जानिये प्रोटीन के बारे में

जानिये प्रोटीन के बारे में

प्रोटीन मनुष्य के शारीरिक व मानसिक विकास के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण पोषक तत्व है। यह मुख्यत: कार्बन, आक्सीजन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, सल्फर तथा अल्प मात्र में फास्फोरस का समिश्रण होता है। हमारा शरीर चूंकि नाइट्रोजन का उपयोग अधिक मात्रा में करता है और यह तत्व केवल प्रोटीन में ही मिलता है।
प्रोटीन की उपयोगिता:- प्रोटीन पाचन रसों, हारमोंस व एन्जाइम का निर्माण करता है। यह शरीर के विभिन्न तन्तुओं, पेशीय ऊ तकों तथा अन्य आन्तरिक अंगों का निर्माण तथा उनकी टूट-फूट की स्थिति में मरम्मत का कार्य भी करता है। अधिक मात्र में प्रोटीन का प्रयोग करने पर यह वसा के रूप में शरीर में एकत्रित होता है। मानव शरीर में जब कभी वसा या कार्बोज का अभाव होता है तो वसा के रूप में संचित यही प्रोटीन ऊर्जा और गर्मी उत्पादन में सहायता करता है।
यह मानसिक शक्ति को मजबूती प्रदान करता है तथा शरीर में रोग निरोधक क्षमता की वृद्धि करता है। शारीरिक वृद्धि में प्रोटीन की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है। गर्भवती स्त्रियों, दुग्ध-पान कराने वाली माताओं तथा बच्चों को प्रोटीन की आवश्यकता सबसे ज्यादा होती है।
प्रोटीन के आवश्यकता से अधिक उपयोग से हानि भी होती है। उष्ण प्रधान देशों में इसके पाचन में कठिनाई उत्पन्न होती है। शरीर में अपेक्षाकृत गर्मी भी अधिक उत्पन्न होती है। प्रोटीन की अधिकता का सबसे घातक असर जिगर व गुर्दों पर पड़ता है क्योंकि प्रोटीन के पाचन के पश्चात उत्पादित पदार्थों को उत्सर्जन करने में इन्हें अपनी क्षमता से अधिक श्रम करना पड़ता है जिससे इनके क्षतिग्रस्त होने की संभावना अधिक होती है।
प्रोटीन की कमी से हानि भी होती है। इसकी कमी से शरीर का आवश्यक विकास नहीं हो पाता तथा वह दुर्बल हो जाता है जिससे मनुष्य शक्तिहीनता का अनुभव करने लगता है। रोग निरोधक क्षमता में कमी आ जाती है जिससे मनुष्य संक्रामक रोगों का आसानी से शिकार हो सकता है। बाल भूरे होकर झडऩे लगते हैं तथा रक्त में भी कमी आ जाती है। इसकी कमी से निम्न रक्तचाप होने की संभावना अधिक होती है। त्वचा पर चित्तियां पड़ जाती
हैं।
प्रोटीन की कमी से होने वाली अन्य बीमारी है क्वैशीआकार। बच्चों के भोजन में प्रोटीन की कमी से यह उत्पन्न होती है। बच्चों की शारीरिक वृद्धि रूक जाती है। वजन में कमी, पेट और पैर में सूजन तथा मानसिक दुर्बलता इस बीमारी के विशेष लक्षण हैं। शरीर शुष्क, स्वभाव चिड़चिड़ा, तथा मांसपेशिया ढीली हो जाती हैं। इस रोग के शिकार बच्चों में कभी-कभी यकृत में खराबी भी उत्पन्न हो जाती है।
मेरास्मस:- यह बीमारी उन बच्चों को होती है जिन्हें अपनी माता की दूध के बजाय जो आहार दिया जाता है उसमें प्रोटीन, कार्बोहाइडे्रट तथा वसा की कमी होती है। शरीर दुबला-पतला, दस्त अधिक, त्वचा झुर्रीदार तथा चेहरे का पीला पड़ जाना इस बीमारी के मुख्य लक्षण हैं।
