डेमोक्रेटिक ड्रामे में ‘डांस’ क्यों करते गवर्नर?

डेमोक्रेटिक ड्रामे में ‘डांस’ क्यों करते गवर्नर?

Rajeev Ranjan Tiwaसवाल यह नहीं है कि अरुणांचल में भाजपा के हाथ से सत्ता छीन गई है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कांग्रेस बहाल हो गई है। जबकि असल मुद्दा यह है कि केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में राज्यों में बैठे राज्यपाल असंवैधानिक कार्य क्यों करते हैं कि कोर्ट को उनका फैसला बदलना पड़ता है। यह पहली बार है जब सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी सरकार को वापस किया है। इस बदले हालात में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बयान की तारीफ होनी चाहिए। नीतीश ने कहा है कि जब राज्यपालों की कार्यशैली असंवैधानिक की श्रेणी में है तो फिर उनकी राज्यपाल जरूरत ही क्या है। क्यों ना राज्यपालों के पद को खत्म कर दिया जाए। बीते दिनों दिल्ली में अंतर-राज्य परिषद की बैठक में पहुंचे नीतीश ने पीएम नरेन्द्र मोदी के सामने ही कहा कि राज्यपाल की नियुक्ति से संबंधित प्रावधान को स्पष्ट परिभाषित किया जाना चाहिए। नीतीश का ये बयान अरुणाचल और उत्तराखंड के हालिया घटनाक्रम से जुड़ा हुआ माना जा रहा है। जहां राज्यपाल के रोल पर सवाल खड़े हुए थे। अरुणाचल में राज्यपाल के रवैये पर खुद सुप्रीम कोर्ट ने भी निशाना साधा था। सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल के तत्कालीन राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा पर शक्तियों से परे विधानसभा का सत्र बुलाने पर भी सवाल खड़े किए थे। फिलहाल अरुणाचल में हालात बदल गए हैं और यहां पेमा खांडू के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बन गई है। इससे पहले उत्तराखंड में भी कांग्रेस की हरीश रावत सरकार की मुश्किलें बढऩे में कहीं न कहीं राज्यपाल का ही रोल था। यहां भी सुप्रीम कोर्ट ने ही अहम फैसला देकर हरीश रावत सरकार को पुन: सत्ता में लौटाई। इन उदाहरणों से राज्यपालों के फैसले सवालों में हैं। ऐसे में नीतीश का राज्यपालों को लेकर ताजा बयान अहम है। यूं कहें कि राज्यपालों को सियासी दलों की भांति डेमोक्रेटिक ड्रामे में ‘डांस’ करने से बचना चाहिए।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि राज्यपाल का पद समाप्त होना चाहिए। वर्तमान संघीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह रहना जरूरी नहीं है। पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई अंतरराज्यीय परिषद की बैठक में नीतीश की टिप्पणी तब आयी जब सुप्रीम कोर्ट ने अरूणाचल के राज्यपाल की कांग्रेस सरकार की बर्खास्तगी पर आलोचना की थी। नीतीश ने कहा कि यदि संवैधानिक पद समाप्त करना संभव नहीं है तो उसके विवेकाधीन अधिकारों में कटौती हो। किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री की राज्यपाल की नियुक्ति और उसे हटाने में भूमिका होनी चाहिए। यदि उसे समाप्त करना संभव नहीं है तो राज्यपाल की नियुक्ति से जुडे प्रावधानों की स्पष्ट रूप से व्याख्या कर उसे पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। इसके अलावा राज्य के मुख्यमंत्री से भी मशविरा किया जाना चाहिए। राज्यपाल की नियुक्ति में सरकारिया आयोग के मापदंड का पालन किया जाना चाहिए। जब भी कोई नयी सरकार बनती है तो राज्यपाल को बदलने की प्रवृत्ति पर संवैधानिक प्रावधान करके रोक लगनी चाहिए। जरूरी हो तो ऐसे मशविरे के लिए संविधान के अनुच्छेद 155 में संशोधन भी किया जा सकता है। नीतीश ने केंद्र-राज्य संबंधों पर पंछी आयोग की रिपोर्ट का उल्लेख किया, जिसमें सिफारिश है किसी मुख्यमंत्री को हटाने से पहले राज्यपाल को सदन के नेता को सदन में बहुमत साबित करने का मौका देना चाहिए।
दरअसल, अरुणाचल में बर्खास्त कांग्रेस सरकार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहाल करने के बाद गवर्नर के पद के औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं। अरुणाचल की बर्खास्त नबम तुकी सरकार को बहाल करने का फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा के बारे में कड़ी टिप्पणियों के कारण राजखोवा के अपने पद पर बने रहने के औचित्य पर सवाल तो खड़े हो ही रहे हैं साथ राज्यपाल के पद की जरूरत का मुद्दा भी बहस के केंद्र में आने लगा है। लगता है कि अब विधानमंडलों और संसद के सदनों के पीठासीन अधिकारियों की भूमिका पर भी बहस होगी, क्योंकि इन संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों