चुनाव आयोग तो बहाना, मोदी की नई नोट पर निशाना : सियाराम पांडेय’शांत’

चुनाव आयोग तो बहाना, मोदी की नई नोट पर निशाना : सियाराम पांडेय’शांत’

समाजवादी पार्टी को आपत्ति है कि चुनाव आयोग समाजवादी एंबुलेंस सेवा से समाजवादी शब्द हटवा रहा है। ढंकवा रहा है तो वह नोट पर छपे हाथी और कमल क्यों नहीं हटवा रहा है। जिनके पास केंद्र सरकार की नव प्रकाशित नोट है, उन्हें भी इस बात का अंदाज नहीं होगा कि उस नोट में क्या है? बहुतों को तो नोट की बारीकियां अभी समझ में ही नहीं आई हैं। तभी तो कोई दो हजार और पांच सौ रुपये की नोट की फोटो काॅपी पकड़ा देता है और कोई एटीएम में ही चूरन वाली नोट डाल आता है। इस देश की जनता बहुत भोली है। उसे उसका बल याद दिलाना पड़ता है।’का चुप साध रहा बलवाना।’ अन्यथा उसे पता भी नहीं चलता कि उसके पास बल नाम की भी कोई चीज है। समाजवादी पार्टी ही बताए कि नव प्रकाशित रुपयों का क्या किया जाना चाहिए? क्या उसका बाजार में प्रचलन बंद कर दिया जाना चाहिए? वाहन पर तो समाजवादी शब्द दोबारा लिखा जा सकता है लेकिन रुपयों से कमल और हाथी हटाने के बाद उसी नोट पर उसे फिर कैसे छापा जाएगा, इसका क्या विकल्प है सपा के पास, यह भी तो बताया जाना चाहिए। क्या इतनी राशि में छपे नोटों को इसलिए बर्बाद कर दिया जाना चाहिए क्योंकि उत्तर प्रदेश में अभी तीन चरणों के चुनाव होने हैं। पांचवें चरण का चुनाव तो सोमवार को ही हो रहा है। मतलब बाल की खाल निकालने में भी सपा ने देर कर दी। पिछले चुनाव में जब निर्वाचन आयोग ने जनशिकायत के आधार पर अंबेडकर पार्क में बनी हाथी की मूर्तियों को ढंका था तब तो सपा ने इस पर ऐतराज व्यक्त नहीं किया था।
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वर्ष 2012 के चुनाव में उच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर की गई थी जिसमें प्रार्थना की गई थी कि हाथ की चुनाव निशान के रूप में मान्यता समाप्त की जाए। भले ही उस समय उच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज कर दिया था लेकिन जब तक चुनाव आयोग रहेगा, चुनाव प्रक्रिया रहेगी तब तक कोई न कोई चुनाव निशान को चुनौती देता रहेगा। चुनाव संहिता का तकाजा तो यह है कि मतदान केंद्र से दौ सौ मीटर के दायरे में चुनाव को प्रभावित करने वाली एक भी सामग्री नहीं होनी चाहिए। मतदान केंद्र अमूमन स्कूलों में बनाए जाते हैं जहां हैंडपंप लगे होते हैं। वे पानी देते हों या न देते हों लेकिन चुनाव को किसी न किसी रूप प्रभावित तो करते ही हैं। हैंडपंप राष्ट्रीय लोकदल का चुनाव चिन्ह है। हाथ कांग्रेस का चुनाव चिह्न है और साइकिल सपा का चुनाव चिह्न है। हाथ तो हर मतदान केंद्र तक जाता है। वह मतदाताओं का भी होता है और कांग्रेस के पोलिंग एजेंटों का भी। मतदान की स्थिति का जायजा लेने के लिए प्रत्याशी भी मतदान केंद्र तक जाते हैं। हाथ दिखाकर मतदाताओं को संकेत तो किया ही जा सकता है। हाथ हिलाने और दिखाने का कोई प्रमाण भी नहीं होता तो क्या चुनाव नियमावली के तहत हाथ काट दिए जाने चाहिए। होमगार्ड के जवानों की, पुलिस वालों की साइकिलें मतदान केंद्र के सामने खड़ी होती है। वोॉटो देने के लिए मतदाता भी साइकिल से आते हैं। और ये साइकिलें मतदान केंद्र के दो सौ मीटर के दायरे तक पहुंचती हैं। क्या इससे समाजवादी पार्टी का प्रचार नहीं होता। चुनाव प्रचार तो सैद्धांतिक रूप से दो दिन पहले ही समाप्त हो जाता है लेकिन क्या ये चुनाव चिह्न प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कांग्रेस, सपा और रालोद का प्रचार नहीं करते? मतदान केंद्र के पास बाल्टी भी रखी होती है। कलम तो पीठासीन अधिकारी के ही पास होती है।
