ट्रंप से भारत को हैं काफी उम्मीदें..20 जनवरी को संभालेंगे पद : सुधांशु द्विवेदी

ट्रंप से भारत को हैं काफी उम्मीदें..20 जनवरी को संभालेंगे पद : सुधांशु द्विवेदी

अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी में यूएस केपिटोल के बाहर निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। डोनाल्ड ट्रंप 20 जनवरी को दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के राष्ट्रपति का पद संभालने वाले हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के काफी रोचक और चुनौतीपूर्ण मुकाबले में डोनाल्ड ट्रंप ने हिलेरी क्लिंटन को पराजित करके विजयी ध्वज फहराया है तो अब उम्मीद की जाती है कि ट्रंप अमेरिका के आदर्श राष्ट्रपति के रूप में भी अपनी कामयाबी का झंडा गाड़ेंगे तथा भारत के हित उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता में होंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में जिस तरह से भारतीय मूल के अमेरिकी जनमानस ने तथा भारतवासियों ने डोनाल्ड ट्रंप के प्रति अपना समर्थन जताया था तथा उनके जीत की कामनाएं की थीं, उससे स्पष्ट है कि दक्षिण एशिया में उभरती हुई ताकत बनने में भारत के मार्ग में जो भी विध्न-बाधाएं हैं, उनसे निपटने में डोनाल्ड ट्रंप भारत के बड़े मददगार साबित होंगे। डोनाल्ड ट्रंप के पास भले ही राजनीतिक, कूटनीतिक या प्रशासनिक अनुभव न हो लेकिन उन्होंने अमेरिका के एक प्रतिष्ठित और कामयाब व्यवसायी के रूप में जो सफलता अर्जित की है, वह भी तो उनकी काबिलियत, दक्षता व कौशल का ही पर्याय है। इस प्रकार दक्षिण एशिया में चीन की भारत के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा तथा पाकिस्तान के वैमनस्यतावादी रवैये से निपटने में निर्वतमान राष्ट्रपति बराक ओबामा भले ही भारत के उतने बड़े हितैषी साबित न हो पाए हों लेकिन डोनाल्ड ट्रंप तो यह भूमिका बखूबी निभा ही सकते हैं। उन्होंने चुनाव से पहले भारत के पक्ष में काफी बातें कही थीं तथा चीन और पाकिस्तान पर कई बार निशाना साधा था। आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान के प्रति डोनाल्ड ट्रंप का कई बार हमलावर रुख सामने आया है, इस प्रकार अब बारी डोनाल्ड ट्रंप की भारतहितैषी सोच को कार्य रूप में परिणत करने की होगी।
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अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा और वहां के अन्य बड़े पदों पर आसीन लोग भले ही भारत यात्रा करते रहे हों तथा भारत सरकार द्वारा उनकी खूब आवभगत की जाती रही हो लेकिन उन्होंने भारत के हितों को कभी भी ईमानदारीपूर्वक तवज्जो नहीं दी। भारत संबंधी उनके कूटनीतिक रवैये में हमेशा कूटनीति और फूटनीति ही हावी रही तथा भारत की सरजमीं पर आये दिन आतंकी घुसपैठ व हमले होते रहे लेकिन अमेरिका के शासननाध्यक्षों ने निंदा-आलोचना की रस्म अदायगी को छोडक़र कभी भी कोई प्रभावी कदम उठाना उचित नहीं समझा। सार्वजनिक बयानों में उनके द्वारा भले ही कई बार भारत की महिमा का खूब बखान किया गया तथा भारत के पक्ष में लंबे-चौड़े बयान भी जारी किये जाते रहे लेकिन धरातल पर कोई ठोस काम उन्होंने शायद ही कभी किया