चेतावनी: जरूरत है प्लास्टिक के अस्तित्व को मिटाने की..!

चेतावनी: जरूरत है प्लास्टिक के अस्तित्व को मिटाने की..!

आवश्यकता आविष्कार की जननी है लेकिन अगर आविष्कार परिष्कृत हो कर विनाश का द्योतक हो जाए, एक अभिशाप बन जाए तो पर्यावरण के लिए खतरनाक हो जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि हम प्लास्टिक के संसार में जी रहे हैं। यहां हर ओर प्लास्टिक से बने उत्पाद हैं, फिर चाहे वह पानी की बोतल हो, टिफिन बॉक्स हो या फिर टूथब्रश। हमारे लैपटॉप, मोबाइल से ले कर खाने की सामग्रियां भी प्लास्टिक कंटेनर में सुरक्षित रहती हैं लेकिन क्या सचमुच?
प्लास्टिक के अनैतिक उपयोग से गंभीर पर्यावरणीय संकट उत्पन्न हो गया है। हालिया कई शोधों ने इस पर मुहर लगा दी है कि प्लास्टिक न केवल प्रकृति के लिए खतरा है बल्कि सीधे-सीधे हमारे स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा रहा है। इसमें इस्तेमाल होने वाला रसायन बिसफेनॉल-ए(बीपीए) कई तरह की बीमारियों जैसे कैंसर, बांझपन या नपुंसकता, जन्मजात बीमारियों तथा डायबिटीज का कारक बन रहा है। इसके मद्देनजर अब बाजार में बीपीए फ्री उत्पाद भी मिल रहे हैं जो अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं।
बीपीए या बिसफेनॉल-ए एक इंडस्ट्रियल केमिकल है जिसका इस्तेमाल प्लास्टिक निर्माण में होता है। यह खासतौर पर पॉलीकार्बोनेट प्लास्टिक व इपॉक्सी रेजिन्स में पाया जाता है जो कि वही प्लास्टिक हैं जिसमें खाना-पेय पदार्थ आदि स्टोर किए जाते हैं। धातु के कंटेनरों के भीतर इपॉक्सी रेजिन की पर्त होती है। यह रसायन खाना या पेय पदार्थ में घुल-मिल जाता है तथा स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। गर्भ में पल रहे शिशु के विकास पर भी इसका असर पड़ता है। शरीर में इस रसायन की मात्रा न्यूनतम स्तर तक ही सुरक्षित हो सकती है इसलिए जहां तक संभव हो, इससे बचाव की जरूरत है।
साफ-सुथरी दिखने वाली पानी की बोतल, बेबी बॉटल, बेबी सिपर, रेडी टू ईट कंटेनर्स के साथ टूथब्रश, कांटैक्ट लैंस, सीडी तथा अन्य इलेक्ट्रानिक उत्पादों जैसे मेडिकल डिवाइस, वॉटर कूलर व क्रेडिट काडर््स में भी पाया जाता है। प्लास्टिक के अलावा यह कई अन्य धातु से बने उत्पादों में भी पाया जाता है जैसे मेटल कैन की भीतरी पर्त तथा टूथपेस्ट की सील के रूप में। एटीएम, दुकानों या रेस्टोरेंट्स में मिलने वाली रसीद में भी कुछ मात्रा होती है।
इस रसायन का धीमा जहर स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। वयस्कों में प्रजनन क्षमता की कमी, हायपरटेंशन, गर्भ में पल रहे शिशु के मस्तिष्क पर असर, डायबिटीज, कुछ खास तरह के कैंसर जैसे ब्रेस्ट कैंसर, एलर्जी, बच्चों में समय से पहले प्यूबर्टी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
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बीपीए के साथ समस्या यह है कि यह एक टिपिकल जहर की तरह व्यवहार नहीं करता बल्कि एंडोक्राइन डिसगप्टर की तरह धीरे-धीरे शरीर के हार्मोन्स पर असर डालता और बीमार बनाता है। यही कारण है कि ज्यादातर लोगों का इस पर ध्यान भी नहीं जाता है।
