‘तलाक’ एक लफ्ज या ब्रह्मास्त्र

‘तलाक’ एक लफ्ज या ब्रह्मास्त्र

ट्रिपल तलाक यानी तीन तलाक का मुद्दा देश दुनिया पर फिर से हावी हो गया है, बहस का मुद्दा हालांकि भारत है। भारत में रहने वाले मुसलमानों खासकर मुस्लिम महिलाओं की जातीय (निजी) जिंदगी से जुड़ा यह अहम मुद्दा है लेकिन इस्लाम की व्याख्या का मुद्दा नहीं है। मामला प्राचीन परंपराओं से जुड़ा ज्यादा दिखाई देता है। इस्लामिक लॉ यानी मुस्लिम विधि में तलाक की विस्तृत और सटीक व्याख्या की गई है। इस व्याख्या या परिभाषा के लिहाज से देखा जाये तो मुस्लिम लॉ में तलाकुल हसन और तलाकुल विदई दो तरह के तलाकों की व्याख्या की गई है। मुस्लिम विधि के जानकार भी मानते हैं कि तलाक के दो प्रकारों में तलाकुल हसन खराब किस्म का तलाक है। इसमें एक बार में तीन बार तलाक – तलाक – तलाक कहकर कोई भी मर्द तलाक पाने का हकदार बन जाता है। इसमें कोई रू-रियायत नहीं है। इस तलाक की पद्धति का दुरूपयोग भी हो जाता है। इस प्रकार का तलाक तलाकुल हसन कू्रर, निर्दयी और तानाशाही, गुस्से का प्रतीक बना हुआ है, जबकि तलाकुल विदई को लिबरल, साफ्ट और आसान तरीके वाला तलाक माना गया है। इस तलाक की पद्धति में पहले एक मर्तबा पुरूष, महिला के लिए चेतावनी या वार्निंग के रूप में इस्तेमाल करता है। पत्नी, पति की बात या समझाइश पर गौर कर यदि खुद में परिवर्तन नहीं लाती है तो दूसरी बार इस लफ्ज (शब्द) का इस्तेमाल किया जाता है। इस चेतावनी के बाद भी सुधार या परिवर्तन नहीं आता है तो तीसरी बार तलाक शब्द जैसे ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल पति करता है लेकिन इस लफ्ज के इस्तेमाल में समय सीमा भी होती है। कम से कम तीन माह की अवधि में इन शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है।
पत्नी की उठायें पूरी जिम्मेदारी
इस अवधि में दोनों पक्षों को सोचने-समझने का मौका मिल जाता है। इस मियाद मेें सुलह, समझौता हो जाये तो एक अच्छी कोशिश मानी जाती है। मुस्लिम विधि और इस्लाम का भी यही मकसद है यानी किसी का घर इतनी आसानी से टूटने न पाये। सबको एक मौका जरूर मिले अपने दिल की बात कहने का। ट्रिपल तलाक का मुद्दा भले ही आज बहस का मुद्दा है, लेकिन देश दुनिया का नाता भारत के शाहबानो केस से चर्चित मुद्दे के रूप में रहा है। म.प्र. के ग्वालियर में भी 1984 के शाहबानो प्रकरण के प्रकाश में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के संदर्भ में शबाना, इमरान के केस में 2009 में फैसला हो चुका है। एडवोकेट सैयद राशिद अली बताते हैं कि तलाक देने के लिए रीजन यानी कारण बताना ही पड़ता है। दोनों विधियों में तलाक से पहले सुलह के प्रयास होना जरूरी बिंदु बताया गया है। मेंटनेंस यानी गुजारा भत्ता दिया जाना एक अलग मुद्दा है।
यूरिन इनकांटिनेंस – महिलाओं का एक आम मर्ज
इसी तरह तलाक का कारण माननीय न्यायालय को बताना जरूरी टर्म है। इस मुद्दे पर एडवोकेट शबनम खान कहती हैं कि मुस्लिम विधि में इद्दत का पीरियड और उसका पालन करना भी एक जरूरी शर्त है। सबसे अहम पहलू यह है कि तलाक देने का अधिकार सिर्फ मर्द को है और कोई भी मर्द अपनी मर्जी से अपनी हमसफर यानी शरीके हयात को कभी भी, कहीं भी मुंह जबानी तलाक के ब्रह्मास्त्र जैसे लफ्ज दाग सकता है, फिर उसका फलसफा जो भी हो। बस इस प्रक्रिया के लिए सिर्फ दो गवाहों की गवाही मान्य है। इस गवाही के आधार पर एक औरत जिंदगी भर तलाक के दर्द और जख्मों को ढेलने को मजबूर होती है। आखिर क्या इस दकियानूसी परंपरा और कानून को बदलने की जरूरत नहीं है।
– जावेद खान

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