तनाव मुक्ति के लिए जरूरी है समस्याओं से मुक्ति

तनाव मुक्ति के लिए जरूरी है समस्याओं से मुक्ति

तनाव आज के युग की सबसे भयंकर मानसिक व्याधि है। तनाव से ही अधिकतर शारीरिक रोग पैदा होते हैं। तनाव दूर करके आप न केवल मनोदैहिक रोगों से बच सकेंगे अपितु सदैव स्वस्थ, प्रसन्नचित्त तथा उत्साही भी बने रहेंगे। लेकिन तनाव क्यों होता है? तनाव का प्रमुख कारण हैं विभिन्न समस्याएँ। समस्याएँ जीवन का एक अपरिहार्य अंग हैं। यदि सदैव स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त बने रहना है तो समस्याओं से भागने की अपेक्षा उनका मुक़ाबला कीजिए और एक-एक कर उन्हें समाप्त कर डालिए। समस्याओं का निराकरण किसी भी तरह एक उपचार प्रक्रिया से कम नहीं। ये तनाव या मानसिक व्याधियाँ ही बाद में शारीरिक व्याधियाँ बन कर आपका स्वास्थ्य क्षीण कर आपकी कार्य क्षमता समाप्त कर देती हैं तथा आपका सुख-चैन छीन लेती हैं। इन समस्या रूपी पौधों को पनपने मत दीजिए, उन्हें फौरन जड़ से उख़ाड़ फेंकिए। आपको सिर्फ़ इतना करना है:
– कार्यों अथवा समस्याओं को कल पर मत टालिए। आज ही समाधान की दिशा में अग्रसर हो जाइए।
– यदि कोई कार्य आज किसी भी क़ीमत पर नहीं हो रहा है तो घबराइए नहीं और न ही उसे उलझाइए अपितु कल फिर प्रयास कीजिए।
– समस्याओं को आपस में मिलाने की बजाय एक-एक करके सुलझाइए।
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– यदि समस्या बहुआयामी है तो समस्या को टुकड़ों में विभाजित कर लीजिए और समस्या के एक-एक भाग को निपटाते रहिए।
– यदि बहुत सारे कार्य करने हैं तो भी घबराइए मत। कार्यों की प्राथमिकता के आधार पर एक सूची बना लीजिए और एक-एक करके निपटाते चलिए।
ह्म् कार्य को भली-भाँति सम्पन्न करने के लिए ज़रूरी है कि जो काम सामने है उसे सबसे महत्त्वपूर्ण समझकर उसे पूरा करने के लिए अपना सारा घ्यान तथा संपूर्ण इच्छा शक्ति उस पर केंद्रित कर दीजिए सफलता अवश्य मिलेगी।
– कार्य को सर्वश्रेष्ठ तरीके़ से करने का इंतज़ार मत कीजिए अपितु उपलब्ध श्रेष्ठ तरीक़े पर अमल कीजिए। उससे बेहतर और बेहतरीन तरीक़े अपने आप विकसित होते चले जाएँगे।
– समस्याओं के बावजूद काम करते रहिए न कि उस समय की प्रतीक्षा जब समस्याएँ ही न रहें अथवा कार्य करने में कठिनाई न आए।
– जब तक सफलता नहीं मिल जाती पूर्ण आत्मविश्वास और धैर्य के साथ निरंतर प्रयास करते रहिए।
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– अंत तक हार मत मानिए। किसी समस्या को हल न कर पाना आपकी हार नहीं है बल्कि अंत तक प्रयास न करना आपकी सबसे बड़ी हार है।
– कार्य की सफलता के लिए ज़रूरी है कि कार्य को आधा-अधूरा नहीं बल्कि समग्र रूप से किया जाए।
– कार्य या समस्या के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलकर अथवा सकारात्मक बनाकर भी हम उसे आसानी से पूरा कर तनाव तथा तनावजन्य शारीरिक व्याधियों से बच सकते हैं।
– इसके अतिरिक्त जीवन में तनाव की अपेक्षा प्रसन्नता प्रदान करने वाले क्षणों को खोजते रहना अनिवार्य है।
– जीवन में सहजता अपनाकर भी हम तनावप्रद स्थितियों से बच सकते है। जीवन में यदि हम थोड़ा सहज और संतुलित होकर निर्णय लें तो न केवल तनाव से बच सकते हैं अपितु अतिरिक्त आनंद के क्षण भी उत्पन्न कर सकते हैं।
– सीताराम गुप्ता

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