जूठन छोडऩा अन्न का अपमान है

जूठन छोडऩा अन्न का अपमान है

शादी-ब्याह या किसी दूसरी पार्टी में अक्सर देखा जाता है कि लोग प्लेटों में चार-पांच पूरियां, ढेर सारे चावल, सलाद और कई प्रकार की मिठाइयां इस तरह डाल लेते हैं मानों खाने-पीने का सामान उन्हें दुबारा मिलेगा ही नहीं। इसके बाद जब वे खाना खा चुके होते हैं तो उनकी प्लेटों में ढेर सारी जूठन पड़ी रहती है।
भोजन की इस प्रकार से बर्बादी को देखकर स्वयं खाने वाला यह महसूस क्यों नहीं करता कि खाते-पीते समय उसके क्या कर्तव्य हैं और यह देखकर मेज़बान पर क्या प्रभाव पड़ता होगा। मेहनत-पसीने की कमाई को यूं बर्बाद होते देखकर बेचारा मेज़बान सिर पीट कर ही रह जाता है और किसी से कुछ कह भी नहीं पाता।
इसके अलावा कई स्थानों पर खाने की मनुहार भी चलती है और जबरदस्ती भी की जाती है। मेरी साली संतोष के विवाह की पार्टी में बारात खाना खा चुकी थी और घर के लोग खाना खा रहे थे। खाना परोसने वाले जबरदस्ती मिठाइयां और पूरियां रख रहे थे पर भोजन करने वालों ने तो अपने हिसाब से भोजन किया और आधे से अधिक वस्तुओं से भरी थालियां जूठन में रख दी गई। इसमें न तो कुछ खाने वाले का बिगड़ा और न ही कुछ जबरदस्ती सामान डालने वालों का लेकिन अन्न का अपव्यय-अपमान अवश्य हुआ।
जब हो गले में खिचखिच…!

अन्न का अपमान करना भला कहां तक उचित है? क्या आधुनिक समाज यह मानने लगा है कि प्रेम व मेहनत से परोसे गये खाने में से जानबूझ कर जूठन छोड़ा जाना आवश्यक है? जानबूझ कर जूठन छोडऩा असभ्यता व अशिष्टता का ही परिचायक माना जाना चाहिए।
हम अपने घरों में तो मांगने वालों को एक रोटी देने से भी कतराते हैं, या फिर उसे पांच-सात खरी-खोटी सुनाकर और दुत्कार कर ही रोटी देते हैं लेकिन दूसरों के घरों में बढिय़ा से बढिय़ा खाना जूठन में डाल देते हैं। क्या यही हमारी शिष्टता है? इस प्रकार से भोजन बर्बाद करना कहां की बुद्धिमानी है? हमारे बड़े भाईसाहब सिद्धांतवादी पत्रकार हैं। उनको हर कोई अपने घर पर बुलाने के लिए लालायित रहता है। उसका एक ही कारण है कि वे खाना खाते समय खाने की प्रशंसा अवश्य करते हैं और अपनी थाली में उतनी ही भोजन-सामग्री रखते हैं जितनी वे खा सकते हैं। यदि किसी दिन थोड़ी-बहुत सामग्री थाली में रह भी जाये तो वे मेजबान से क्षमा-याचना अवश्य कर लेते हैं।
अजवायन से घरेलू उपचार

हमारे देश में वैसे भी खाद्यान्न की समस्या है और हजारों लोग कई बार भूखे रहकर जीवन बिताते हैं। यदि इनसे जूठन के बारे में बात की जाये तो इनकी अंतरात्मा कराह उठेगी। बच्चों को बचपन से ही थाली में जूठन न छोडऩे की सीख अब शायद ही दी जाती है। दूसरों के घर और पार्टियों में खाने की मुफ्त का माल समझकर जूठन छोडऩा कहां तक उचित है? इस विषय में आज के समाज को सोचना ही होगा।
– प्रेम सिंह सूर्यवंशी

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