हो। आतंकवाद को लेकर भारत की पीड़ा से पूरा विश्व वाकिफ है तथा इस मुद्दे को लेकर खुद के संकटग्रस्त होने पर अमेरिका की संवेदनशीलता व तत्परता भी देखने को मिलती रही है लेकिन जब आतंकवाद के मुद्दे पर कभी भी भारत के हितों की बारी आई तो अमेरिका के शीर्ष पदों पर आसीन लोगों ने कभी भी दरियादिली नहीं दिखाई। कश्मीर की वादी यूं ही पाकपोषित और पाक प्रायोजित आतंकवाद का शिकार होते हुए रक्तरंजित होती रही तथा भारत की सरजमीं में आतंकी घुसपैठ के साथ-साथ हमले भी होते रहे लेकिन अमेरिका का पाकिस्तान से याराना कभी खत्म नहीं हुआ तथा अमेरिका द्वारा भारत के प्रति सिर्फ झूठी हमदर्दी भी दिखाने की कोशिश की जाती रही लेकिन जब कभी भी कोई प्रभावशाली कदम उठाने की बारी आयी तो अमेरिकी नेतृत्व की पाकिस्तान परस्त छवि व सोच ही उजागर हुई।
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अभी हाल ही में चीन ने एनएसजी के मुद्दे पर भारत का बड़ा अपमान किया है, चीन का अगर यह कहना है कि एनएसजी की सदस्यता तोहफे में नहीं मिलती तो भारत के इस अपमान के लिये अमेरिका भी तो जिम्मेदार है, क्यों कि उसने अगर एनएसजी की सदस्यता को लेकर भारत के प्रति थोड़ा भी उदारतापूर्ण रुख अपनाया होता तथा सक्रियता दिखाई होती तो दुनिया के अन्य वांछित देशों का इस मुद्दे पर समर्थन पाने में भारत को मदद मिलती। लेकिन एनएसजी के मुद्दे पर जब भारत के हित और पक्ष की बारी आई तो अमेरिका पूरी तरह तमाशबीन की भूमिका निभाता हुआ नजर आया। इस प्रकार अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा भले ही अब व्हाइट हाउस से विदा होने वाले हों लेकिन उनके खाते में भारतहितैषी कुछ खास उपलब्धियां दर्ज नहीं हैं वहीं अब व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप का कब्जा होने जा रहा है तो उनसे यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वह अमेरिका के पिछले शासनाध्यक्षों की गलतियों को नहीं दोहराएंगे तथा अमेरिका की अवसरवादी छवि के विपरीत वह ऐसे प्रयास निरंतर करेंगे कि विश्व में शांति के संवर्धन और मानवता के संरक्षण में अमेरिका की ईमानदार व प्रतिबद्ध छवि स्थापित हो सके। आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है तो इसके जन्मदाता और संरक्षक पाकिस्तान व उसके जैसी अमानवीय व पैषाचिक सोच रखने वाले कतिपय देश ही हैं, जिन्होने न तो हालात से कोई सबक लिया है और न ही उन्हें अपने भविष्य की कोई चिंता है। वह अपने वजूद को दांव पर लगाकर भी भारत सहित विश्व के अन्य देशों को आतंकित करते रहना चाहते हैं। पाकिस्तान भले ही आज तक भारत के खिलाफ कोई युद्ध नहीं जीत पाया हो तथा भारत के खिलाफ कोई सीधी जंग लडऩे में आज भी उसकी कोई हैसियत न हो लेकिन भारत विरोधी छद्मयुद्ध का तो उसने खुद को महारथी ही मान लिया है। ऐसे हालात में अमेरिका के राष्ट्रपति पद की बागडोर संभालने जा रहे डोनाल्ड ट्रंप से अपेक्षाएं यही रहेंगी कि वह भारतीयों की मंशा के अनुरूप भारत के हितों को पर्याप्त महत्व दें तथा चीन और पाकिस्तान जैसे जटिल और कुटिल देशों के प्रति उनके सख्त रवैये में कोई बदलाव न आये। 

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