डिगेंगे नहीं, डिगाने वालों का हौसला डिगाएंगे लालू

डिगेंगे नहीं, डिगाने वालों का हौसला डिगाएंगे लालू

छापे अब दिल नहीं दहलाते। जिस पर छापा पड़ता है, वह डरता नहीं बल्कि इसे अपने स्टेटस सिंबल से जोड़कर देखता है। वह छापे पड़ने से डरता नहीं, बल्कि छापा डालने वालों को डराता है। यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों और परंपराओं के अनुरूप तो नहीं ही कही जा सकती। सुधार जीवन की आवश्यकता है लेकिन जिसने न सुधरने का मन बना लिया हो, जेल जीवन भी उसके लिए अत्यंत सुखद हो जाता है। लोक जीवन में गिरावट का स्तर यह है कि व्यक्ति आत्ममंथन करना ही नहीं चाहता। वह अपने विकास में ही लोक का विकास देखता है। उसे इस बात का भ्रम हो गया है कि वह जो कर रहा है, वही सही है। बाकी सब गलत है। जब व्यक्ति के दिल से कार्रवाई का डर खत्म हो जाए तो ऐसे व्यक्ति का भगवान ही मालिक है।
छापा छोटा हो या बड़ा, उसकी अपनी गूंज तो होती ही है। जिस पर छापा पड़ता है, कांपता तो उसका भी हृदय है लेकिन राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव कमाल के आदमी हैं। उनके ठिकानों पर छापा पड़ता भी है और उन्हें पता भी नहीं चलता। लखनऊ और सैफई के उनके रिश्तेदारों को पता चल जाता है। वे इसके लिए केंद्र सरकार की आलोचना भी करते हैं और लालू प्रसाद यादव और उनके परिजनों को आयकर छापे की भनक तक नहीं लगती। अधिकांश मोदी विरोधी दल लालू प्रसाद यादव के दिल्ली एनसीआर के ठिकानों पर छापे की निंदा कर रहे हैं और मोदी सरकार पर आयकर विभाग और सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगा रहे हैं लेकिन लालू प्रसाद पहले ही दिन से छापों को नकार रहे हैं। ट्वीट पर ट्वीट किए जा रहे हैं। कैसा छापा, कहां छापा। वे तो अखबार और चैनल वालों को भी यह बताने को कह रहे हैं कि वे बताएं कि मेरे किन-किन ठिकानों पर छापा पड़ा है। केंद्र सरकार और खासकर आयकर विभाग को सोचना होगा कि ऐसा छापा किस काम का कि भुक्तभोगी पर असर ही न हो और सगरे जवार में डंका बज जाए।
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सवाल यह उठता है कि अगर छापा पड़ा ही नहीं है तो लालू प्रसाद यादव इतने अधिक बौखलाए क्यों हैं? बार-बार वे मोदी की लंका को भस्म करने की चेतावनी क्यों दे रहे हैं? बिना आग के धुआं कैसे उठ रहा है? मतलब साफ है कि आयकर विभाग का छापा तो पड़ा है। लालू यादव अंदर का सच छिपा रहे हैं। पर्दा डालना उनका पुराना स्वभाव है। अगर लालू प्रसाद यादव के ठिकानों पर छापा नहीं पड़ा था, उनके परिचितों और रिश्तेदारों के घर छापा नहीं पड़ा था तो राजद प्रमुख ने यह क्यों कहा कि मोदी सरकार को नया पार्टनर मुबारक। उनका इशारा निश्चित रूप से नीतीश कुमार की ओर था। जिस समय लालू प्रसाद यादव इस आशय का ट्वीट कर रहे थे, उसी समय जदयू के एक बड़े नेता इस छापेमारी का विरोध कर रहे थे। मतलब साफ है कि राजद और जद यू के बीच अनुकूल और सकारात्मक माहौल नहीं है। दोनों दलों के बीच गठबंधन की गाड़ी बस सरक रही है। केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री रामबिलास पासवान भी नीतीश कुमार को सलाह देते नजर आए हैं कि अगर उन्हें लगता है कि वे लालू यादव से गठबंधन कर बिहार की कानून व्यवस्था को दुरूस्त नहीं कर पा रहे हैं तो उन्हें एनडीए में शामिल हो जाना चाहिए। कमोवेश इसी तरह के संकेत बिहार के वरिष्ठ भाजपा नेता सुशील मोदी भी दे चुके हैं।
