चुनावी दंगल : वादे हैं वादों का क्या – रामबहादुर राय

चुनावी दंगल : वादे हैं वादों का क्या – रामबहादुर राय

भारतीय राजनीति में घोषणा पत्र का रिवाज उतना ही पुराना है जितना कि आम चुनाव। इसे 1937 से शुरू माना जा सकता है। हर चुनाव में दावेदार दल अपनी घोषणाएं करते हैं। जिसे घोषणा पत्र कहा जाता है। यह एक नैतिक दस्तावेज होता है। मतदाता को आश्वासन रूप होता है। दल उससे बंधा रहता है। उम्मीद की जाती है कि वह सत्ता में रहे या विपक्ष में अगले चुनाव तक घोषणा पत्र के दो पाटों के बीच दल की गतिविधियां चलती रहें। क्या ऐसा होता है? अनुभव सुखद नहीं है। यह है कि चुनाव से पहले घोषणा पत्र में बड़े वादे किए जाते हैं। उसके बाद उसे कोई देखता तक नहीं है। मीडिया भी दलों को उसके घोषणा पत्र की याद नहीं दिलाता। घोषणा पत्र का कोई महत्व नहीं है। इसे सिर्फ एक नेता अपनी सहजता में स्वीकार किया करते थे। वे चौधरी चरण सिंह थे। वे कहा करते थे कि घोषणा पत्र को कौन पढ़ता है। तब इसे एक मजाक माना जाता था। जैसे-जैसे समय बीता है, चौधरी चरण सिंह सच साबित हो रहे हैं। चुनावी घोषणा पत्र की रस्मअदायगी से ज्यादा की कोई अहमियत नहीं रह गई है। इसके बावजूद घोषणा पत्र का जारी होना रूका नहीं है। उत्तर प्रदेश के चुनाव में पहले सपा ने अपना घोषणा पत्र जारी किया। उस पर मीडिया ने टिप्पणी की कि दक्षिण भारत खासकर तमिलनाडु की सपा ने नकल की है। यानी खैरात बांटने की हर संभव घोषणा कर दी है। कल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया। मीडिया में उस अवसर की एक तस्वीर छपी है उसमें क्रम से मनोज सिन्हा, स्वामी प्रसाद मौर्य, ओम माथुर, कलराज मिश्र, केशव प्रसाद मौर्य और योगी आदित्यानाथ दिख रहे हैं। इनमें ही एक चेहरा मुख्यमंत्री होने वाले का भी है। सपा के घोषणा पत्र की तस्वीर में मुलायम सिंह नदारद थे। सपा और भाजपा के घोषणा पत्रों में समानता और फर्क क्या-क्या है? इसे ही केंद्रीय महत्व मिलना चाहिए। कहां भाजपा ने सपा की नकल की है और कहां उसे पीछे छोड़ दिया है? यह देखने वाली बात है। एक फर्क बहुत साफ है। भाजपा ने घोषणा पत्र का नया नामकरण किया है। उसे ‘लोक कल्याण संकल्प पत्र’ कहा है। इसका अर्थ सहज है। समझने लायक है। घोषणा पत्र का शाब्दिक और व्यावहारिक अर्थ वादे से है। इससे एक कदम बढ़कर भाजपा ने उसे अपना संकल्प बताया है। इसका संदेश मतदाता समझें या नहीं, पर यह एक प्रतिबद्धता का द्योतक है। प्रतिबद्धता की इस कड़ी में ऐसा हो नहीं सकता था कि भाजपा राम मंदिर के प्रश्न को छोड़ दे। उसने सामयिक और सेकुलर नजरिया अपनाया है। यह एक बड़ा फर्क है। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा इसके अलावा दूसरा मार्ग अपना भी नहीं सकती थी। भाजपा ने संवैधानिक प्रक्रिया अपनाने का वचन दिया है।
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वह प्रक्रिया चुपचाप चल रही है। विवाद अदालत में है। सुप्रीम कोर्ट को फैसला करना है। 2010 में सुप्रीम कोर्ट में अपील हुई थी। हाईकोर्ट के फैसले के बाद। बीते नवंबर में सुप्रीम कोर्ट इस बात पर सहमत हो गया कि वह डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की दरखास्त को भी सुनेगा। वह यह है कि मामले की सुनवाई रोजमर्रा के ढंग से हो। डॉ स्वामी ने उसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा कि वे भारत सरकार के वकीलों को निर्देश दें कि वे उनके मामले का समर्थन करें। डॉ. स्वामी चाहते हैं कि जैसे राम सेतु मामले की सुनवाई हुई, वैसे ही अयोध्या मामले की हो। भाजपा ने 2014 के अपने घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि राम मंदिर बनाने का वह प्रयास करेगी। उत्तर प्रदेश का घोषणा पत्र भी उसी कड़ी में है। यह सिलसिला 1991 से जारी है। इस तरह भाजपा के वचन में निरंतरता है। इस बार भाजपा ने 6 बड़े वादे किए हैं। वे उत्तर प्रदेश के गरीब तबके के लिए हैं। दो विषय जो उठाए गए हैं वे बिल्कुल अलग हैं। लेकिन विवादास्पद हैं। उनका संबंध सामाजिक सुधार से है। तीन तलाक की प्रथा के बारे में वादा है कि उस पर मुस्लिम महिलाओं का मत जानने के लिए जनमत संग्रह कराया जाएगा। भाजपा के घोषणा पत्र में क्या है और क्या नहीं है, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, विरोधी दलों की प्रतिक्रियाएं। समर्थकों ने तो संकल्प पत्र को सपा के नहले पर भाजपा का दहला माना है। लेकिन बसपा, सपा और कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने उसे पूरी तरह खारिज किया है। इसे दो तरह से देख सकते हैं। एक कि भाजपा को ही हर दल अपना प्रतिद्वंदी माना रहा है। दूसरा कि उसके घोषणा पत्र से विरोधी दलों में बेचैनी भी है।

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