जी.एस.टी. विरोध के मायने क्या है, जानिये

जी.एस.टी. विरोध के मायने क्या है, जानिये

जी.एस.टी. यानी वस्तु एवं सेवा कर को लेकर पूरे देश में माहौल गरम है। सरकार और बहुत से अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जी.एस.टी. से अर्थ व्यवस्था में गुणात्मक बलदाव आएगा। कालेधन पर प्रभावी रोक लगेगी, सर्वत्र पारदर्शिता का माहौल होगा। यहां तक कि इससे राष्ट्रीय आय में डेढ़-दो प्रतिशत वार्षिक की दर से ज्यादा वृद्धि होगी। इससे अलग काग्रेस समेत कई विरोधी दल तथा व्यापारियों का एक तबका जी.एस.टी. के विरोध में उतारू है। उनका कहना है कि जी.एस.टी. के चलते इंस्पेक्टर राज पुनः आ जाएगा। छोटे व्यापारियों पर भी इससे शामत आ जाएगी, क्योकि सारा कारोबार आनलाइन करने के चलते तकनीक एवं तकनीकी ज्ञान के अभाव में भयावह दुश्वारियों का सामना करना पड़ेगा। जी.एस.टी. विरोधियों का तो यहां तक कहना है कि जिस तरह से नोटबंदी का कदम फेल रहा, वैसे जी.एस.टी. भी फेल होगी। इसी से समझा जा सकता है कि चाहे नोटबंदी हो या जी.एस.टी.- इसे विरोध के लिए विरोध ही कहा जा सकता है। क्योंकि जो लोग यह कहते हैं कि नोटबंदी इसलिए असफल है कि सारा काला धन बैंकों में आ गया, उन्हें यह पता होना चाहिए कि जो काला धन एक समानान्तर अर्थ व्यवस्था बना हुआ था, वह देश की अर्थ व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है, बावजूद इसके लाखों लोग आयकर की राडार में हैं।
आप के तीन विधायकों अमानतुल्ला खान ,जरनैल सिंह और सोमनाथ भारती पर प्राथमिकी दर्जनोटबंदी के चलते ही देश को 91 लाख नए करदाता प्राप्त हुए हैं और जिस देश में 1.5 प्रतिशत लोग मात्र आयकर देते रहे हों, वहां यह एक बड़ी उपलब्धि है। वस्तुतः कांग्रेस पार्टी और दूसरे विरोधी दलों का विरोध जहां सरकार का अंधविरोध है, वहीं व्यापारियों का एक तबका जी.एस.टी. के विरोध में नासमझी या निहित स्वार्थों के चलते खड़ा है। स्पष्ट है कि अब ऐसे लोगों के लिए आयकर की चोरी के कोई अवसर नहीं रहेंगे। छोटे व्यापारियों की परेशानी को लेकर भी तरह-तरह के प्रचार चल रहे हैं। सच्चाई यह है कि जी.एस.टी. के प्रावधान के तहत जिस व्यापारी का टर्न ओवर साल में बीस लाख तक है, उसे कुछ नहीं करना है। उसे मात्र महीने में एक बार मोटे तौर पर यह बताना है कि उसके द्वारा महीने में इतने का सामान बेचा गया। इस संबंध में जो लोग कम्प्युटर या लैपटाप की उपलब्धता का रोना रोते हैं, उस संबंध में सरकार द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया है कि स्मार्ट फोन से भी हिसाब-किताब की जानकारी दी जा सकती है। स्मार्ट फोन की उपलब्धता तो प्रत्येक व्यापारी के पास होनी चाहिए, चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण। यदि बहुत अपवाद स्वरूप किसी के पास स्मार्ट फोन नहीं है तो उसकी व्यवस्था बनाना इतना बड़ा काम नहीं है कि जिसके लिए हाय-तौबा मचाई जाए।
