जनता को मिलें बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं

जनता को मिलें बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं

हमारा एक सरकारी अस्पताल चलने से लाचार अपने एक मरीज को स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं करा पाता है जिसके चलते उस मरीज की पत्नी को उन्हें एक हाथ से घसीट कर अस्पताल के वार्ड तक ले जाने को मजबूर होना पड़ता है। क्या इसी दिन के लिए हमने आजादी पाई थी?
इसी तरह परिवार नियोजन के क्षेत्र में समग्र प्रगति और व्यापक बहस के बावजूद महिलाओं के स्वास्थ्य और प्रजनन संबंधी अधिकारों को हासिल करने में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में काफी असमानताएं हैं। शिक्षा का कमजोर स्तर, विषम भौगोलिक स्थिति और सामाजिक-आर्थिक परिवेश वंचित समुदायों की महिलाओं के लिए, परिवार नियोजन सेवाओं की उपलब्धता में बड़ी बाधा है। देश को स्वतंत्र हुए 70 साल हो रहे हैं और हम अभी तक सरकारी अस्पतालों में स्ट्रेचर, एंबुलेंस, व्हीलचेयर जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं करा पाए। क्या हमने ऐसी ही सरकारें चलाई हैं? क्या हमने यही संवेदनहीन प्रशासनिक ढांचा खड़ा किया है?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक, अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों में शिशु मृत्यु दर, जन्म पर क्रमश: 62.1 और 66.4 थी जबकि अखिल भारतीय औसत 57 था। आंकड़ों के मुताबिक, अनुसूचित जनजातियों की महिलाएं गर्भनिरोध साधनों का सबसे कम प्रयोग 48 प्रतिशत करती हैं। अन्य पिछड़े वर्ग की 54 फीसदी और अनुसूचित जातियों की 55 प्रतिशत महिलाएं ही गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करती हैं। भारत में माताओं और बच्चों में होने वाले रोगों और इनसे हो रहीं मौतों के आंकड़े काफी हैं। विश्व पोषण रिपोर्ट 2015 के अनुसार भारत में 5 वर्ष से कम आयु के 4.8 करोड़ बच्चे शारीरिक रूप से अविकसित हैं। अपर्याप्त स्वच्छता, शौचालयों के खराब रखरखाव और अस्वच्छ कार्यविधियों से संक्रमण के प्रसार में बढ़ोत्तरी होती है। जब पानी को अनुचित तरीके से संग्रहित किया जाता है या जल स्रोतों को दूषित किया जाता है तब डेंगू और मलेरिया रोग अति शीघ्रता से फैलते हैं।
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देश के सरकारी अस्पतालों की हालत किसी से छिपी नहीं है। कहीं चिकित्सक नहीं हैं, कहीं नर्सें नहीं हैं, कहीं एंबुलेंस नहीं हैं, कहीं स्टे्रचर-व्हील चेयर नहीं हैं, कहीं बेड नहीं हैं, कहीं कुर्सियां नहीं हैं, तो कहीं दवाएं नहीं हैं। इन सब चीजों के नाम पर न जाने कितनी बार फंड आवंटित हुए होंगे।
हमारे स्वास्थ्य तंत्र में हर तरफ अंधकार पसरा लगता है। परिवार नियोजन, शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर के बीच नजदीकी संबंध है। अगर बच्चों के बीच कम से कम 2 वर्ष का अंतर हो तो इससे शिशु मृत्यु दर में करीब 10 प्रतिशत और मातृ मृत्यु दर में तकरीबन 44 प्रतिशत तक की कमी आएगी। आसान शब्दों में कहें तो, किसी भी गर्भनिरोधक का इस्तेमाल न किया जाए तो माताओं की मृत्यु दर कुल मातृ मृत्यु दर से 1.8 गुना अधिक होगी।
वह सरकारी अस्पताल आंध्र प्रदेश के अनंतपुर का है, जहां पति का इलाज कराने पहुंची महिला को वहां मौजूद कर्मी ने स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं कराया, जिसके बाद महिला पति को फर्श पर घसीटते हुए वार्ड तक ले जाने को विवश हुई। इस दौरान किसी ने भी महिला की मदद नहीं की। महिला का कहना है कि उसके पति के पैर में संक्रमण की वजह से वह चल नहीं पा रहा था। हमारे सरकारी अस्पतालों की कितनी शर्मसार करने वाली यह स्थिति है। यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी सरकारी अस्पतालों की संवेदनहीनता लाचारी के रूप में सामने आ चुकी है।
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प्रसव के दौरान होने वाली महिलाओं की मृत्यु का दूसरा मुख्य कारण है, प्रसव संबंधी संक्रमण जो अस्वच्छ क्कियाओं के कारण होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में केवल 72 प्रतिशत स्वास्थ्य सुविधाओं में पानी का प्रयोग किया जाता है और 59 प्रतिशत स्वास्थ्य सुविधाओं को ही स्वच्छता से निभाया जाता है। रोगों का निवारण और उपचारात्मक सेवाओं को पूर्णता प्रदान करने में डब्लू.ए.एस.एच(वॉश) की भूमिका को बहुत लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
वंचित समुदायों की महिलाओं के दयनीय स्वास्थ्य संकेतकों के पीछे सेवाओं की कमी के साथ-साथ सोच-समझ कर विकल्प चुनने और निर्णय करने की क्षमता का अभाव भी एक कारण है। सवाल इस बात का है कि जिनको परिवार नियोजन की सर्वाधिक जरूरत है, उन तक ये सेवाएं क्यों नहीं पहुंच पा रहीं और वे क्यों इनका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे? इस पर विचार किए जाने की आवश्यकता है। जरूरत है प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी और गर्भनिरोधक साधन सुलभ कराने की। इस दिशा में कमजोर वर्ग के राष्ट्रीय औसत सुधार के लिए उनके बेहतर स्वास्थ्य को सुनिश्चित करना होगा।
– नरेंद्र देवांगन

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