छू सकते हैं आकाश आप भी..बस दृढ़ निश्चय आप में होना चाहिए

छू सकते हैं आकाश आप भी..बस दृढ़ निश्चय आप में होना चाहिए

   46292920-primo-piano-d-azione-ritratto-di-giovani-ragazze-in-salto-vacanza-sulla-spiaggia-due-donne-felici-at-archivio-fotograficoआप क्या पाना चाहते हैं, आप का क्या लक्ष्य है, यह बात अपने मन में अच्छी प्रकार बिठा लें। फिर जुट जाएं इसकी प्राप्ति में। आपके विचारों में यदि लक्ष्य के प्रति जरा भी संशय होगा, शक होगा, दुविधा रहेगी तो आप जीतकर भी हार जाएंगे। आप के मन में लक्ष्य की सही धारणा जरूरी है। आपका अंतिम पड़ाव बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए। यदि ऐसा है तो आपकी राह में कोई रोड़ा नहीं बन सकता। यदि कोई रुकावट बनेगा तो वहीं चूर चूर हो जाएगा। बस दृढ़ निश्चय आप में होना चाहिए। पहले दक्षता को परखें:  यहां मैं यह कहना जरूरी समझता हूं कि अपने लक्ष्य का निर्धारण करते समय आप अपनी आयु, अपनी योग्यता, अपनी शिक्षा, परिश्रम करने की क्षमता, रुकावटों से जूझने तथा इन पर काबू पाने का संकल्प, अपनी वास्तविक दक्षता को जरूर पहचान लें। फिर निर्धारित करें लक्ष्य। जरा सोच समझकर निर्णय लें। यही वक्त है सही रास्ते को चुनने का। अंतिम बिंदु को निर्णय में लेने का। जब सोच विचार व समझकर आपने अपना सही तथा स्पष्ट लक्ष्य बना ही लिया है तो पीछे मुड़कर देखना छोड़ दें। आगे बढ़ते जाएं। और आगे ही। ऐसा कुछ भी नहीं जो असम्भव हो। अपनी पूरी शक्ति के साथ किया प्रयत्न आपको अवश्य सफलता देगा। इस बात को निश्चित मानें। संदेह से परे। तभी छू पाएंगे गगन चुम्बी चोटी को।
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आवश्यक जानकारी:  जब खूब सोच समझकर आपने कोई लक्ष्य निश्चित कर ही लिया है तो अब इसके पीछे पड़ जाएं। इसकी हर प्रकार की जानकारी प्राप्त करने में जुट जाएं। जितना आप जानते हैं, उसे कम समझें। खूब बारीकी में जाएं। अपनी समस्या की तह तक उतरें। अंतिम छोर तक चले जाएं। इसके लिए अध्ययन-सामग्री जुटा लें। अपनी उम्र के अनुसार हमजोली ढूंढ़ें। इस कार्य की तैयारी के लिए समय जुटाएं। जितना कठिन काम है, उतना अधिक समय प्रदान करें। कैसा रास्ता है। इसे और सुरक्षित राह कैसे बनाया जा सकता है। ये सब बातें आपके ध्यान में आ जानी चाहिए।हठवादी नहीं बनें:  हमें आशा है कि आपने अपने लक्ष्य को चुनते समय आपने सामाजिक सुविधा व परिस्थिति को अवश्य ध्यान में रख लिया होगा। इसमें कोई गलती न की होगी। हठवादी प्रवृत्ति से लक्ष्य नहीं चुना होगा, बल्कि गंभीर विचार के बाद लक्ष्य पर अंगुली रखी होगी। अब आप पुरी जानकारी के बाद एक-एक कदम सोचकर उठाएं। मन की सामान्य प्रवृत्ति को बनाए रखें। कदम बढ़ाते समय पांव मजबूती से उठाएं। अपनी पकड़ को ढीला न होने दें। चलें तो व्यवहारिक ढंग से ही। हवा में हाथ न मारें। आकाश के तारे तोड़ सकने की बड़ी-बड़ी बातें न
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करें। बस लक्ष्य के पीछे ही पड़ जाएं। आपमें लक्ष्य-भेद का जुनून आ जाना चाहिए। फिर बड़ी से बड़ी रुकावट को भी मुंह की खानी पड़ेगी तथा आप अवश्य सफल होंगे। मनवांछित सफलता के लिए परिश्रम: आपने निश्चय कर ही लिया है कि आपको क्या पाना है। किस ऊंचाई तक जाना है। किस बिंदु को छूना है। याद रखें कि आप की सफलता आपकी मुट्ठी में तभी आ सकती है यदि आप परिश्रमी हों। हवाई घोड़े दौड़ाने वाले न हों। कड़ी मेहनत से अपने लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता हो आप में। आप की योग्यता, दृढ़ इच्छा शक्ति तथा कार्य-सामग्री व पुस्तकें आदि तभी काम आएंगी जब आप अपने व्यवहार में ढील नहीं आने देंगे। आप जरा भी लापरवाही नहीं करेंगे। परिश्रम करेंगे तथा करते रहेंगे। इस लगन व परिश्रम से आप कठिन से कठिन लक्ष्य को भी प्राप्त कर लेंगे, यह हमारा दावा है। यदि आपने जरा से भी अपने कदम डगमगा दिए तो आपको परेशान कर देने वाली असफलता का मुंह देखना पड़ सकता है। अडिग रहें। बढ़ते रहें। प्रयत्न जारी रखें। लोग क्या कहते हैं इस बात की परवाह न करें। वक्त आएगा जब सफलता आप के कदम चूमेगी।