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कुछ पीठासीन अधिकारी चश्मा भी लगाते हैं। चुनाव आयोग के चुनाव निशान में बाल्टी, पेन, कलम-दवात, चश्मा का चुनाव निशान भी किसी न किसी प्रत्याशी को आवंटित होता है। कुछ ऐसे जानवर भी आस-पास बंधे होते हैं जो चुनाव निशान के रूप में अधिमान्य हैं। चुनाव निशान को लेकर सवाल उठाना स्वाभाविक है लेकिन इसका जवाब क्या है। समस्या गिना दी। बहुत अच्छा लेकिन इसका समाधान क्या है, यह भी तो बताया जाना चाहिए। सपा और कांग्रेस द्वारा यह भी तो बताया जाना चाहिए कि कोई भी नोट को मतदान के दौरान उलट-पलट कर देखता नहीं। मतदानकेंद्र पर कोई ऐसा नहीं जो बार-बार दो हजार की नोट दिखाए लेकिन इस पर भी सपा को आपत्ति है। नोट ऐसी चीज है जो दिखाने की चीज नहीं है क्योंकि नोट का प्रदर्शन हमेशा त्रासद होता है और ऐसे में कोई नहीं चाहेगा कि वह अपने लिए ‘आ बैल मुझे मार ‘ वाले हालात पैदा करे। तो क्या कांग्रेस और सपा जो आजकल गठबंधन के हिस्से हैं। अपने चुनाव निशान बदलने के प्रति गंभीर हैं। चुनाव आयोग ने जब पिछले चुनाव में अंबेडकर पार्क के हाथी ढकवाए थे तो इस साल जब लखनऊ में चुनाव हो रहे थे तब चुनाव आयोग को अंबेडकर पार्क के हाथी क्यों नहीं नजर आए थे। यह किस तरह की चुनाव निष्पक्षता है? विकास की बात करने वाली सपा नव प्रकाशित नोटों को बर्बाद करने पर क्यों आमादा है? वह हजार और पांच सौ के पुराने रुपयों के नोटों के चलन पर तो सवाल उठाती है लेकिन नई नोटों के चलन पर सवाल उठाकर वह किस तरह के विकास को प्रोत्साहित करना चाहती है। क्या रुपयों के बिना भी विकास मुमकिन है? सवाल यह उठता है कि उत्तर प्रदेश में चार चरणों के चुनाव समाप्त हो गए और इतने समय तक चुनाव आयोग क्या करता रहा? उसे अभी तक यह पता क्यों नहीं चला कि किन-किन मोर्चों पर आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन हो रहा है।
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समाजवादी पार्टी ने ऐतराज जाहिर किया है कि समाजवादी एंबुलेंस सेवा से जुड़े वाहनों से समाजवादी शब्द क्यों हटाया जा रहा है। नोट से कमल और हाथी क्यों नहीं हटाए जा रहे। एंबुलेंस से समाजवादी शब्द तो उसे खुद हटा लेना चाहिए लेकिन उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार आंख से काजल चुराने में माहिर है। उसे अपने नहीं, दूसरों के दोष नजर आते हैं। बलरामपुर, गोंडा, फैजाबाद, अंबेडकर नगर, बहराइच, श्रावस्ती, बस्ती, सिद्धार्थ नगर, संत कबीर नगर, अमेठी और सुल्तानपुर जिले की जिन 52 सीटों पर वोट सोमवार को मतदान होने हैं, वर्ष 2012 में उनमें से 37 पर समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की थी। भाजपा और कांग्रेस 5-5 सीटों पर