प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी का आरोप यह है कि उसके जमाने में जी.एस.टी. का जो प्रारूप तैयार किया गया था, उसमें सभी वस्तुओं पर एक ही स्लैब यानी की सभी पर 15 प्रतिशत टैक्स प्रस्तावित था, जबकि मोदी सरकार ने उसे कई स्लैबों में बांट दिया है। इसके चलते बहुत सी उलझनें पैदा होंगी। अब यह सभी को पता है कि मोदी सरकार ने खाद्यानों और गरीबों द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं को अमूमन टैक्स मुक्त रखा है और अमीरों द्वारा उपयोग की जाने वाली और विलासिता की वस्तुओं को ही अधिकतम 18 एवं 28 प्रतिशत टैक्स के स्लैब में रखा है, जो सर्वथा औचित्यपूर्ण कहा जा सकता है। इसके विपरीत कांग्रेस पार्टी की दृष्टि में तो सभी वस्तुएं ''टके सेर भाजी और टके सेर खाजा'' की होनी चाहिए, जिसके चलते गरीब व्यक्ति का जीवन यापन करना दूभर हो जाता। जहां तक जी.एस.टी. विरोधियों का यह कथन है कि इससे महंगाई बढ़ेगी, यह आंशिक सच हो सकता है। इससे बड़ा सच यह है कि अधिकांश वस्तुओं की कीमतें कम होंगी। हकीकत यह है कि जी.एस.टी. से जीवनोपयोगी वस्तुओं और आवश्यक दवाइयों के दाम कम हुए हैं, यहां तक कि साबुन, दोपहिया एवं बहुत से चारपहिया वाहनों के रेट भी कम हुए हैं। निर्णायक बात यह है कि पारदर्शिता के अभाव में अभी तक जो टैक्स चोरी होती थी, उसमें पूरी तरह विराम लग जाएगा। इससे समझा जा सकता है कि सरकार के खजाने मे अभूतपूर्व बृद्धि होगी। इस तरह से चोरी -बेईमानी के रास्ते बंद होने के चलते एक साफ-सुथरी व्यवस्था तो कायम होगी ही, पर्याप्त राजस्व के चलते विकास कार्यों के लिए पैसों की कोई कमी नहीं रहेगी।
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इस तरह से सिर्फ आधारभूत कार्यों , यानी सड़क, बिजली, पानी, रेल, बन्दरगाह इत्यादि के क्षेत्र में व्यापक स्तर पर कार्य तो होंगे ही, जन कल्याणकारी योजनाओं में भी पर्याप्त इजाफा होगा। अन्ततोगत्वा जिसकी परिणति में भारत एक विकासशील राष्ट्र से विकसित राष्ट्र में बदल सकता है। जो लोग सत्ता को ही सब कुछ मानते हैं, उनके लिए तो देश का सर्वांगीण विकास ही सबसे बड़ी समस्या है, क्योंकि इसके चलते वह न सिर्फ सत्ता से और दूर होते जा रहे हैं, बल्कि अपने अतीत के कारनामों के चलते कठघरे में भी खड़े होने जा रहे हैं। जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि एक लाख फर्जी कंपनियां बन्द कर दी गई हैं और 3 लाख कंपनियां जांच के दायरे में हैं। उल्लेखनीय है कि ये वही कंपनियां हैं जो काले धन को सफेद बनाने का काम करती थीं। नोटबंदी के दौरान भी इन फर्जी कंपनियों के ऐसे कृत्य पर्याप्त चर्चा में आ चुके हैं।
