चुनावी दंगल : काम और नाम का हौसला, बाकी सब ढकोसला -सियाराम पांडेय ‘शांत’

चुनावी दंगल : काम और नाम का हौसला, बाकी सब ढकोसला -सियाराम पांडेय ‘शांत’

उत्तर प्रदेश की चुनावी बैतरणी पार करने के लिए हर दल बेताब है। सभी अपने-अपने तरीके अपनी विजय के दावे कर रहे हैं। सब आत्मविश्वास से भरे हुए हैं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन के बाद जहां बसपा प्रमुख मायावती की परेशानियों पर बल पड़े हुए हैं। उनकी रातों की नींद उड़ी हुई है, वहीं भाजपा इस गठबंधन से अपना कोई नुकसान नहीं देख रही है। यूपी भाजपा के प्रांतीय अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने तो यहां तक कह दिया है कि अगर बहुजन समाज पार्टी भी सपा और कांग्रेस के गठबंधन में शामिल हो जाए तो भी वह उत्तर प्रदेश में भाजपा के विजयरथ को रोक नहीं पाएगी। भाजपा के इस आत्मविश्वास का आधार क्या है। जातीय आंकड़ों को नजरंदाज करने के पीछे कोई तो कारण होगा? ‘अपने पर भरोसा रख मेरे भाई समन्दर भी तर जाएगा। किसी और के भरोसे तो छोटी सी नदिया में डूब जाएगा’ का प्रयोग निश्चित रूप से भाजपा को एकला चलने की प्रेरणा देता है लेकिन अकेले आत्मविश्वास के सहारे चुनावी बैतरणी पार कर पाना मुमकिन नहीं है। मार्क ट्विन ने कहा था कि सफलता के लिए दो तत्व जरूरी है। पहला आत्मविश्वास और दूसरी अनभिज्ञता। भाजपा या तो मौजूदा हालात से अनजान है या अति आत्मविश्वास से भरी। सच जो भी हो लेकिन भाजपा को लग रहा है कि प्रधानमंत्री के नाम और काम का जादू विधानसभा में भी उसे मजबूती देगा लेकिन वह यह क्यों भूल रही है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में जाति और धर्म का कारक भी मजबूत भूमिका अदा करता है।
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वह जाति और धर्म का आधार। नहीं चाहिए ऐसी सरकार का नारा लगाकर ही प्रदेश के मतदाताओं की मानसिकता को नहीं बदल सकती। आत्म विश्वास से भरे तो अखिलेश यादव भी हैं। काम बोलता है , उनका चुनावी सूत्र वाक्य है। सपा कार्यकर्ता भी मौजूदा चुनाव नेताजी के नाम पर अखिलेश के काम पर लड़ने का दावा कर रहे हैं। सपा नेता खुले आम इस बात की अपील कर रहे हैं कि कुछ महीने का काम है। बाकी बस आराम है। क्या ये बातें इस प्रदेश की जनता समझती नहीं है। अब तो कांग्रेस और सपा के संयुक्त पोस्टर भी तैयार हो गए हैं। उस पोस्टर पर अगर अखिलेश यादव हैं तो राहुल गांधी भी हैं। डिंपल यादव की तस्वीर है तो प्रियंका गांधी की भी फोटो है। कार्यकर्ता इसे भाजपा के खिलाफ आवाहन करार दे रहे हैं लेकिन गठबंधन तो वही बनाता है जो कमजोर होता है। ‘बुलंद हो हौसला तो मुट्ठी में हर मुकाम है, मुश्किलें और मुसीबतें तो जिंदगी में आम है। जिंदा हो तो ताकत रखो बाजुओं में लहरों के खिलाफ तैरने की, क्योंकि लहरों के साथ बहना तो लाशों का काम है।’ यह कविता भाजपा और बसपा पर तो एक बारगी सही उतरती भी है लेकिन कांग्रेस और सपा कैसे कह सकती हैं कि उनका आत्मविश्वास डिगा नहीं है। भले ही इन दोनों ही दलों के कार्यकर्ता उम्मीदों के आसमान में उड़ रहे हैं।
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उन्हें लग रहा है कि अब उनका विजयरथ रुकने वाला नहीं है लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह मजबूरी का गठबंधन है और मजबूरी के परिणाम हमेशा सकारात्मक ही नहीं होते। इस गठबंधन के फायदे भले ही दोनों दल गिना रहे हों लेकिन उनका उद्देश्य दूरगामी है। कांग्रेस ने अगर अखिलेश को दोबारा मुख्यमंत्री बनाने का वादा कर रखा है तो अखिलेश ने राहुल को वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत दिलाकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का लेकिन कांग्रेस और सपा की जोड़ी कितनी टिकाऊ होगी, यह देखने वाली बात होगी। अखिलेश यादव की दिली ख्वाहिश अपने पिता को प्रधानमंत्री पद पर देखने की है और अब तो नरेश अग्रवाल ने भी यह बात कही है कि 2019 में अखिलेश प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार होंगे। ऐसे में अखिलेश क्या अपनी इच्छाओं का गला समर्थन का मूल्य चुकाने और राहुल गांधी से मित्रता निभाने की शर्त पर घोंट सकेंगे। कांग्रेस भी जानती है कि अपने बल पर वह सरकार बनाने और 27 साल पुराना अपना राजनीतिक वनवास खत्म करने से रही लेकिन गठबंधन की बैसाखी थामकर वह सरकार में जरूर शामिल हो जाएगी। किंगमेकर जरूर कहलाएगी। साथ की कीमत तो दरअसल सपा को चुकानी है। लेकिन गठबंधन दोनों की मजबूरी थी। अब देखने वाली बात यह है कि यह बेमेल गठबंधन जनता-जनार्दन को कितना रास आ पाएगा?

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