बीपीए उत्पाद से बाजार भरा है इसलिए कुछ तरीकों से इसके गैर जरूरी एक्सपोजर को टाला जा सकता है। जैसे बहुत सी कंपनियां बीपीए फ्री उत्पाद बनाने लगी हैं। बीपीए फ्री डिब्बाबंद उत्पादों का सेवन कम करने के साथ ताजा बना खाना काफी हद तक बीपीए की समस्या कम कर सकता है। प्लास्टिक की बोतल की बजाए कांच की बोतल में पानी स्टोर किया और पिया जा सकता है। जूस, नारियल पानी, सूप आदि लेते समय ध्यान दें कि क्या बाजार में इनका बीपीए फ्री विकल्प भी मौजूद है। अम्लीय या नमकीन खाद्य सामग्री लेते समय अतिरिक्त सावधान रहें।
बेबी बॉट्ल्स व सिरप लेते वक्त खास ध्यान देना चाहिए। कोशिश करें कि कांच की बनी बॉटल लें या फिर पॉलीप्रॉपीलीन बॉटल ले सकते हैं जिसके तले पर पांच लिखा हो। दूध का पैकेट भी जो कि कई चरणों से गुजर कर हमारे पास आता है इसमें भी बीपीए हो सकता है। कुछ सामान्य से प्रयासों से इस खतरनाक रसायन की मात्र अपनी रूटीन जिंदगी में घटाई जा सकती है।
मानव जीवन में प्लास्टिक का सूक्ष्म मात्रा में प्रवेश प्राणघातक होता है तथा विषाक्त गैस स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। जिन जगहों पर प्लास्टिक पड़ी होती है, उस स्थान का हवा, पानी और प्रकाश आदि से संपर्क विच्छेद हो जाता है। फलस्वरूप बीजों व वनस्पतियों का अंकुरण नहीं हो पाता तथा जैवविविधता नष्ट हो जाती है। जलस्रोतों पर भी प्लास्टिक का प्रभाव पड़ता है। प्लास्टिक से जलस्रोतों की जैव संपदा नष्ट हो जाती है तथा सीवर लाइन चोक होने का 70 प्रतिशत कारण प्लास्टिक कचरा ही होता है जो विषाक्तता का वातावरण तैयार करता है। प्लास्टिक ने भारतीय संस्कृति पर भी अपना असर छोडऩा प्रारंभ कर दिया है। हमारी श्रद्धा का केंद्र पर्वतराज हिमालय तथा पवित्र नदियां चाहे वह गंगा हो, कावेरी हो, गोदावरी हो या नर्मदा, ये सब निरंतर दूषित हो रही हैं व अपनी जल शोधन क्षमता खो रही हैं।
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प्लास्टिक की उपयोगिता को हम नकार नहीं सकते। प्लास्टिक विहीन जीवन की परिकल्पना अधूरी है लेकिन ‘उपभोग कर अनुपयोगी समझ’ की मानसिकता में बदलाव लाना होगा। इसकी विभीषिका को आत्मसात करना होगा तथा निवारणार्थ कमर कसनी होगी क्योंकि कुल कचरे का 4 से 5 प्रतिशत भाग प्लास्टिक का होता है। आजकल प्रत्येक स्थान पर प्लास्टिक के दर्शन हो जाते हैं चाहे वह राजमार्ग हो, रेलवे लाइन हो, सड़क का किनारा हो या कोई सार्वजनिक स्थान।
प्लास्टिक कंटेनरों में पॉलीकार्बोनेट होता है जिसमें बीपीए पाया जाता है। इस प्लास्टिक का रोजाना एक्सपोजर यानी इस्तेमाल कैंसर, डायबिटीज, लड़कियों में समय से पहले किशोरावस्था, माइग्रेन, चिड़चिड़ापन, हायपरटेंशन जैसी समस्याएं देता है। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी प्रभावित करता है। खासतौर पर छोटे बच्चे जो दूध या पानी के लिए बॉटल्स का रोजाना उपयोग करते हैं, उनके विकास पर नकारात्मक असर डालता है।
ऐसे में यह जरूरी है कि बीपीए उत्पाद का उपयोग कम से कम हो। कांच या धातु का ज्यादा उपयोग करें। बच्चों में दांत निकलने के वक्त टीथर देना भी उसे नुकसान पहुंचा सकता है इसलिए यह प्रैक्टिस टालनी चाहिए। खाने की चीजों को प्लास्टिक कंटेनर में रख कर माइक्रोवेव में गर्म करने से बचना चाहिए।
-नरेंद्र देवांगन

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