आत्मविश्वास में कमी न आने दें: आत्म विश्वास एक ऐसा गुरु-मंत्र है जिसके सहारे आप बड़े कार्य को छोटा कर सकते हैं। ऊंचाई भी आपके लिए समतल लगेगी। आपको तो आगे ही बढऩा है। इस बात का आप में आत्मविश्वास हो कि आप का लक्ष्य उतना ऊंचा नहीं, जहां तक आप की पहुंच न हो। सब कुछ आपकी क्षमता के अंदर है। कार्य कम कठिन है। आपकी क्षमता तो उससे भी अधिक है, यह आप के मन में पूरी तरह विश्वास होना चाहिए। तभी आप लक्ष्य को बेध सकेंगे। आप अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर निरंतर कोशिश करते रहें। हिम्मत बनाए रखें। कदम-दर-कदम आगे बढ़ते रहें।सही दिशा-सही कदम:  चूंकि आप अपने कार्य की पूरी जानकारी प्राप्त कर, इसे हाथ में ले चुके हैं, अत: ऐसा कभी भी न सोचें कि यह आपकी पहुंच के बाहर है। कठिन है। इसे पाना नामुमकिन है बल्कि यह सोचकर कि लक्ष्य आपकी क्षमता के अनुरुप है, आगे बढ़ें। सही समय पर, सही दिशा में चलते ही चोट करें। सही कदम उठाकर कार्य सम्पूर्ण करने का ध्येय बनाए रखें। ढील तो आने ही न दें। जब आप अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर कोशिश करेंगे सफलता मिलेगी और अवश्य मिलेगी। कल्पना न करें:  असफल होने की तो कभी कल्पना भी न करें। कभी भी नहीं। सदा सफल होने की सोचें। किसी भी कार्य में सफल होने की सोच लेना कोई अतिश्योक्ति नहीं होती। यह दिवास्वप्न नहीं होता। आप सही मात्रा में, सही दिशा में प्रयत्न कर रहे हैं, सफलता पाना आपका अधिकार है। सफल हो सकने की सोचना कोई बुरी बात नहीं। बल्कि सफल हो जाने का सही रास्ता भी है। 
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मैं एक ऐसे अधिकारी को जानता हूं जो बहुत योग्य विद्यार्थी नहीं था। मगर वह बड़ा परिश्रमी था। जब भी किसी परीक्षा को पास करने की बात चलती तो उसके मित्र घबरा उठते। कोर्स पूरा न होने की बात कहते। कई पाठों के हिस्सों के समझ में न आने की बातें करते। कभी अपने अध्यापक की योग्यता पर भी शक करने लगते। मगर वह ऐसा न सोचता, न कहता, न ही फैल होने की कभी कल्पना किया करता। वह बात करता तो आत्मविश्वास के साथ। जो विद्यार्थी काफी योग्य होते, पढ़ाई में उससे आगे होते-वे उस पर हंसने लगते। उसके आत्मविश्वास का मजाक उड़ाते। जबकि वह उनकी हंसी की ओर ध्यान ही न देता। उनके मजाक का जरा भी नोटिस न लेता। उनके कटाक्ष पर कभी विचलित ही न होता। असफलता को अपने लिए कभी सोचता ही नहीं। कल्पना करता तो सफलता की, ऊंचे अंकों की। उन प्रश्नों की जो वह जानता है तथा उन्हें ही परीक्षा में पा लेने की सोचा करता। जब परीक्षा परिणाम आया तो वह सबसे आगे था। योग्य बच्चों के कान कतरता हुआ आगे निकल गया। परीक्षाएं पास करता रहा। प्रतियोगिताओं में बैठता रहा। उत्तीर्ण ही नहीं होता था, बल्कि काफी आगे निकल जाता था। आज वह एक उच्च अधिकारी हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा में। उसके वे मित्र, वे सहपाठी जो शंका में जी रहे थे, असफल हो जाने की कल्पना किया करते थे, बहुत पीछे रह गए। कोई अध्यापक बना तो कोई दुकानदार। कोई लिपिक बना तो कोई तृतीय श्रेणी का कर्मचारी।अत: हम कहेंगे कि आप अपना लक्ष्य निर्धारित करके कभी पीछे न देखें। परिश्रम में कमी न आने दें। लगन पूर्वक चलते रहें। सदा आशावादी बने रहें। निराशा को पास ही न फटकने दें। मेहनत करने से पीछे न हटें। अर्जुन की तरह आप को पूरी चिडिय़ा नहीं, उसकी केवल आंख ही नजर आनी चाहिए, जिसे आपने बेधना है। रास्ते की रुकावटों को गौण समझें। लक्ष्य को मुख्य। जब तक लोहा गर्म नहीं हो चोट देने का कोई लाभ नहीं। जब खूब तप जाए, गर्म हो जाए तो किसी प्रकार की प्रतीक्षा न करें। चोट मारुं या नहीं, ऐसी दुविधा मन में न आने दें। सही समय पर लगाई एक चोट भी आपके कठिन तथा बड़े कार्य को सरल कर देगी। आपका ध्येय पूरा कर देगी। आपको सफलता देगी। लक्ष्य की प्राप्ति करा देगी। ठंडे लोहे पर पचासों चोटें और तपे हुए लोहे पर दो चार चोटें, बराबर होती हैं। बल्कि ठंडे लोहे पर किया, परिश्रम बेकार जाने की अधिक संभावना होती है। अत: मौका संभालें। सही दिशा में चलें। लक्ष्य-भेद का जुनून जब आ जाएगा तो कोई भी आपकी सफलता को नहीं रोक पाएगा। यकीन मानें।आप ये ख़बरें और ज्यादा पढना चाहते है तो दैनिक रॉयल unnamed
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