद चमड़ी को पुन: जुडऩे में समय लगता है।
आंखों की परेशानी:- गर्मी के समय आंखों संबंधी बीमारियां बढ़ जाती हैं। आंखों में दर्द, संक्रमण, लाल होना आम समस्या है। पानी सूखने से आंखों में किरकिरी भी होती है। इस मौसम में धूल, परागकण उडऩे के कारण आंखें लाल होती हैं। कभी-कभी खुजली भी होती है। गर्म हवा से भी आंखें लाल होती हैं। इस मौसम में समय-समय पर ठण्डे पानी से आंखों को धोने से राहत मिलती है।
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और भी हैं परेशानियां:- तापमान बढऩे से कई तरह की दिक्कतें होने लगती हैं। गर्म हवा नाक में जाने से नाक फटने व खून निकलने लगता है। गर्मी का प्रभाव गले पर भी पड़ता है। गर्म हवा से बचने सिर को सूती कपड़े से ढंकना चाहिए। यदि किसी कारण से रोम छिद्र बंद होते हैं तो पसीना नहीं निकल पाता और घमौरियां, फोड़े होने लगते हैं।
सूर्य की शक्तिशाली किरणों का चमड़ी पर दुष्प्रभाव पड़ता है। सनबर्न की परेशानी होती है। रक्त में पानी की कमी से खून गाढ़ा होता है जिससे किडनी के रोगी को अधिक डायलिसिस देना पड़ता है। अधिक पसीना निकलने पर शरीर में सोडियम व पोटेशियम की कमी हो जाती है जिससे डायरिया एवं डिहाइडे्रशन हो सकता है। इससे भी किडनी प्रभावित होती है।
बचाव के उपाय:- शीतल जल से सुबह शाम नहाएं। शरीर की पूर्ण सफाई करें। हर आधे घण्टे में पानी पिएं। तेज धूप से बचें। निर्जल व्रत न रखें। पसीना निकलना स्वाभाविक क्रिया है पर उसकी अधिकता से परेशानी होती है अतएव गर्मी के समय छाया एवं हवादार स्थान में रहें। धूप में शारीरिक श्रम न करें। शरीर निर्बल लगे तो ग्लूकोस का सेवन पानी के साथ करें।
सूती कपड़े पहनें। तेज धूप से आने के तत्काल बाद ठण्डा पानी ना पिएं। पसीना सूखने के बाद कूलर, एसी, में जाएं व ठण्डा पानी पिएं। ताजा व गर्म भोजन व फल खाएं। कोल्ड डिंरक्स की अपेक्षा परंपरागत पेय पिएं।

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