जरा करके तो देंखे पत्नी की प्रशंसा…!

जरा करके तो देंखे पत्नी की प्रशंसा…!

 जी हां, पत्नी की प्रशंसा जरा करके तो देखिए और तुरंत देखिए फिर उसका चमत्कार। पत्नी के चेहरे पर खिली लाजभरी सिंदूरी मुस्कुराहट सारे वातावरण को खुशनुमा और रंगीन बना देगी।
शादी के शुरू के दिनों में तीव्र शारीरिक आकर्षण के कारण पति अक्सर नई पत्नी के मोहपाश में बंधे होते हैं। तब उन्हें उनकी हर बात अच्छी लगती है, हर कार्य-कलाप प्रशंसनीय लगता है। उम्र का अपना नशा होता है। जीवन हनीमून की रंगीनियों से खुशनुमा होता है लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे गृहस्थी की जिम्मेदारियां बढऩे लगती हैं, आटे दाल का भाव मालूम पडऩे लगता है। बच्चे होने पर खर्चे बढऩे लगते हैं। बढ़ती महंगाई का सामना करते-करते पति-पत्नी दोनों ही तनावग्रस्त रहने लगते हैं। कुछ आज की परिस्थितियां, शहरों का रहन-सहन, मशीनी युग का असर सब मिलाकर जिंदगी की गाड़ी खींचना पहले सा आसान नहीं रह जाता।
समय के बीतते दांपत्य जीवन में एक स्थिरता, गहरी परिपक्वता आ जाती है। पति-पत्नी एक-दूसरे के स्वभाव व गुण-दोषों से भली-भांति परिचित हो जाते हैं। परिचय की प्रगाढ़ता में कहीं वे एक-दूसरे को इतना स्वीकृत कर चुके होते हैं कि इसमें दिखावे को व्यर्थ समझने लगते हैं और यही उनकी सबसे बड़ी भूल है।
दांपत्य जीवन का पौधा जब तक लगातार प्रशंसा के जल से सिंचित नहीं होगा, वह मुरझाने लगेगा। अपनी ताजगी खो बैठेगा। यह बात पति-पत्नी दोनों ही को ध्यान में रखनी चाहिए। पुरूष का अहं तो फिर भी इधर-उधर अपनी तृप्ति खोज ही लेता है लेकिन गृहिणी खासकर अगर वह कैरियर वुमन नहीं है और निहायत घरेलू किस्म की घर की चारदीवारी तक ही सीमित रहने वाली स्त्री है तो उसे प्रशंसा की ज्यादा जरूरत है।
पति-पत्नी का रिश्ता खून का रिश्ता नहीं है जो बना बनाया होता है। यह रिश्ता तो बनाया जाता है। इसे पुख्ता करता है उनका आपस का प्यार। प्यार अभिव्यक्ति मांगता है। प्यार की अभिव्यक्ति के अभाव में जीवन नीरस, शुष्क और मशीनी बनकर रह जाता है।
इसका परिणाम होता है पत्नी की अपने रख-रखाव, साज-सज्जा, बनाव श्रृंगार की ओर उदासीनता तथा लापरवाही। जब कोई प्रशंसा करने वाला, आंख उठाकर देखने वाला ही न हो तो किसके लिए अपने को सजाया जाए, इस तरह की भावना पत्नी के मन में घर कर जाती हैं। इसके परिणाम इतने भयंकर और दुखदायी होते हैं कि दांपत्य की इमारत को हिला कर रख देते हैं। संगीता एक कॉलेज में लेक्चरार है। उसके पति गौतम विवाह के चार साल बाद ही उसके प्रति इतने उदासीन हो गये कि उनकी दृष्टि इधर-उधर भटकने लगी है। संगीता सुन्दर है, स्मार्ट है लेकिन फिर भी पति की प्रशंसा उसे नहीं मिली तो वह बुझी-बुझी सी रहने लगी।
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एक बार मुझे वह एक साडिय़ों की दुकान पर मिल गई। सलवार सूट में वह अत्यंत आकर्षक लग रही थी। उसका खिला हुआ चेहरा व मुस्कराहटें बता रही थीं कि वह बहुत खुश है। कुछ दूर साथ चलते हुए अपनी खुशी का राज जाहिर करते हुए वह कहने लगी, ‘यार, आई एम इन लव, सच। शीनी, मयंक से मुझे प्यार हो गया है, आई मीन इश्क मुहब्बत। मयंक हमारे ही कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते हैं।’ मैंने चौंकते हुए कहा ‘संगीता तुम शादीशुदा हो। गौतम को पता चल गया तो?’
‘तो क्या,’ उसने अपनी आवाज में हिकारत भरते हुए कहा, ‘उन्हें मेरी परवाह ही कहां है? एक मयंक है कि मेरी तारीफ करते नहीं थकते-गौतम के नीरस व्यवहार और मेरे प्रति उदासीनता से मैं तंग आ गई हूं। लगता है अब हम साथ नहीं रह पायेंगे।’
संगीता और गौतम में तलाक हो गया। मयंक ने उसे धोखा दिया। उसने किसी और लड़की से शादी कर ली। संगीता के दोस्त, रिश्तेदारों ने उसकी शादी की असफलता के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहराया। उसे सबकी मलामत झेलनी पड़ी। खुद उसने अपनी गलती महसूस की लेकिन तब जब देर हो चुकी थी।
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हालांकि इस तरह के केस कम ही होते हैं जहां पत्नी अपनी सीमाओं का उल्लंघन कर शादी के बाद पर-पुरूष की ओर आकृष्ट हो प्रेम की पींगें बढ़ाने लगती है लेकिन ऐसा है, यह भी एक हकीकत है।
पति अगर नारी मनोविज्ञान की थोड़ी भी जानकारी हासिल कर लें तो पत्नी से वैमनस्य के कारण पैदा ही न हों। इसी तरह पत्नी भी पति की पसंद-नापसंद को जाने, उसे गिला-शिकवा करने का मौका ही न दे, तभी उसे पति की प्रशंसा प्राप्त हो सकती है। पति अक्सर इस बात की अहमियत नहीं जानते कि प्रशंसा के दो-चार वाक्य पत्नी के अहं के लिए कितने महत्त्वपूर्ण और आवश्यक होते हैं। इस प्रशंसा का परिणाम यह होता है कि पत्नी अपनी वेशभूषा, साज-सिंगार तथा रख-रखाव एवं व्यक्तित्व के प्रति सजग रहने लगती है। आपसी प्रेम और सौहार्दपूर्ण वातावरण में कही गई बात का असर भी सही ढंग से होता है। बातों को सही परिपेक्ष्य में देखा समझा जाता है। बात कहने का टैक्ट होना चाहिए बस। मान लीजिए पति को भड़कीले कपड़े और मेकअप पसंद नहीं है, इसी बात को पत्नी से आलोचनात्मक ढंग से न कह पति अगर यूं कहें, ‘सुनो डियर, तुम तो वैसे हूर की परी लगती हो। फिर इस सब लीपापोती की क्या जरूरत? इसमें तुम्हारा प्राकृतिक सौंदर्य दब जाता है।’ पत्नी के लिए इतना ही हिंट काफी होगा। वह फौरन समझ जाएगी कि पति महाशय को गाढ़ा चमकीला भड़कीला मेकअप पसंद नहीं। सलाह को हमेशा सीधे न दे कर प्रशंसा के साथ दिया जाये तो वह आसानी से ग्राह्य हो जाती है।
– उषा जैन ‘शीरीं’

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