ललू प्रसाद यादव ने भाजपा को यह कहकर चेतावनी दी है कि ‘मैं मोदी की लंका को ध्वस्त कर दूंगा। छापा-छापा चिल्लाते हो ना, छापा तो हम मारेंगे 2019 में। बीजेपी को चैन से नहीं बैठने देंगे। बीजेपी और आरएसएस वाले लालू को डराने चले हैं, मैं किसी से डरता नहीं हूं, सुनो बीजेपी और आरएसएस वालों, लालू तुम्हें दिल्ली के सिंहासन से जल्द ही उतार देगा। मुझे डराने, धमकाने की कोशिश मत करो।’ अगर एक हजार करोड़ की बेनामी संपत्ति की जांच के सिलसिले में राजद प्रमुख के 22 ठिकानों पर छापा नहीं पड़ा था तो उनकी चेतावनी में बार-बार छापा शब्द कहां से आ रहा है? एक बार वे भाजपा को नए साथी की मुबारकवाद देते हैं और राजनीतिक हलकों में जब उनकी मुबारकवाद के निहितार्थ निकाले जाते हैं तो वे उसी तेजी के साथ अपनी बात से मुकर भी जाते हैं। उनका अगला ट्वीट होता है कि ये साथी जांच एजेंसियां हैं। लालू बिहार के कई बार मुख्यमंत्री भी रहे और देश के रेलमंत्री भी। जांच एजेंसियां सरकार की मातहत तो हो सकती हैं। उसके इशारे पर काम तो कर सकती हैं लेकिन उसकी साथी नहीं हो सकतीं। राजद प्रमुख को साथी और मातहत का फर्क तो मालूम होना ही चाहिए। वे यह भी कहते हैं कि भाजपा की जवानी खत्म हो चुकी है। कितना भी घी-मलीदा खा ले, उसकी जवानी लौटने वाली नहीं है। विचारणीय तो यह है कि अगर भाजपा की जवानी बची ही नहीं है तो लालू प्रसाद यादव मरे को मारने पर क्यों आमादा हैं। वह बुजुर्ग हो चुकी भाजपा को मिटाना क्यों चाहते हैं?
बकौल लालू जब उनके ठिकाने पर छापेमारी हुई ही नहीं है तो उनकी उत्तेजना का कोई कारण समझ में नहीं आता। राजद प्रमुख की एक बात और विस्मयकारी है। ‘मैं दूसरों का हौसला डिगाता हूं, मेरा हौसला कौन डिगाएगा?’ इसमें कोई शक नहीं, लालू जैसे लोग हौसला डिगा ही सकते हैं। बढ़ा नहीं सकते हैं। उनके इस स्वभाव का खामियाजा बिहार आज तक भुगत रहा है। जब बिहार में नक्सलवादी घटनाएं पैर पसार रही थीं, तब उन्होंने उनका हौसला नहीं डिगाया बल्कि जो सवर्ण नक्सलियों के विरोध में खड़े हुए, उनका हौसला लालू यादव ने हमेशा पस्त किया। इसका नतीजा हुआ कि पूरे बिहार में नक्सलवाद बुरी तरह फैल गया। राज्य के बंटवारे के बाद अगर झारखंड और विभाजित बिहार के कुछ जिले नक्सलवादी आतंक की चपेट में हैं तो इसकी बड़ी वजह लालू प्रसाद यादव और उनकी जातिवादी राजनीति ही है।
