तानाशाही की ओर अग्रसर हो रहे ट्रंप : सुधांशु द्विवेदी

तानाशाही की ओर अग्रसर हो रहे ट्रंप : सुधांशु द्विवेदी

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दुनिया के सात इस्लामिक देशों के लोगों के अमेरिका आने पर प्रतिबंध लगाए जाने के निर्णय का अमेरिका में ही विरोध शुरू हो गया है। वहीं अमेरिकी कोर्ट ने ट्रंप के इस आदेश पर आंशिक रोक भी लगा दी है। अमेरिका के लोगों द्वारा कोर्ट के निर्णय पर जिस ढंग से खुशी जताई गई है, उससे स्पष्ट है कि अमेरिका के लोग दुनिया के अन्य देशों के साथ सामान्य संबंधों के ही पक्षधर हैं तथा अमेरिकी जनमानस का यह भी मानना है कि उनके देश के शासनाध्यक्ष के किसी भी निर्णय को मानवता विरोधी करार नहीं दिया जाना चाहिए, लेकिन यह बात सबसे ज्यादा डोनाल्ड ट्रंप को समझना जरूरी है। क्यों कि उन्होंने समृद्ध, संपन्न एवं खुशहाल अमेरिका का संकल्प लेकर जिस तरह से राष्ट्रपति पद पर कब्जा किया है तो उन्हें अपने सकारात्मक उद्देशों को पूरा करने की ही दिशा में आगे बढ़ऩा चाहिए तथा ट्रंप के किसी भी निर्णय से किसी भी देश या धर्म के लोगों के लिए संकट की स्थिति निर्मित नहीं होनी चाहिए।
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हालांकि ट्रंप के मौजूदा रवैये को देखकर ऐसा लगता है कि उनकी कार्यप्रणाली में व्यवहारिकता कम तथा उतावलापन ज्यादा है। कैलिफोर्निया और न्यूयॉर्क समेत अमेरिका के 16 राज्यों के अटॉर्नी जनरलों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उक्त शासकीय आदेश की निंदा करते हुए उसे असंवैधानिक करार दिया है और उसके खिलाफ लड़ाई लडऩे का संकल्प भी जताया है। अमेरिका के 16 राज्यों के ये अटॉर्नी जनरल डेमोक्रेटिक हैं तथा उनका अमेरिकी आबादी पर अच्छा खासा प्रभाव है। अटॉर्नी जनरलों के बयान में कहा गया है कि हमारे राज्यों की 13 करोड़ अमेरिकी जनता और विदेशी निवासियों के प्रमुख कानूनी अधिकारी होने के नाते हम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस असंवैधानिक, गैर अमेरिकी और गैरकानूनी शासकीय आदेश की निंदा करते हैं। अटॉर्नी जनरलों द्वारा अपील की गई है कि संघीय सरकार संविधान का पालन करे, प्रवासियों के देश के तौर पर हमारे इतिहास का सम्मान करे और किसी के राष्ट्रीय मूल या आस्था की वजह से किसी को गैरकानूनी तरीके से निशाना न बनाया जाए। उनका यह भी कहना है कि वह इस असंवैधानिक आदेश के खिलाफ लड़ऩे के लिए कार्यालयों के सभी साधनों का उपयोग करेंगे और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और बुनियादी मूल्यों की रक्षा करेंगे। ट्रंप के उक्त आदेश के खिलाफ अमेरिका में तो असंतोष बढ़ ही रहा है साथ ही विश्व के इस्लामिक देशों में भी ट्रंप के उक्त निर्णय को लेकर नकारात्मक प्रतिक्रिया हो रही है। इसके अलावा भारत सहित दुनिया के अन्य प्रतिष्ठित देशों को भी ट्रंप के इस निर्णय से चौकन्ना होने की आवश्यकता है। क्यों कि डोनाल्ड ट्रंप अगर धूर्त राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित होकर विश्व के सात इस्लामिक देशों के नागरिकों के अमेरिका आने पर इस तरह के प्रतिबंध लगा सकते हैं तो वह भारत के संदर्भ में भी ऐसा निर्णय ले सकते हैं।
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ऐसे में अमेरिका भारत संबंधों पर तो इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा ही साथ ही भारतीय नागरिकों के हित भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही राष्ट्रपति चुनाव से पूर्व इस्लामिक देशों के लोगों के प्रति कड़ा रुख अपनाया हो लेकिन अब राष्ट्रपति पद पर आसीन होने के बाद तो उनका रवैया मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण तथा विश्व बंधुत्व को बढ़ावा देने वाला ही होना चाहिए। क्यों कि अमेरिका द्वारा विश्व के अन्य देशों को आये दिन विश्व शांति एवं मानवीय मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन का खूब उपदेश दिया जाता रहता है तो फिर मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देने में अमेरिका ही क्यों पीछे है तथा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मानवीय मूल्यों की अवधारणा के विपरीत इस तरह से उत्पीड़न एवं दमन का रास्ता क्यों अपनाया जा रहा है। अमेरिका अगर आतंकवाद जैसे मुद्दों को आधार बनाकर इस्लामिक राष्ट्रों के प्रति सख्त रुख अपनाने का तर्क दे तो इसे तो दुनिया के इस ताकतवर देश की कमजोरी व लाचारी ही माना जायेगा। आतंकवाद के खात्मे के लिये उसके लिये जिम्मेदार वास्तविक कारणों एवं संगठनों पर प्रहार किया जाना जरूरी है न कि पूर्वाग्रह एवं पक्षपात से प्रेरित होकर इस तरह से प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। यह भी दावे के साथ कहा जा सकता है कि विश्व में आतंकवाद का रूप भयावह होने के लिए अमेरिका भी काफी हद तक जिम्मेदार है क्यों कि वह समय-समय पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों और संगठनों की मदद करता आया है। जरूरत पडऩे पर उनका अपने हितों और सहूलियत के हिसाब से इस्तेमाल किया जाना भी अमेरिका की आदत में शामिल रहा है। फिर आतंकवाद के खात्मे या अन्य किसी कारण को आधार बनाकर इस्लामिक राष्ट्रों या अन्य देशों को इस तरह से प्रतिबंधित किया जाना कैसे न्यायसंगत हो सकता है तथा इसे तो ट्रंप का तानाशाही व अमानवीय कदम ही माना जायेगा। ट्रंप के लिए अमेरिका की आर्थिक व सामरिक संप्रभुता की चिंता महत्वपूर्ण हो सकती है तथा अमेरिकियों की उम्मीदों पर खरा उतरना भी उनकी जिम्मेदारी है लेकिन इस ताकतवर देश के राष्ट्रपति के लिए यह समझना भी बेहद जरूरी है कि उनका कोई भी निर्णय दुनिया के अन्य देशों की संप्रभुता व सम्मान को भी ठेस न पहुंचाए। क्यों कि राजनीतिक सत्ता कभी स्थायी नहीं होती तथा सत्ता को अन्याय व अत्याचार का आधार नहीं बनाया जाना चाहिये।
 

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