जातीय हिंसा की आग को आखिर कौन दे रहा आॅक्सीजन..? 

जातीय हिंसा की आग को आखिर कौन दे रहा आॅक्सीजन..? 

आग को ईंधन और आॅक्सीजन न मिले तो उसका बुझना तय है। यही बात हिंसा और तनाव पर भी लागू होती है। सहारनपुर में हुई जातीय हिंसा के लिए दोषी कौन है, इसे लेकर दलित और ठाकुर समुदाय प्रशासन की कार्य प्रणाली को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। दलित जहां जातीय हिंसा को गूंगे और बहरे प्रशासन की देन मान रहा है,वहीं ठाकुर समुदाय भी जिला और पुलिस प्रशासन पर दलितों की तरफदारी करने का आरोप लगा रहा है। बसपा प्रमुख मायावती योगी आदित्यनाथ सरकार पर दलितों के उत्पीड़न का आरोप लगा रही हैं। सवाल यह उठता है कि अगर उत्तर प्रदेश सरकार दलितों का उत्पीड़न कर रही होती तो सहारनपुर के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को निलंबित ही क्यों करती?
खुफिया विभाग और अधिकारियों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को जो रिपोर्ट भेजी है,उसमें कहा गया है कि सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में जातीय हिंसा को भड़काने का षड़यंत्र किया गया है। इस हिंसा के अहम किरदार भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर के बैंक खातों में अलग-अलग समय में 50 लाख रुपये की मोटी रकम जमा की गई। यह राशि किसने जमा की और क्यों जमा की, यह जांच का विषय है। बसपा प्रमुख मायावती पहले ही भीम आर्मी से अपना पल्ला झाड़ चुकी हैं। अपनी प्रेस वार्ता में वह इस बात का खुलासा कर चुकी हैं कि भीम आर्मी से उनका, उनके भाई आनंद का और बसपा का कुछ भी लेना-देना नहीं है। भाजपा ने भीम आर्मी को बसपा को कमजोर करने के लिए खड़ा किया है। विचारणीय तो यह है कि भीम आर्मी को लेकर बसपा प्रमुख कितना सच बोल रही हैं। वैसे भी यह आर्मी 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान सक्रिय हुई थी। मायावती की हर सभा में भीम आर्मी के कार्यकर्ता नजर आए थे। उनकी छाती पर जय भीम जय बसपा लिखा होता था। इस सच को मायावती एक झटके में नकार कैसे सकती हैं? प्रथम दृष्ट्या यह मान भी लिया जाए कि मायावती की बातों में दम है। अगर भाजपा मायावती की पार्टी को नगर निकाय और लोकसभा चुनाव में कमजोर करने के लिहाज से भीम आर्मी को आगे कर रही होती तो वह उसके मुखिया और अन्य सदस्यों के खिलाफ मुकदमा दर्ज ही क्यों होने देती? अपने व्यक्ति पर कार्रवाई न तो नैतिकता का विषय है और न ही सिद्धांत का।
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यह चिंता का विषय है कि 34 दिन में सहारनपुर में पांच बार जातीय संघर्ष हो चुका है और इस संघर्ष की आग को प्रदेश के अन्य जिलों में भी भड़काने के प्रयास हो रहे हैं। केंद्र सरकार को इस बात की आशंका भी है तभी तो केंद्रीय गृहमंत्रालय ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से यह जानना चाहा है कि सहारनपुर में जातीय हिंसा की आग बुझ क्यों नहीं रही है? जाहिर है इस आग को हवा देने का काम विभिन्न राजनीतिक दल दे रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की सहारनपुर जाने की चाहत को कमोवेश इसी रूप में देखा जा सकता है। सहारनपुर में जातीय संघर्ष को राजनीतिक रंग देने के प्रयास जारी हैं। मायावती के सहारनपुर दौरे के बाद भड़की हिंसा के बाद प्रशासन ने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के सहारनपुर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सहारनपुर जाने पर अड़े हुए थे। कांग्रेस प्रवक्ता पीएल पुनिया कहतो रहे कि अगर प्रशासन ने राहुल गांधी को सहारनपुर जाने की अनुमति नहीं दी तो भी वे सहारनपुर जाएंगे। सवाल उठता है कि सहारनपुर जाने का उनका मकसद क्या था? सहारनपुर में जातीय हिंसा 39 दिनों से भड़की हुई थी लेकिन राहुल गांधी को इतने दिनों बाद सहारनपुर खासकर शब्बीरपुर की याद क्यों आ रही है? क्या वे हिंसा की आग में घी डालना चाहते हैं। इसमें संदेह नहीं कि जिला और पुलिस प्रशासन ने सहारनपुर में भड़की जातीय हिंसा पर बहुत हद तक काबू पा लिया था लेकिन मायावती के सहारनपुर दौरे ने प्रशासन के सभी किए कराए पर पानी फेर दिया और जातीय हिंसा एक बार पुनः भड़क गई।
