जिंदगी कैसे जिएं

जिंदगी कैसे जिएं

जिंदगी परमात्मा की दी हुई अमूल्य निधि है। यह विभूतियों का भंडार और शक्तियों का समुच्चय है। इसे किन्हीं कलाकार हाथों से सजाया और संवारा गया है जिसे थोड़ी गहराई से विचार कर जाना-समझा जा सकता है। यह जिदंगी खुशी-खुशी बिताने और संसार का आनंद प्राप्त करने के लिए मिली है किंतु हममें से कितने लोग इसका आनंद लाभ ले पाते हैं। दरअसल आज का आदमी जिंदगी जीने का सलीका ही नहीं जानता।
आज जिंदगी समस्याओं का ढेर बन गयी है। आदमी का मन भौतिकता के पाश से जकड़ा है किंतु आत्मज्ञान का एक कण भी उसमें दिखाई नहीं पड़ता। आज जिंदगी की एक बार अच्छी तरह पड़ताल करने की आवश्यकता है। जिंदगी जीने का गुर हमें सीखना पड़ेगा।
निश्चय ही आदमी को सुखों की चाह होती है। नाम, पद, यश, धन-दौलत, परिवार-सुख सभी कुछ हमें इष्ट हैं किंतु जीवन का उद्देश्य निश्चित किये बिना आदमी की दशा पथ भूले बन्जारे की भांति हो जाती है। भ्रम, चंचलता, आवेश या उत्तेजना से जीवन की धारा कहीं बहक न जाय, इसका सदैव ध्यान रखना पड़ेगा।
सुख-शांति, धन-संपदा, पद- प्रतिष्ठा, विद्या विनय तथा वैज्ञानिक उपलब्धियों का एक ही आधार है मन का सधा हुआ होना। मन यदि सही दिशा में गतिशील है तो समझना चाहिए कि जीवन सुखमय बनेगा, इसलिए सर्वप्रथम प्रयास मन को साधने के लिए किया जाना चाहिए। फिर आगे आप जो बनना चाहें या पाना चाहें, पा सकते हैं।
अधिकांश लोग सिर्फ कल्पनाओं के महल सजाते रहते हैं। ठोस धरातल पर कार्य करना उन्हें नहीं भाता। वे सोचते हैं कि दुनियां उनकी कोरी बातों को सुनकर उन्हें धन या पद दे देगी किंतु यह मिथ्या धारणा है। किसी भी पद या वैभव को पाने के लिए आदमी को अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनी पड़ती है, परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है तभी लोग यकीन करते हैं। अस्तु सोचते ही न रहें। कार्यक्षेत्र में उतरें, अपनी कार्यकुशलता दिखायें। अपनी प्रतिभा को जगायें। फिर धन-पद-प्रतिष्ठा की कहीं कमी न रहेगी।
यह बात बांध लें कि बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी आप आगे बढ़ सकते हैं, उन्नति कर सकते हैं क्योंकि आप परमात्मा की संतान हैं। परमात्मा ने आपको शक्ति का अकूत भण्डार दे रखा है।
यह सच है कि मन को अनुकूलता की चाह होती है किंतु महापुरूषों की जीवनियां पढ़कर आप अनुभव करेंगे कि वैसी बुरी परिस्थिति आपके सामने नहीं हैं। मन: स्थिति बदलें। परिस्थितियां अपने आप बदलती जाती हैं।
मन को सबल बनाइये और परिस्थितियों से तालमेल बिठाइये। जूझने वाला ही सदैव लक्ष्य को प्राप्त करता है। परिस्थितियों को मन: स्थिति पर कभी भी हावी न होने दें।
तापमान बढने से बढती है बीमारी
असफलता यह सिद्ध करती है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया। सफलता आसमान से नहीं टपकती वरन मेहनत और पुरूषार्थ द्वारा अर्जित की जाती है। इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का विकास जरूरी है। इसके साथ ही अपनी कार्यशैली को उत्तम बनाना पड़ेगा।
आपको अपनी क्षमताओं और योग्यताओं को जानना अति आवश्यक है। तभी किसी कार्य को कर पाना या सफलता अर्जित करना संभव होगा। कोई भी कार्य हाथ में लें, उसे पूरे मनोयोग से करें। प्रतिष्ठा का प्रश्न मान कर करें। मन के बिखराव का समेटें और धैर्यपूवक कदम बढ़ायें-आपको सफलता अवश्य मिलेगी।
व्यर्थ की शंकाओं का त्याग करें:- आदमी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह अच्छी बातों में भी बुराई खोजता फिरता है। मन सदैव कुकल्पनाओं में डूबता-उतरता रहता है। निषेधात्मक विचार और बुरी भावना से ग्रस्त मन आदमी को अंतत: पतित कर डालता है।