ही सिमट गई है। बसपा ने यहां की 3 और पीस पार्टी ने 2 सीटों पर कब्जा जमाया था लेकिन इसके बाद भी इन इलाकों में विकास की गति क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। बहराइच, गोंडा, श्रावस्ती, बलरामपुर और सिद्धार्थ नगर जिले नेपाल से सटे हुए हैं। यहां तो विकास की बात करना भी बेमानी है। जो अमेठी और सुल्तानपुर कभी कांग्रेस का गढ़ रहा, वहां अब सपा का कब्जा है लेकिन क्या उसके हालात सुधरे हैं। सपा सरकार एक्सप्रेस-वे की तो बात करती है लेकिन जिलों की सड़कें कैसी हैं, उन पर उसकी साइकिल चल भी सकती है या नहीं, इस पर आत्ममंथन कौन करेगा? भाजपा के एक बड़े नेता ने तो यहां तक कहा है कि मुख्यमंत्री की पत्नी बोलना सीख रही हैं। उन्हें बोलने दिया जाए और सपा से निष्कासित नेता अमर सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि हमारे यहां बहू-बेटियों के विरुद्ध बोलने की परंपरा नहीं है। महिलाओं को आगे कर किसी बात को विस्तार देने से तो अच्छा यह होता कि चुनाव आयोग पर अंगुली अखिलेश यादव और राहुल गांधी उठाते। बेहतर तो यह होता कि आलोचना करने से पहले वे अपने गिरेबान में भी झांकते। गठबंधन की मजबूरी हो सकती है लेकिन अपने बारे में सोचने और सच को सच की तरह न कह पाने की क्या मजबूरी है? गांव-देहात में एक शब्द है दोदना अर्थात मुकरना। सच को बेवजह इधर-उधर घुमाना। आंखें चुराना।
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क्या राहुल और अखिलेश यही नहीं कर रहे हैं। मुख्यमंत्री भाजपा नेताओं से यह कह रहे हैं कि वे तार छू कर इस बात का पता लगा सकते हैं कि बिजली है या नहीं लेकिन वह अखिलेश यादव जब अपने नए-नए बने मित्र राहुल गांधी के साथ लखनऊ की सड़कों पर रथयात्रा कर रहे थे तो राहुल को भय था कि कहीं करंट न लग जाए जबकि अखिलेश निश्चिंत थे। उस समय विपक्ष ने तंज कसा था कि अखिलेश को पता है कि बिजली है ही नहीं तो करंट कैसे लगेगा? अखिलेश यादव की मौजूदा नसीहत को इसी तंज के प्रतिवाद स्वरूप देखा जा सकता है। पांचवें चरण की बावन सीटें आज भी उपेक्षित है। शहर और गांव दोनों ही उपेक्षित हैं। चाहे भाजपा हो या बसपा सभी ने टिकट वितरण में सामाजिक अभियंत्रण का ध्यान रखा है। जिन 52 सीटों पर चुनाव होने हैं, वहां समस्याएं तो हैं लेकिन आजादी के बाद से आज तक इन समस्याओं का समाधान तलाशा नहीं जा सका। यह चुनाव प्रत्याशियों के हार-जीत की परीक्षा ही नहीं है। मतदाताओं की भी परीक्षा है। यह चुनाव यह तय करेगा कि मतदाता अपने हितों को लेकर कितने गंभीर है। उन्हें जाति-धर्म का डंका बजाना है या विकास का। वे मुगालते में जीना चाहते हैं या यथार्थ की पगडंडी पर सरपट दौड़ना चाहते हैं। मायावती को अगर इन बावन सीटों पर मुस्लिम और दलित मतदाताओं का भरोसा है तो भाजपा की नजर अति पिछड़ों, अति दलितों और सवर्णों पर है। सभी एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं। चुनाव आयोग तो बहाना है। मकसद मतदाताओं को लुभाना है। मतदाता भी इस सच को बेहतर जानते है और इस बार वे अपनी अब तक उपेक्षा का सटीक जवाब भी देंगे, इसमें तनिक भी ननु-नच अर्थात संदेह नहीं है।

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