का कर्तव्य है कि वो पद पर रहते हुए राजनीतिक निष्ठाओं को भूलकर निष्पक्ष काम करें। एक अंपायर की तरह जिसका लगाव या खिंचाव किसी भी टीम के साथ नहीं होती। पर दुर्भाग्य है कि ऐसा हो नहीं रहा है। वजह स्पष्ट है कि राजनीतिक दल सत्ता में रहते इन पदों का अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैं और विपक्ष में होने पर विरोध। यही कारण है कि 1980 के दशक में गठित सरकारिया आयोग की सिफारिशें अब तक लागू नहीं हुई, जिसमें था कि राज्यपाल ऐसे व्यक्ति को बनना चाहिए जो राजनीति से दूर हों। लेकिन राज्यों के राजभवन उन नेताओं के आरामगाह बन गए हैं जो या तो चुनाव हार गए हैं या इतने बुजुर्ग हैं कि चुनाव नहीं लड़ सकते अथवा जिन पर भ्रष्टाचारी होने के कारण मुकदमा चलने का अंदेशा है। सत्ता में आने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार ने जिन्हें राज्यपाल नियुक्त किया, वे सभी भाजपा या आरएसएस में सक्रिय रहे हैं।
अरुणाचल प्रकरण को यदि सियासी नजरिए से देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि उत्तराखंड के बाद मोदी सरकार व भाजपा के लिए न सिर्फ दूसरा बड़ा झटका है बल्कि सबक भी है। सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल के राज्यपाल के फैसले को गलत बताकर 15 दिसंबर, 2015 से पहले वाली स्थिति बहाल करने को कह दिया। गौरतलब है कि अरुणाचल की नबाम तुकी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार दिसंबर में बर्खास्त कर दी गई थी। उस समय कांग्रेस विधायक दल में बगावत के चलते तुकी सरकार का बहुमत संदिग्ध था। पर राज्यपाल ने जो किया, वह पूरी तरह असंवैधानिक था। राज्यपाल ने बिना मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष के मशविरा के बगैर ही विधानसभा का सत्र आहूत कर डाला। विधानसभा का वह सत्र एक कम्युनिटी हॉल में संपन्न हुआ, जिसमें कांग्रेस के सैंतालीस में से इक्कीस और भाजपा विधायकों ने मिल कर मुख्यमंत्री नबाम तुकी और विधानसभा अध्यक्ष नबाम रेबिया को पद से हटाकर कांग्रेस के बागी विधायक दल के नेता कलिखो पुल को सीएम चुन लिया। इस सारे नाटकीय घटनाक्रम में राज्यपाल की भूमिका शुरू से विवादित रही। इसीलिए संविधान पीठ की टिप्पणी है कि राज्यपाल को मतभेद, सियासी झगड़े, दलगत असंतोष और टूट-फूट से परे होना चाहिए। इस तकाजे को राजखोवा भी समझते होंगे, पर उन्हें केंद्र के अपने आकाओं को खुश करना था।
खास बात यह है कि अरुणाचल में मिली कामयाबी से उत्साहित भाजपा ने उत्तराखंड में भी वैसा ही खेल दोहराने की कोशिश की। पर वहां बागी कांग्रेस विधायकों से हाथ मिला कर हरीश रावत सरकार को अस्थिर करने का दांव बेकार गया। 12 मई को सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन को खारिज और रावत सरकार को बहाल कर दिया। इसके दो महीने बाद अरुणाचल के मामले में भी कांग्रेस की कानूनी जीत हुई। अनुच्छेद 356 के बेजा इस्तेमाल के लिए कांग्रेस को भाजपा कोसती आई थी, लेकिन कैसी विडंबना है कि कांग्रेस-मुक्त भारत का दम भरते हुए भाजपा ने कांग्रेस के ही एक खराब रिकार्ड का अनुसरण किया।
विपक्ष में रहते हुए भाजपा संघीय भावना का दम भरती है, पर अब खुद संघीय भावना को कुचलने व संघीय ढांचे की तौहीन पर कठघरे में है। संविधान की व्यवस्था के अनुसार जिस तरह राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करने को बाध्य हैं, उसी तरह राज्यपाल भी राज्य की मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं। केवल राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति में इनकी भूमिका खास हो जाती है। उसी वक्त राज्यपाल की निष्पक्षता की परीक्षा होती है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो अधिकांश राज्यपाल केंद्र सरकार व सत्तारूढ़ पार्टी के एजेंट के रूप में ही काम करते देखे गए हैं। बहरहाल, पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने एक बर्खास्त सरकार को बहाल करने का अभूतपूर्व निर्णय लिया। पीएम नरेंद्र मोदी अक्सर सहयोगपूर्ण संघवाद की बात करते हैं, लेकिन उनकी सरकार व उसके इशारे पर काम करने वाले राज्यपालों का आचरण इसके विपरीत है। इस प्रकार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यपालों की अहमियत पर जो सवाल उठाया है वह बेहद महत्वपूर्ण और गंभीर है। निश्चित रूप नीतीश की उन बातों पर विचार किया जाना चाहिए।
राजीव रंजन तिवारी

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