बीमारी का डर, घाटे की आशंका, मृत्यु की आशंका, अपमान का भय आदि आदमी को त्रस्त किये रहते हैं। हानि लाभ और जीवन-मरण के बीच हिचकोले खाता आदमी, कभी उन्नति नहीं कर पाता। चिन्ता और शंकाएं उसे आगे बढऩे से रोकती हैं।
व्यर्थ की शंकाओं को मन से निकालने में साथी-सहयोगी, अच्छी पुस्तकें, सदाचारियों का सानिध्य और आशावादी दृष्टिकोण आपकी मदद कर सकते हैं।
प्रेरणा मनुष्य के अंत:करण से अगाध शक्ति को बाहर प्रकट करने का स्फुरण या चेतावनी है।
प्रकृति या परमेश्वर आपके माध्यम से कोई कार्य सिद्ध करना चाहते हैं, अस्तु हृदय की पुकार को अनसुनी न करें। यह अंत: प्रेरणा आपको महान् लोगों की श्रेणी में ला देगी।
भाग्यवाद के छलावे से बचें:- भाग्यवाद जीवन का अभिशाप है। गृह नक्षत्र, तंत्र, गुप्त विद्या, सोना बनाने की जादूगरी-यह सब छलावे हैं। आदमी को ऐसे बाबाओं के चक्कर में नहीं पडऩा चाहिए जो तंत्र और ताबीज के जरिये, चमत्कारी अंगूठी के द्वारा करोड़पति बनने का स्वप्न दिखाते हैं। यह सच है कि तंत्र-मंत्र और गृह नक्षत्रों का प्रभाव है किंतु उतना नहीं जितना कि कमजोर दिल के लोग समझते हैं।
परमेश्वर पुरूषार्थी की सहायता करता है। आप पुरूषार्थ का अवलम्बन लें। राजमार्ग से चलें। ‘शार्टकट’ काली पगडंडी में जोखिम ही जोखिम है।
पुरूषार्थी अपना भाग्य स्वयं बनाता है। कायर लोग देवता की बाट जोहते हैं। कहा भी गया हैं।
आलसी, अस्त-व्यस्त, रोगी, अपंग और अविश्वासी लोग कभी यह निश्चय नहीं कर पाते कि जीवन में कौन सा कार्य ज्यादा जरूरी है और वे जिस-तिस का आसरा तकते और सहारा ढूंढते हैं जबकि ऐसे लोग बार-बार ठुकराये जाते हैं। क्या हम भी जीवन भर धक्के खाते रहेंगे? नहीं, यह हमको स्वीकार्य नहीं है।
जीवन को अनुशासन में ढालें:- अगर किसी की गुलामी स्वीकार नहीं है और अपने सहारे जिदंगी जीने की चाह है तो जीवन को अनुशासन में ढाल लेना परम आवश्यक है।
समय पर सोना-जागना, नियमितता, उचित आहार-विहार, सामाजिक – पारिवारिक दायित्व का निर्वाह, राष्ट्रभक्ति तथा मानव मात्र के प्रति सद्भावना से जीवन का पुष्प खिल उठेगा।
स्वाद लें पर स्वास्थ्य पर आंच न आने दें
सफलता का मूलमंत्र है – आत्मानुशासन !
किसी पर अविश्वास करने का अर्थ है कि हमें स्वयं पर विश्वास नहीं। हम जिस पर भी अविश्वास करने लगते हैं, वह कभी हमारे विश्वास के योग्य नहीं बन पाता। धीरे-धीरे वह व्यक्ति बुरा बन जाता है अस्तु हम अविश्वास से बचें। इसी प्रकार उत्तेजना से जीवन का सार सत्व नष्ट हो जाता है।
भावुकता भी चेतना को प्रभावित करती है। हमारी कार्यक्षमता को नष्ट करती है।
जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण अपनायें:- दु:ख भरे क्षणों में जिसमें धैर्य बना रहता है, जिसकी बुद्धि स्थिर रहती है तथा जो विपत्तियों में भी ईश्वरीय विधान देखता है-ऐसा व्यक्ति जीवन में सफलता हासिल करता है।
आवश्यक है कि हम जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण अपनाएं। समस्याएं आती हैं हमारी परीक्षा लेने एवं हमारी शक्तियों को जागृत करने, अत: दु:खों से-समस्याओं से घबराना नहीं चाहिए।
ऐसे समय धैर्यपूर्वक विचार करना चाहिए तथा अपनी सहनशीलता को बढ़ाना चाहिए। पुरूषार्थी कभी हार नहीं मानता।
यह विश्वास दृढ़ बनायें कि आप सफलता अवश्य अर्जित करेंगे।
जिन्दगी कैसे जियें:-जिंदगी को कलाकार की तरह सजा-संवार कर जीना चाहिए। जिंदगी यों ही रोते-कलपते नहीं गुजारनी चाहिए। जिंदगी जिंदादिली का नाम है। इसे खुशी-खुशी बिताना चाहिए। परोपकार की भावना से, त्याग-बलिदान से जीवन सुरभित और सुषांधित होता है। स्वार्थपरता से बचें, औरों के लिए भी जियें। तभी तो जिंदगी की सार्थकता है।
– पं. घनश्याम प्रसाद साहू

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