जब पीडि़त हों मूत्राशय संक्रमण से

जब पीडि़त हों मूत्राशय संक्रमण से

मूत्राशय संक्रमण या मूत्रमार्ग में सूजन स्त्रियों को पीडि़त कर देने वाली अत्यंत कष्टकारी बीमारी है। लगभग सत्तर प्रतिशत महिलाओं को यह बीमारी जीवनकाल में कभी न कभी अवश्य ही होती है जबकि पच्चीस प्रतिशत महिलाएं इस बीमारी से हमेशा पीडि़त रहती हैं। मात्र पांच प्रतिशत ही ऐसी महिलाएं होती हैं जो हिफाजत के कारण इस बीमारी से मुक्त रहती हैं।
कुछ महिलाएं ऐसी होती हैं जिनमें प्रथम सहवास के साथ ही संक्रमण प्रारम्भ हो जाता है। मध्य आयु की महिलाओं में मूत्राशय संक्रमण कठिन प्रसूति के बाद, मूत्रमार्ग में नली डालने के बाद या बच्चेदानी की शल्यक्रिया के बाद प्रारम्भ हो जाता है। रजोनिवृत्ति के बाद वृद्धावस्था में जब हार्मोन्स असंतुलन के कारण योनिमार्ग और मूत्रमार्ग में शुष्कता आ जाती है तो महिलाएं योनि संक्रमण या मूत्रशय संक्रमण से ग्रस्त हो जाती हैं।
मूत्राशय संक्रमण के प्रमुख कारणों में प्रथम सहवास के दौरान योनि में घाव हो जाना, योनि में जीवाणु का संक्रमण, अप्राकृतिक कामक्रीड़ा, सहवास के समय मूत्राशय या मलाशय का भरा होना, आदि प्रमुख हैं। गर्भावस्था में रक्त में हार्मोंस के बदलाव के कारण मूत्र में अम्ल एवं शर्करा की मात्र बढ़ जाती है जो मूत्राशय संक्रमण का कारण बनता है। इसके अतिरिक्त डायफ्राम टुडे का इस्तेमाल, जननांगों की चोट, रजोनिवृत्ति के बाद स्त्रियों में एस्ट्रोजन नामक हार्मोंस की कमी भी इस रोग के कारण बनते हैं।
वृद्धाओं में मूत्राशय संक्रमण का प्रमुख कारण उनकी मांसपेशियों में कमजोरी होती है जो मूत्राशय को पूरा खाली नहीं कर पाती है। मूत्राशय में बचा हुआ मूत्र संक्रमण का कारण बन जाता है। यह नहीं है कि सिर्फ विवाहितों में ही मूत्राशय संक्रमण होता है बल्कि कुंआरियों में भी यह बीमारी हो सकती है। टायलेट की सीटों की अच्छी तरह सफाई न होने के कारण प्रयोग के लिए जब उस पर लड़कियां बैठती हैं तो वहां स्थित कीटाणु मूत्रमार्ग में प्रवेश करके मूत्राशय या मूत्रमार्ग को संक्रमित कर देते हैं।
चाय पियें लेकिन देखभाल कर
मूत्राशय के संक्रमित होते ही बार-बार मूत्रत्याग की इच्छा होती है। इसके साथ ही पेशाब, मूत्र में जलन, कमर में दर्द, बुखार और कभी कभी पेशाब के साथ खून भी आने लगता है। मूत्राशय के अतिसंवेदनशील होने के कारण उस पर दबाव पड़ता है और बार-बार मूत्र त्याग की इच्छा होने लगती है। पेशाब में जलन, मूत्र नलिका का अवरूद्ध हो जाना या सूजन जैसे लक्षण उपस्थित हो जाते हैं। इसके अलावा पेशाब की शुरूआत देर से होती है, पेशाब की गति धीमी होती है, पेशाब कम मात्रा में होता है तथा मूत्रत्याग के बाद भी मूत्रत्याग की इच्छा बनी रहना, बूंद बंूद करके पेशाब का टपकना आदि मूत्रसंक्रमण या मूत्राशय संक्रमण के लक्षण होते हैं।
मूत्राशय संक्रमण होते ही अच्छे चिकित्सक को दिखाना चाहिए। लापरवाही विकराल रूप ले सकती है। जब तक आप चिकित्सक से सलाह लेकर उपचार शुरू नहीं करतीं, तब तक निम्नांकित घरेलू नुस्खों का इस्तेमाल करके स्वयं को राहत पहुंचा सकती हैं। जो महिलाएं बार-बार मूत्राशय संक्रमण से संक्रमित रहती हैं, वे निम्नांकित घरेलू नुस्खों में से किसी भी नुस्खे का इच्छानुसार प्रयोग करके रोगमुक्त हो सकती हैं। औषधि का नियमित प्रयोग आवश्यक है।
पचास ग्राम सफेद प्याज को बारीक काटकर आधा लिटर पानी में डालकर उबाल लें। जब पानी आधा रह जाये तो उसे आग पर से उतार कर महीन कपड़े में छान लें। ठंडा होने पर घूंट-घूंट करके चाय की तरह पिएं। इसके प्रयोग से कुछ ही दिनों मे मूत्राशय संक्रमण से संबंधित सभी बीमारियां दूर हो जाती हैं।
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पंद्रह ग्राम धनिया के दानों को लेकर रात में पानी में भिगोकर छोड़ दें। सुबह धनिया को पानी में से छानकर अच्छी तरह पीस लें और उसमें मिश्री मिलाकर नित्य पीयें। इस प्रयोग से पेशाब की जलन कम होती है और पेशाब खुलकर आता है।
पचास ग्राम आंवले का रस एवं तीस ग्राम शहद मिलाकर दिन में तीन बार तक पीते रहने से मूत्र संक्रमण की व्याधि दूर होती है। इसके प्रयोग से पेशाब की जलन एवं पेशाब का रूक-रूककर आना भी बंद हो जाता है।
नारियल पानी के साथ शुद्ध धनिया का चूर्ण पांच ग्राम की मात्रा में मिलाकर तथा इसमें पांच ग्राम गुड़ मिलाकर सुबह-शाम नित्य पीते रहने से दाहयुक्त मूत्र संक्रमण से छुटकारा मिल जाता है।
दो ग्राम इलायची को छिलके सहित अच्छी तरह कूट लें ओर उसे दो ग्राम दूध में उबाल आने तक उबालें। उबाल आ जाने के बाद दूध को ढककर रख दें। ठंडा होने पर सौ-सौ ग्राम की मात्रा में दूध लेकर आधे-आधे घंटे पर पीती रहें। इसके प्रयोग से मूत्रशय के संक्रमण के साथ ही मूत्र से संबंधित अनेक व्याधियां दूर हो जाती हैं। पेशाब की जलन दूर होकर मूत्र खुलकर आने लगता है। इन सभी घरेलू औषधियों का व्यवहार पूर्णत: हानिरहित है।
– पूनम दिनकर

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