प्रोटीन प्राप्ति के स्रोत:- मछली, अंडा, गोश्त, हरी सब्जियां, बादाम, मूंगफली, काजू, चना, मटर, अरहर, सोयाबीन, दूध, पनीर इत्यादि प्रोटीन के अच्छे स्रोत हैं।
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प्रोटीन के भी दो प्रकार होते हैं। पशुओं से प्राप्त प्रोटीन को ‘ए’ वर्ग का प्रोटीन कहा जाता है और वनस्पति से प्राप्त प्रोटीन को ‘बी’ वर्ग का प्रोटीन कहा जाता है।
इन विभिन्न स्रोतों से प्राप्त प्रोटीन के नाम भी अलग-अलग होते हैं जैसे अण्डे में एलब्यूमिन, गोश्त में मायोसिन, मुर्गियों की हड्डियों में कोलाजेन, दुग्ध में केसीन, मनुष्य की लार में एम यू सी. 7, भेड़ के दूध में अल्फा-1 एण्टीट्रीप्सिन (ए. ए. टी.), मटर व अन्य दालों में लेग्युमिन, गेहूं में ग्लूटिन, पालक के पत्ते में फोटो सिस्टम-1 इत्यादि। इन विभिन्न प्रकार के स्रोतों से प्राप्त प्रोटीन से भी अलग-अलग लाभ प्राप्त होता है जैसे मुर्गियों की हड्डियों से प्राप्त कोलोजन से यह नया तथ्य प्रकाश में आया है कि यह गठिया रोग से ग्रस्त लोगों के लिए विशेष लाभ पहुंचाता है। इसी तरह भेड़ के दूध से प्राप्त प्रोटीन अल्फा-एंटीट्रीप्सिन से मनुष्य में होने वाली एम्फीसेमा नामक फेफड़े की बीमारी का खतरा पूरी तरह टल जाता है। इसी प्रकार मनुष्य की लार में पाई जाने वाली प्रोटीन से भोजन के पाचन तथा रोग निवारक क्षमता में वृद्धि होती है।
विभिन्न स्रोतों से प्राप्त पदार्थों में प्रोटीन की प्रतिशत मात्रा क्रमानुसार घटते क्रम में सोयाबीन (42 प्रतिशत), मूंगफली (25 प्रतिशत), मटर (22 प्रतिशत), चना (21 प्रतिशत), अण्डा (21 प्रतिशत)।
प्रोटीन की दैनिक आवश्यकता:- वैसे तो प्रत्येक आयु वर्ग के व्यक्तियों के लिए प्रोटीन युक्त आहार की मात्रा अलग-अलग होती है लेकिन इसके लिए सबसे उपयुक्त और स्मरण रखने योग्य आसान उपाय यही है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके शरीर के वजन के अनुसार, एक ग्राम प्रति किलोग्राम प्रोटीन की आवश्यकता जरूरी होती है। हां, इतना ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तन-पान कराने वाली माताओं को इससे कुछ अतिरिक्त प्रोटीन की आवश्यकता अधिक होती है।
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मानव शरीर में विभिन्न तत्वों का कम्पोजिशन देखा जाय तो उससे भी यही प्रकट होता है कि जल के बाद मानव शरीर में सबसे अधिक मात्रा प्रोटीन की ही होती है।
मानव शरीर में विभिन्न तत्वों का कम्पोजिशन
जल 65 प्रतिशत
प्रोटीन 18 प्रतिशत
वसा 10 प्रतिशत
खनिज 7 प्रतिशत
इतना ही नहीं, मानव शरीर में जब कभी वसा और कार्बोज की कमी होती है तो शरीर में संचित प्रोटीन की अतिरिक्त मात्र ही इनकी आवश्यकता की पूर्ति करती है। इस प्रकार प्रोटीन हमारे शरीर के आन्तरिक अंगों की देखभाल ही नहीं, बल्कि हमारे शारीरिक और मानसिक उन्नयन में भी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
– विनोद कुमार सिंह ‘तोमर’

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