अभी तक इस देश में टैक्स- दर- टैक्स कुल 18 टैक्स लगते थे। भारत के उपभोक्ता द्वारा इतने टैक्स अदा किये जाने के वाबजूद सरकार का खजाना खाली रहता था। घाटे की पूर्ति के लिए सरकारों को नये टैक्स लगाने पड़ते थे, जिससे मंहगाई का दुश्चक्र बढ़ता गया। दूसरी तरफ काले धन से व्यापारियों की तिजोरी भरी रहती थी। इस प्रक्रिया में सभी अलग-अलग प्रकार के टैक्सों से छुटकारा तो मिलेगा ही, सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने से भी निजात मिल जाएगी। इसके चलते अमूमन एक वस्तु की कीमत पूरे देश में एक समान रहेगी। इससे ''एक कर और एक देश'' की धारणा फलीभूत होगी। तिल का ताड़ बनाने वाले कहते हैं कि क्या भारत पहले से ऐक देश नहीं है। बात सच है, भारत बहुत पहले से एक देश है, खास कर सांस्कृतिक दृष्टि से , लेकिन एक ही देश के नागरिकों में किसी तरह की विसमता, भेदभाव कतई उचित नहीं कहा जा सकता। निःसंदेह जी.एस.टी. जहाॅ आर्थिक क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रान्ति लाएगा, वहीं राष्ट्रीय एकीकरण की दृष्टि से भी सहायक बनेगा और इस नारे को सार्थक करेगा कि ''हम सब एक हैं''। नोटबंदी, बेनामी संपत्ति पर कानून को प्रभावी बनाना, दो लाख से ज्यादा नकद के लेन-देन पर रोक लगाना, रियल इस्टेट के क्षेत्र में जनहित में कई तरह के नियंत्रण लगाना, विदेशों खास तौर पर स्विटजरलैण्ड जैसे देशों से संधियां और समझौते कर कालेधन की कमर तोड़ने के पश्‍चात मोदी सरकार का जी.एस.टी. ऐसा कदम है जो देश की सूरत और सीरत दोनों ही बदल देगा। जो लोग यह कहते हैं कि जी.एस.टी. जल्दबाजी में बगैर तैयारी के लागू किया गया है, हम इतने बड़े बदलाव के लिए तैयार नहीं थे, उनके अनुसार तो ऐसी तैयारी कभी संभव ही नहीं थी। अब्राहम लिंकन के शब्दों में "तय करें कि काम किए जा सकते हैं और कर लिए जाएंगे, फिर करने का तरीका तलाश लेंगे।''
हकीकत यही है कि बड़ा बदलाव हमेशा पीड़ादायक होता है। जी.एस.टी. लागू करने में समस्याएं आएंगी, लेकिन बाद में हालात धीरे-धीरे सामान्य हो जाएंगे। सच्चाई यही है कि कच्चे बिल पर कारोबार करने वालों को अपने तौर-तरीके बदलने होंगे। उन्हें भी टैक्स के दायरे में आना होगा, अन्यथा उनके कष्ट के दिन शुरू होने वाले हैं। पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. कलाम का कहना था- ''जो समाज रचनात्मकता, उद्यमशीलता और नवीनता को बढ़ावा देता है, वही समाज जीवंत होता है और भविष्य उसी का है''।
जी.एस.टी. विरोधियों को यह भी पता होना चाहिए कि जी.एस.टी. के चलते कम-से-कम लोगों को उतना कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा जितना नोटबंदी के दौरान उठाना पड़ा। फिर भी नोटबंदी में आम जन मोदी के साथ सहर्ष खड़ा रहा। यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि जी.एस.टी. का विरोध करने वाले भी वही चेहरे हैं जो नोटबंदी का विरोध कर रहे थे। आम आदमी को तो नोटबंदी की तरह जी.एस.टी. को लेकर भी पूरा भरोसा है। उनका मानना है कि यदि मोदी ने ऐसा कोई कदम उठाया है तो देशहित और जनहित में ही उठाया है। इसलिए बेहतर है कि इसके विरोध में प्रलाप करने वाले सावधान हो जाएं। वरना आवाम की दृष्टि में ऐसे तत्व लूट की संस्कृति के संरक्षक के रूप में ही दिखेंगे और अपनी बचीखुची प्रासंगिकता भी खो बैठेंगे।

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