…जब मन के द्वार पर हो पर-पुरुष की दस्तक

…जब मन के द्वार पर हो पर-पुरुष की दस्तक

 विवाह को जन्म जन्मांतर का बंधन मानने वाले जोड़े ही इसकी पवित्रता को ध्यान में रखकर विवाहित जीवन में आने वाली हर बाधा को पार कर जाते हैं। छोटे-मोटे झगड़ों को तूल देकर वे राई का पर्वत नहीं बनाते।
चाहते तो सभी हैं कि उनका विवाहित जीवन सुखमय हो, सफल हो तथा पति पत्नी के रिश्ते में कभी दरार न पड़े। इसके लिये प्रयत्न दोनों ओर से ही होना चाहिए, तभी बात बन पाती है। पुरुष तो अपनी भ्रमर प्रवृत्ति के लिये शुरू से बदनाम हैं लेकिन रसिक मिजाजी में औरत भी कहां पीछे है। कभी पुरुष उसे बहकाता है तो कभी वह अपने नयनबाणों से उसे घायल करती है।
कई बार यह सब कुछ अनजाने ही हो जाता है याने कि एक ईमानदार, चाहने वाला पति और बच्चों के होते हुए भी कोई स्त्री अपने मन, अपने जज्बातों पर काबू नहीं रख पाती और परपुरुष की चाहत में दीवानी होकर विवेकहीन बन जाती है।
जीवन के चौथे दशक में अपर्णा जो एक प्राइवेट स्कूल में प्रधानाध्यापिका थी, अपना दिल शालू के विधुर पिता सुशांत भटनागर से लगा बैठीं। तीन-तीन बड़े होते हुए बच्चों का मोह भी उन्हें घर छोडऩे से न रोक सका। नई शादी का नयापन खत्म होते ही वे दूसरे घर में ऊबने लगी। अपने बच्चों की याद उन्हें बुरी तरह सताने लगी।
इधर सुशांत भी उन्हें वो इज्जत न दे सका जो उन्हें उनके पहले पति ने दी थी। सुशांत का तर्क था कि जो औरत एक पति को छोड़ सकती है दूसरे को भी छोड़ सकती है। ऐसी स्त्री बिस्तर की शोभा तो बन सकती है, लेकिन जीवन साथी के दिल पर राज नहीं कर सकती।
ऐसे और भी बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे जब जीवन में एक पुरुष के होते हुए भी स्त्री किसी पर पुरुष के मोहजाल में फंस जाती है। आज चूंकि शहरों में हर तीसरी औरत कामकाजी है, उसका वास्ता लंबे समय तक दूसरे पुरुषों से पड़ता है। कार्यस्थल पर इंसान का व्यक्तित्व कुछ और होता है, घर की समस्याओं से जूझते हुए कुछ और।
वह चूंकि पति को उसकी समग्रता-उसके व्यक्तित्व के हर अच्छे बुरे पहलू को देखते हुए जानती है इसलिए अब पति में कोई आकर्षण नहीं रहता, लेकिन दूसरा व्यक्ति जो रोज-रोज मिलने पर भी काफी बातों में अनजाना रहता है उसका यही आकर्षण कई बार उसे अपनी ओर खींच लेता है। कई बार यह इतना तीव्र होता है कि उसकी सोच और बुद्धि को पूरी तरह कुंद कर देता है।
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हो सकता है पर पुरुष में कुछ वे गुण हों जो आपके पति में न हों लेकिन क्या उसमें दुर्गुण भी न होंगे? कोई भी व्यक्ति सर्वगुणसंपन्न नहीं होता, यह बात साथ रहने पर ही जानी जाती है। किसी के गुणों से प्रभावित होने में हर्ज नहीं। हर्ज है बेवफाई में। सब जानते हैं मन कितना चंचल होता है। तभी तो उसकी तुलना रेस के घोड़ों से की गई है इसलिए उसे नियंत्रण में रखना हर स्त्री का कर्तव्य है वर्ना यह रेस जीत नहीं, हार का पैगाम लेकर आयेगी।
कई पुरुष औरतों को फंसाने में माहिर होते हैं। उन्हें उनकी कमजोरियों का पता होता है जिसे भुनाना वे बखूबी जानते हैं। थोड़ी देर की जिंदादिली, खुशमिजाजी और चुटीली हाजिरजवाबी एक भ्रम भी तो हो सकती है। आपके धीर गंभीर पति में हो सकता है जो सिंसियरिटी, ईमानदारी है, वो उस जिंदादिल लगने वाले परपुरुष में न हो।
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अप्राप्य की कामना, यही तो है मानव फितरत। जो मिल गया, उसका मोल ही घट जाता है चाहे वह कितना ही अनमेल क्यों न हो। यही स्थिति कई बार दांपत्य में आ जाती है। इसका एक बहुत सरल साधारण उपाय है। सिर्फ क्षण भर के लिए सोचें, अगर आपका जीवनसाथी न रहे तो आप कैसे रिएक्ट करेंगी? आप पर क्या गुजरेगी?
अगले ही क्षण देखिए आप पति से लिपट जाएंगी और भावुक संवेदनशील प्रकृति की होने पर आंखें नम कर बैठेंगी। यह सच है कि भावनाओं की संभावनाओं को कई बार कुरेदने की आवश्यकता भी पड़ती है ताकि आप गलत दिशा में भटकने से बच सकें।

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