ज्यादा देर तक न पकाएं खाना…स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है अधपका भोजन

ज्यादा देर तक न पकाएं खाना…स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है अधपका भोजन

 आज आधुनिकता की होड़ में शामिल होते लोग डिब्बाबंद ब्रांड, मार्का व कीमती पौष्टिक आहार ही लेना पसंद करते हैं लेकिन अनेक शोधों ने यह सत्यापित कर दिया है कि प्रकृति प्रदत्त खाद्य सामग्री ही सर्वाधिक स्वास्थ्यवद्र्धक होती है। वैसे प्राचीन काल में हमारे पूर्वज कंद-मूल-फल खाकर ही शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक दृष्टि से काफी पुष्ट रहा करते थे।
खाद्य सामग्री का सिर्फ पौष्टिक होना ही आवश्यक नहीं है वरन् उसे पकाने और खाने का तरीका भी विशिष्ट महत्त्व रखता है। तेज आग पर अधिक देर तक खाना पकाने से उसकी पौष्टिकता में काफी कमी आ जाती है। इतना ही नहीं, आज के समय में लोगों के दिल में यह बात घर कर गयी है कि चिकनाई व मसाले में तलने-भूनने से भोजन स्वादिष्ट व पौष्टिक हो जाता है लेकिन यह कोरा भ्रम ही है क्योंकि ऐसा करने से भोजन स्वादिष्ट तो अवश्य हो जाता है लेकिन वह स्वास्थ्यवर्धक नहीं रहता। इस प्रकार के खाद्य पदार्थ मादक द्रव्य (नशीले पदार्थ) का रूप धारण कर लेते हैं और शरीर के अंदर विकृति पैदा करते हैं।
खाना बनाने के साथ-साथ इसे ग्रहण करने का तरीका भी होता है। भोजन को अच्छी तरह से चबाकर खाने से मुख से विभिन्न प्रकार के एन्जाइम्स व पाचक रस निकलते हैं जिससे भोजन पचने में आसानी होती है। भोजन कड़ी भूख लगने पर ही करना चाहिए क्योंकि बिना कड़ी भूख के भोजन करने से अपच होने का डर बना रहता है। बिना पचा हुआ भोजन पेट में सडऩे लगता है और इससे विषैली गैस उत्पन्न होती है।
हरी शाक-सब्जी बिना पकाये या कम पका कर, अन्नों को अंकुरित कर खाना बहुत ही लाभदायक होता है। अन्नों को अंकुरित होते समय बीजों में उपस्थित प्रोटीन, विटामिन, एन्जाइम एवं खनिज लवण की वृद्धि असाधारण रूप से होती है। अंकुरण के समय अन्न की जीवनी शक्ति का विकास अधिक मात्रा में होता है। अंकुरित अनाज में प्रोटीन की प्रचुरता होती है, साथ ही साथ जटिल एवं गरिष्ठ प्रोटीन का रूपांतरण, सरल प्रोटीन अमीनो एसिड्स में हो जाता है।
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बीज का अंकुरण हो जाने के कारण उसमें श्लेष्मा की मात्रा न के बराबर रह जाती है। फलस्वरूप गैस-दोष भी उत्पन्न नहीं होता। अंकुरित गेहूं में विटामिन ‘सी’ की मात्रा 300 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इसी प्रकार ‘विटामिन-‘बी कॉम्पलेक्स’ की मात्रा भी अंकुरण की प्रक्रिया में कई गुना बढ़ जाती है।
तेज आग पर उबाल देने से बीजों की अंकुरण क्षमता नष्ट हो जाती है और जीवनी शक्ति की मात्र भी काफी घट जाती है। अंकुरित करने के लिए किसी भी अनाज के दाने का प्रयोग किया जा सकता है। अंकुरित आहार की कम मात्र ग्रहण करने पर भी पोषण की आवश्यकता पूरी हो जाती है।
प्राकृतिक विधि द्वारा पके अन्न व फल काफी लाभप्रद होते हैं। इनमें शरीर के पोषण के लिए आवश्यक सभी तत्व विद्यमान रहते हैं। जंगली जेब्रा, हिरण, जिराफ, हाथी, जंगली भैंसे, नीलगाय, पक्षी, तोता, मैना, कबूतर आदि हमेशा फल-फूल, अन्न-पत्तियां आदि खाते हैं। यही कारण है कि वे अधिकांशत: बीमार नहीं होते।
भोजन को पकाने का उचित तरीका क्या है तथा उसे कैसे खाना चाहिए, इसकी जानकारी अवश्य होनी चाहिए क्योंकि इसके बिना स्वास्थ्य अनुकूल नहीं रहता। सही भोजन पकाने से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण बातें निम्नानुसार हैं-
– जहां तक संभव हो सके, आवश्यकता से अधिक तापन अर्थात अधिक उबालने, भापने, तलने, भूनने, सेंकने आदि से तब तक बचना चाहिए जब तक कि बहुत आवश्यकता न हो।
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– अधिक पानी में पकाना और फिर उस पानी को फेंक देने से भी अत्यधिक पौष्टिक तत्वों (सोडियम, पोटेशियम आदि के लवण की) की हानि होती है जैसे-चावल से मॉड को पसाना, सब्जियों को उबालकर उस पानी को फेंक देना आदि।
– व्यंजनों को बनाने में नमक, मिर्च, मसालों आदि का अधिक अर्थात जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भी भोजन को खराब कर देता है।
– व्यंजनों को बनाने में आवश्यकता से अधिक तेल, घी आदि के इस्तेमाल से स्वास्थ्य तो खराब होता ही है, साथ ही ये वस्तुएं बिना वजह बर्बाद भी होती हैं।
– उच्च ताप पर भोजन पकाने से भोजन के पौष्टिक तत्व तो नष्ट होते ही हैं, साथ ही ईंधन की बर्बादी भी होती है। अत: भोजन को कम आंच पर ही पकाया जाना चाहिए।
स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए अपने आहार के साथ फलों तथा सब्जियों जैसे-गाजर, मूली, ककड़ी, खीरा, पालक पुदीना आदि का व्यवहार करते रहना चाहिए। अधपके या अंकुरित भोजन स्वास्थ्य की स्वस्थता के लिए संजीवनी की भांति कार्य करते हैं।
-पूनम दिनकर

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