ऑनलाइन वोटिंग प्रणाली के हक में नहीं चुनाव आयोग : जैदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वे झांसों का राजा कहते हैं लेकिन यह क्यों भूल जाते हैं कि घपलों-घोटालों की बादशाहत के चक्कर में वे कई बार जेल की हवा खा चुके हैं और एक बार फिर जेल के दरवाजे उनका खैरमकदम करने को बेताब हैं। लालू प्रसाद यादव खुद को अंगद बताते हैं। अंगद के पास सच्चाई का बल था लेकिन राजद प्रमुख के पास थेथरई का बल है। अपनी बात से मुकरने का बल है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘मैं अंगद की तरह पैर गाड़ के खड़ा हूं, बीजेपी को चैन से नहीं रहने दूंगा। अचक डोले..कचक डोले..खैरा-पीपल कभी ना डोले।’ खैरा पीपल क्यों नहीं डोलता। डोलता तो वह है जिसमें सामर्थ्य हो। जिसमें सामर्थ्य ही नहीं, रुग्णता गले तक चापे पड़ी हो, वह डोले या खुद पर रोवै। इस बावत भी कभी सोचा है क्या। पीपले पत्ते तो हर क्षण डोलते रहते हैं। मन की गति सा डोलते हैं। ‘पीपर पात सरिस मन डोला।’
राजद प्रमुख को इस बात का मुगालता है कि संघ और भाजपा को उनके नाम से कंपकंपी छूटती है। उन्हें पता है कि वे इनके झूठ, लूट और जुमलों के कारोबार को ध्वस्त कर रहे हैं तो दबाव बना रहे हैं। लालू प्रसाद, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी की आवाज को बंद करने की कोशिश की जा रही है। आवाज खत्म नहीं होगी और अब अवाम इस लड़ाई को अपने हाथ में लेगी। इधर कांग्रेस वाले भी लालू जैसी ही बात बोल रहे हैं। पी चिदंबरम ने भी कहा कि सीबीआई के छापों से वे डरने वाले नहीं हैं। वे सरकार के खिलापफ अखबारों में लिखना बंद नहीं करेंगे। इस देश के नेताओं को आखिर हो क्या गया है? उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में यह बात कही कि अगर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोग और श्यामा प्रसाद मुखर्जी सरीखे नेता प्रयास न करते तो पंजाब, बंगाल और कश्मीर आज भारत के पास नहीं होते। पाकिस्तान का हिस्सा होते। सुशील मोदी ने एक बार फिर लालू परिवार की संपत्ति को लेकर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि पटना के जिस जीवी मॉल में शनिवार की सुबह आग लग गई, उसमें भी लालू के परिवार की संपत्ति थी। जीवी मॉल प्रवीण यादव के बेटे और राजद विधायक नारायण का है उसमें लालू की बेटी रोहिणी का भी ऑफिस है, जो इस बिल्डिंग में 2014 में खरीदी गई थी। इस कार्यालय की कीमत 58 लाख रुपये है। पटना के सीजेएम कोर्ट में राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा व प्रदेश प्रवक्ता चितरंजन गगन के खिलाफ दर्ज मानहानि के मुकदमे में गवाही देते हुए उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द गुप्ता, ओमप्रकाश कत्याल, विवेक नागपाल,अशोक बंथिया जैसे लोगों द्वारा लालू परिवार को दी गई अनेक बेनामी कम्पनियां और करोड़ों की जमीन तथा पटना में बन रहे उनके 750 करोड़ के माल का वे खुलासा कर चुके हैं । इसलिए आरोपी उनके खिलाफ निराधार बयानबाजी और उल जुलूल आरोप लगा रहे हैं। विचारणीय तो यह है कि राजनेताओं के दिल से डर नाम की चीज समाप्त क्यों हो गई है। उन्हें न कानून से डर लगता है और न ही इस देश और प्रदेश को जनता से। डरने और डराने की यह राजनीति इस देश-प्रदेश को कहां ले जाएगी, यह सोचने वाली बात है। क्या भ्रष्टाचार ही इस देश का शिष्टाचार बन जाएगा और यदि हां तो इस समस्या का समाधान क्या है? इस पर मंथन आखिर कौन करेगा?
  – सियाराम पांडेय ‘शांत’ 

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