जब आप किसी रिश्तेदारी में अकेली हों…!

जब आप किसी रिश्तेदारी में अकेली हों…!

नैतिक मूल्यों के अवमूल्यन के साथ आज जीवन से सुरक्षा भी कम होती जा रही है। आपसी विश्वास के मिटने से जीवन रसहीन व तनावपूर्ण होता जा रहा है। जैसे-जैसे नारी में शिक्षा बढ़ी है, उसकी इज्जत और भी घटी है। उसके बराबरी के दावे और कुछ जिस्म के भोंडे खुले प्रदर्शन ने पुरूष के मन से उसकी देवी स्वरूपा छवि को तहस-नहस कर डाला है।
ऐसे वातावरण में लड़कियां बेहद असुरक्षित होती जा रही हैं। वे लाख बोल्ड होने का दावा करें लेकिन सच्चाई यही है कि उनके इर्द गिर्द उनके यौवन को लेकर खतरा मंडराता है।
लड़कियों के साथ हमेशा कोई बॉडीगार्ड रहे, यह संभव नहीं। कई बार उन्हें अकेले इधर-उधर जाना पड़ सकता है। छुट्टियों में अक्सर वे रिश्तेदारों के घर जाती हैं जो दूर या नजदीक के हो सकते हैं। कई बार लड़कियां बड़ी बहन के ससुराल बुलाई जाती हैं, कभी घूमने फिरने या कभी कार्य से जैसे बहन की बीमारी या डिलीवरी पर उसकी देखभाल के वास्ते। यह एक नाजुक मामला है।
मां को चाहिए कि बेटी को किसी भी रिश्तेदार के पास रहने के लिये भेजते हुए उसे पूरी तरह चेतावनी देकर सावधानी से रहने के लिये कहकर उसे दुनियां की ऊंच-नीच से भली प्रकार वाकिफ कराके भेजें। अक्सर लड़कियां चूंकि नादान और भोली होती हैं, वे लंपट किस्म के शोहदों जो कि सगा जीजा या उसका कोई रिश्तेदार हो सकता है, के बहकावे में आकर जिंदगी बर्बाद कर लेती हैं।
टीचर – संजू यमुना नदी कहां बहती है.. ?

यह तो हुई सगी बहन के घर की बात। इसी तरह कई और रिश्ते भी हो सकते हैं जहां लड़की असुरक्षित रह सकती है। यह बहुत कुछ परिस्थिति पर निर्भर करता है, रिश्तेदार का चरित्र तो अहम है ही। लड़की में जरा भी समझदारी हो तो वह अपना बचाव कर सकती है। मजबूरी केवल 20 प्रतिशत हो सकती है। 8० प्रतिशत लड़कियों की अपनी बेवकूफी और नादानी होती है। अपेक्षित सावधानी चातुर्य और सामान्य प्रज्ञा का इस्तेमाल उसे दुखद हादसों से काफी हद तक बचा सकता है।
मानवीय संबंधों को समझने के लिये न उच्च शिक्षा ही जरूरी है न उसके लिए उम्रदराज होना जरूरी है। एक उम्र में आने पर जब पुरूष की लोलुप दृष्टि लड़कियों पर पडऩे लगती है उसे पुरूष की अच्छी बुरी नजर की पहचान खुद ब खुद होने लगती है। ये लड़की के संस्कार हैं कि वह इसे किस रूप में लेती है।
घर आए अतिथि को उचित सम्मान दें

उथली, फ्लर्ट, चलता पुर्जा किस्म की लड़कियां इसे अपने यौवन को अभिवादन मान खुश होती हैं एवं कभी-कभी बढ़ावा भी देती हैं और बदले में स्वयं ही पतन की खाइयों में जा गिरती है। धीरे-धीरे गंभीर, संस्कारयुक्त, शालीन लड़कियां इसे खतरे की घंटी मानकर ऐसे लोगों से दूरी रखकर चलना ठीक समझती हैं, बढ़ावा देना तो दूर की बात है, उनमें अपने चरित्र को लेकर ढेर सा मनोबल और गहरा आत्मविश्वास होता है जो उनके लिये रक्षाकवच होता है। लड़कियों में निडरता होना बहुत जरूरी है। ये वे गुण हैं जो उनके आत्मसम्मान को क्षतिग्रस्त होने से बचाते हैं। सभी रिश्तेदार बुरे नहीं होते। रिश्तों की पवित्रता हमेशा शक के दायरे में भी नहीं आती वर्ना जीवन से सारा माधुर्य ही चूक जाएगा लेकिन स्नेह प्यार और कामुकता का भेद समझना हर लड़की के लिये जरूरी है। साथ ही उसे छिछोरापन और उत्तेजित करके वाले व्यवहार से बचते हुए मर्यादित व्यवहार करना चाहिए। मौका पडऩे पर वह भी दुर्गा का अवतार बन सकती है। इस विश्वास के साथ उसे जीना है।
ञ्च उषा जैन ‘शीरीं’

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