सच तो यह है कि दलित और सवर्ण दोनों ही योगी सरकार पर अपनी उपेक्षा का आरोप लगा रहे हैं। मोदी और योगी का विरोध तो ठीक है लेकिन इसके लिए मायावती को ऐसे प्रयास हरगिज नहीं करने चाहिए जिससे प्रदेश के अमन-चैन में किसी भी तरह का खलल पड़े। इसे विधि की विडंबना ही कहा जाएगा कि दलितों से जुड़े मामलों को लपकने का एक भी मौका मायावती अपने हाथ से जाने नहीं देतीं। उन्हें तो मोदी और राहुल का दलित भोज तक रास नहीं आता। वे इसकी भी आलोचना करती हैं। उनकी पार्टी से निकले या निकाले गए नेता उन पर दलित की बेटी नहीं, दौलत की बेटी होने के आरोप लगाते रहे हैं। वे खुद तो कभी दलितों के बीच जाती नहीं लेकिन जब अन्य दल के नेता दलितों के बीच जाते हैं, उनके हित की बात करते हैं तो मायावती उन पर तंज कसना नहीं भूलतीं। पिछले दिनों उन्होंने योगी आदित्यनाथ पर तंज कसा था कि अगर उन्हें दलित महापुरुषों से इतना ही प्रेम है तो वे उनके नाम पर बने पार्कों और स्मारकों की मरम्मत क्यों नहीं कराते। कहना न होगा कि योगी आदित्यनाथ ने मायावती की इस चुनौती का संज्ञान लेते हुए लखनऊ में कांशीराम और अंबेडकर के नाम पर बने पार्कों की मरम्मत के लिए करोड़ों रुपये जारी कर दिए हैं।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख गृह सचिव मणि प्रसाद मिश्रा ने बेहद विस्मयकारी बात कही है। उनके मुताबिक सहारनपुर हिंसा के पीछे बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र है। इस मामले में कुछ नेताओं के नाम भी प्रकाश में आए हैं, जिसकी गहन जांच की जा रही है। जल्द ही षड्यंत्रकारियों को बेनकाब कर दिया जाएगा। उन्होंने 34 दिन में पांच बार हिंसा को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि इसे लेकर मुख्यमंत्री भी चिंतित हैं। मणि प्रसाद मिश्रा का यह भी दावा है कि भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर को जल्द ही पकड़ लिया जाएगा। शब्बीरपुर की आबादी करीब 4500 है। यहां ठाकुरों-दलितों की संख्या बराबर है। न्याय की दरकार दोनों ही पक्षों को है। प्रमुख सचिव गृह यह भी स्वीकार करते हैं कि शब्बीरपुर में कुछ बेगुनाहों को भी जेल भेज दिया गया है। दिव्यांग वृद्धा के परिवार के तीन व्यक्तियों को सलाखों के पीछे डाल दिया गया है जबकि 80 साल के एक वृद्ध को भी नामजद किया गया है। क्या यह उचित है और यदि हां तो निर्दोषों पर कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है?
साध्वी प्राची ने सहारनपुर की घटना के पीछे खनन माफिया का हाथ बताया और आरोप लगाया कि कुछ लोग योगी सरकार के खिलाफ साजिश रचकर इस तरह की घटनाओं को करा रहे हैं। उन्होंने सहारनपुर की घटना के लिए इमरान मसूद और हाजी इकबाल का खुलकर नाम लिया। शब्बीरपुर गांव में सिर्फ महिलाएं, बच्चे या बुजुर्ग ही बचे हैं। सभी युवा गांव से गायब हैं। 14 अप्रैल को ग्राम प्रधान रविदास मंदिर में बाबा साहब की प्रतिमा स्थापित करना चाहते थे, लेकिन तत्कालीन डीएम एमएस कमाल के आदेश के बाद पुलिस ने प्रतिमा की स्थापना नहीं होने दी। दूसरी तरफ ठाकुर पक्ष ने आरोप लगाया कि पांच मई को शब्बीरपुर में निकाले जा रहे जुलूस में प्रशासन ने समुचित सुरक्षा प्रदान नहीं की। इसके चलते बवाल हुआ। कुल मिलाकर सहारनपुरकांड जिला एवं पुलिस प्रशासन की चूक का नतीजा है। अगर उसने इस प्रकरण पर गंभीरता बरती होती तो सहारनपुर में बार-बार जातीय हिंसा उन्माद की हद तक न बढ़ती। निर्दोष लोगों को असमय अपनी जान से हाथ न धोना पड़ता। इसका मतलब क्या यह समझा जाना चाहिए कि प्रशासन दिल से योगी सरकार का साथ नहीं दे रहा है। वह इसलिए कि योगी राज में उसे काम करना पड़ रहा है और काम मन से किया जाता है। दबाव में नहीं। तबादले और निलंबन समस्या का समाधान नहीं है। योगी सरकार को अधिकारियों को भी विश्वास में लेना होगा और आम जनमानस को भी, तभी इस प्रदेश में विकास की गाड़ी आगे बढ़ सकती है। फिर कानून व्यवस्था सुधारने के लिए दो माह कम नहीं होते। जब भाजपा नेता अपराधमुक्त उत्तर प्रदेश के अपने दावे से मुकरने लगेंगे तो इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ेगा और विपक्ष को भी सरकार को घेरने का मौका मिलेगा। अच्छा होता कि योगी सरकार आरोपों-प्रत्यारोपों की राजनीति से ऊपर उठकर केवल जनहितकारी विकास योजनाओं को ही अंजाम तक पहुंचाने की सोचे। यही वक्त का तकाजा भी है।
-सियाराम पांडेय ‘शांत’

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