जोखिम में डाल रही जीवनशैली….जानिये क्या रखे एहतियात…!

जोखिम में डाल रही जीवनशैली….जानिये क्या रखे एहतियात…!

भारत में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां लगातार चिंता बढ़ा रही हैं। डायबिटीज, कार्डियो वैस्कुलर डिसीज और कैंसर जैसी इन गैर संक्रामक बीमारियों के युवा सबसे ज्यादा शिकार बन रहे हैं। अमूमन ये बीमारियां 60 वर्ष की उम्र के आसपास अपना रौद्र रूप प्रकट करती हैं लेकिन अब ये 35 से 40 वर्ष की उम्र के युवाओं को जकड़ रही हैं। एक अध्ययन में बताया गया है कि 18 प्रतिशत भारतीय 40 वर्ष की उम्र से पहले बिगड़ैल जीवनशैली के कारण मुश्किल में आ सकते हैं जबकि ब्रिटेन में यह आंकड़ा केवल 2 प्रतिशत है। महत्त्वपूर्ण है कि इन मौतों को रोका जा सकता है। जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का शरीर पर लंबे समय तक असर रहता है और इनसे जूझना आर्थिक रूप से भी संकट में डालने वाला है। सीआईआई ने अपने एक अध्ययन में कहा कि इस समय हर 4 में से एक भारतीय गैर संक्रामक यानी कि जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इनके तेजी से पैर पसारने के पीछे पिछले एक दशक में बदली हुई जीवनशैली प्रमुख वजह के रूप में सामने आती है। भारत में 1995 के बाद से ही गैर संक्रामक या जिसे हम कह सकते हैं जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का फैलाव देखने को मिलता है। वर्ष 2012 के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में कुल मौतों का एक चौथाई कार्डियोवैस्कुलर बीमारी से होता है। इसके बाद श्वसन संबंधी रोगों के कारण 13 प्रतिशत लोगों की मृत्यु होती है। 7 प्रतिशत मौतों का कारण कैंसर है और 2 प्रतिशत लोग डायबिटीज के कारण मारे जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य गैर संक्र ामक बीमारियों से 12 प्रतिशत मृत्यु होती है। भारत में इन बीमारियों का खतरा इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि अभी यहां स्वास्थ्य सेवाएं इन बीमारियों से लडऩे के लिए पर्याप्त नहीं हैं। लोग निजी चिकित्सा सेवाओं के भरोसे रहते हैं। जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां जब एक बार आपको अपनी चपेट में ले लेती हैं तो लंबे समय तक आपसे चिपकी भी रहती हैं। आंकड़े बताते हैं कि हमारे जीने का तौर-तरीका किस कदर बिगड़ गया है।
ये जातीय संघर्ष ठीक नहीं
 ये बीमारियां विकसित देशों में खासतौर पर दिखाई देती थी लेकिन अब अस्वास्थ्यकर भोजन, निष्क्रि य जीवन और स्मोकिंग व शराब सेवन जैसी बुरी आदतों की वजह भारत में भी ये बीमारियां बढ़ रही हैं।  इन आदतों की वजह से ही कम उम्र में ही हृदय रोग, कैंसर, अल्जाइमर्स, अस्थमा, लिवर की तकलीफ, डायबिटीज, स्ट्रोक और ओस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याएं घेरने लगी हैं। इन बीमारियों का कामकाज से गहरा संबंध है। काम के तनाव का स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ता है। इसके अलावा आपके पोश्चर, खानपान और नींद का भी स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट का कहना है कि 30 की उम्र पार कर चुके एक चौथाई से ज्यादा भारतीयों की मृत्यु की आशंका भी इन बीमारियों से बढ़ जाती है।  अगर कैंसर की ही बात करें तो यह किसी भी परिवार की आर्थिक स्थिति को बहुत बुरी तरह प्रभावित करता है। कैंसर के कारण परिवार गरीबी की दशा तक पहुंच जाते हैं। इससे पीडि़त मरीज का उपचार भी उसी आधार पर हो पाता है कि वे कितना खर्च कर सकते हैं। गरीब या मध्यमवर्गीय लोग महंगे इलाज का खर्च नहीं उठा पाते हैं और इलाज की महंगी दवाएं नहीं खरीद पाते हैं। कार्डियोवैस्कुलर डिसीज, एंडोक्रइन और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर, कैंसर, श्वसन संबंधी रोग और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों पर खर्च भी अधिक होता है जो चिंता की बात है। कुल स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च का 39 प्रतिशत इन्हीं पर खत्म होता है। इनमें अगर अन्य गैर संक्रामक बीमारियों को शामिल कर दिया जाए तो यह आंकड़ा 48 प्रतिशत तक जा पहुंचता है।  देश के 50 शहरों के 20,937 मरीजों के बीच किए गए एक सर्वे में पाया गया है कि अमीरों के मुकाबले गरीब कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों से ज्यादा प्रभावित होते हैं। जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां हमारे देश को कई तरह से प्रभावित करती हैं। इनका सबसे घातक पक्ष यह है कि ये व्यक्ति को उसके सबसे महत्त्वपूर्ण वर्षों में अपना शिकार बनाती हैं और इस कारण से उसकी उत्पादकता घट जाती है और वह जल्दी ही रिटायर हो जाता है। इससे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ता है क्योंकि ज्यादा लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं जुटाना पड़ती है और व्यक्ति अपनी पूरी क्षमता से तरक्की में योगदान भी नहीं दे पाता है।
कहने में संकोच न करें…ज़रूर कहें अपने दिल की बात…!
 यह दोहरी मार है। जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां अगर तेजी से भारत को अपनी गिरफ्त में ले रही है तो इससे बचाव का तरीका आखिर क्या है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार करीब 80 प्रतिशत डायबिटीज और स्ट्रोक के मामलों को रोका जा सकता है। इसी तरह 30 से 40 प्रतिशत कैंसर के प्रकरण भी कम किए जा सकते हैं लेकिन स्वास्थ्य नीतियों में रोकथाम को ले कर भारतीय ज्यादा सजग नहीं हैं। भारतीय इलाज को ले कर चिंता करते हैं लेकिन पहले से रोकथाम को ले कर उतनी चिंता नहीं करते। अगर संतुलित जीवनशैली अपनाई जाए तो इन बीमारियों पर रोक लगाई जा सकती है।  भारत में जीवनशैली को ले कर जागरूकता दिखाई देने लगी है लेकिन अभी भी लक्ष्य बहुत दूर है। जब तक दौड़ से खुद को अलग करके बेहतर जीवन के बारे में नहीं सोचा जाएगा, तब तक इन बीमारियों का खतरा सिर पर मंडराता ही रहेगा। इनसे निपटने के लिए जीवनशैली में बदलाव की सख्त जरूरत है। – नरेंद्र देवांगन

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