चुनावी दंगल : टोटकेबाज युवा मुख्यमंत्री – रामबहादुर राय

चुनावी दंगल : टोटकेबाज युवा मुख्यमंत्री – रामबहादुर राय

चुनाव क्या एक टोटकेबाजी है या गंभीर राजनीतिक विमर्श का अवसर? यह सवाल इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने फिर एक बार टोटकेबाजी का सहारा लिया है। बीते मंगलवार यानी 24 जनवरी को उन्होंने सुल्तानपुर में अपनी पहली चुनावी सभा की। यह निर्णय तर्क की किसी कसौटी पर खरा नहीं उतरता। सिवाय टोटकेबाजी के। इसका पहला कारण बहुत साफ है। सुल्तानपुर सदर चुनाव के पांचवें चरण में है। जहां से अखिलेश यादव ने अभियान प्रारंभ किया। तर्क यह कहता है कि मुख्यमंत्री को अपनी पहली सभा उस क्षेत्र में करनी चाहिए जहां पहले चरण का मतदान होना है। तब उन्हें गाजियाबाद या नोएडा को चुनना पड़ता। ये दोनों अखिलेश यादव के लिए काल समान हैं। जो काल से लड़ सके उसे ही उत्तर प्रदेश की कमान संभालने का अधिकार होना चाहिए। वह साहस अखिलेश यादव में नहीं है। वे अंधविश्वास में जीते हैं। इसके प्रमाण की जरूरत नहीं है। सिर्फ निशान लगाकर बता देना ही काफी है। मुख्यमंत्री के अपने कार्यकाल में वे नोएडा में कदम रखने से बचते रहे। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब मेरठ हाईवे को एक्सप्रेस-वे बनाने का शिलान्यास किया तब सब आए। सिर्फ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही गायब थे। जबकि पश्चिम उत्तर प्रदेश और देश की राजधानी के करोड़ों निवासियों के लिए वह अवसर असाधारण था। उम्मीद का अवसर था। रोज-रोज के जाम और उसकी परेशानी से मुक्ति दिलाने की उम्मीदों का वह अवसर था।
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लेकिन किसी टोटके के डर से अखिलेश यादव नहीं आए। क्योंकि उनके दिमाग के किसी कोने में यह बात बैठ गई है कि जो मुख्यमंत्री नोएडा जाएगा वह कुर्सी गंवा बैठेगा। जाहिर है, कुर्सी का मोह बड़ा है, जनहित के मुकाबले। यही बात सुल्तानपुर सदर से चुनाव अभियान में काम कर रही है। सुल्तानुपर सदर का नाम बदल गया है। पहले उस सीट को जयसिंहपुर कहते थे। 2012 से वह सुल्तानपुर सदर है। उसका अपना इतिहास है। मानते हैं कि इस सीट से जो जीतता है वही सत्ता में विराजमान हो पाता है। इसका सिलसिला 1977 से ही चल रहा है। वहां पहली बार तब जनता पार्टी जीती थी। उसकी सरकार बनी थी। 1980 में कांग्रेस जीती और सत्ता में आई। उलट-पलट कर वह सीट जिसे मिली वह सरकार बना सका। 1991 में भाजपा वहां जीती। सभी जानते हैं कि अपने बलबूते पर भाजपा ने तब और पहली बार उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी। ज्यादा संभावना है कि इस बार यह टोटका टूटे। अखिलेश यादव तब कहीं जा कर अंधविश्वास से मुक्ति पा सकेंगे। सुल्तानपुर सदर सपा की सीट है। पर पुश्तैनी नहीं है। अपनी सीट बचाने की लड़ाई ही तो अखिलेश यादव लड़ रहे हैं।
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 अगर उन्हें गोमती नदी याद होती तो सुल्तानपुर नहीं जाते। लखनऊ कैंट से शुरुआत करते। जहां से अपर्णा यादव उम्मीदवार हैं। जिस तरह लखनऊ गोमती के किनारे है उसी तरह सुल्तानपुर भी है। लेकिन गोमती नदी ने उन्हें नहीं बुलाया। बुलाया अंधविश्वास ने। अगर वे लखनऊ से अभियान शुरू करते तब उनका टोटका ढंका और छिपा भी रह जाता। सवाल यह है कि अखिलेश यादव को टोटके में विश्वास कब जमा? बात ज्यादा पुरानी नहीं है। अपर्णा का विवाह हो रहा था। वह बिष्ट से यादव बनने जा रही थी। अतिथियों के स्वागत में अखिलेश यादव खड़े थे। एक व्यक्ति ने उन्हें देखा और बोल पड़ा, आप अगले मुख्यमंत्री हो। अखिलेश यादव आश्चर्यचकित थे। बोले कि नेता जी के रहते मेरे मुख्यमंत्री बनने का सवाल कहां पैदा होता है! उस व्यक्ति ने कहा कि मेरी बात सच होगी। वक्त आने दो। वह वक्त आया। तब से ही अखिलेश यादव को टोटके में जो भरोसा हुआ वह बढ़ता ही जा रहा है। उनके टोटके के ऐसे उदाहरण अनेक हैं। जैसे, डीपी यादव का टिकट काटना, शिवपाल से लड़ना, मुलायम सिंह यादव को अपमानित करना और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे का बिना बने लोकार्पण करवाने की घटनाएं तो आम हैं। कुछ खास भी हैं जो टोटके की अनंत कथा हैं।

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