चीनी सामान सस्ते क्यों हैं?

चीनी सामान सस्ते क्यों हैं?

सस्ते श्रम, सरकारी सब्सिडी और कई अनैतिक तरीकों की वजहों से चीन का माल सस्ता होने के कारण दुनिया भर के बाजारों में छाने लगा। यह इस बात से पता चलता है कि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 2015-16 में 52.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया। दुनिया भर में चीन का व्यापार 2016 में 486 अरब डॉलर तक पहुंच चुका था। चीन भारत से ही नहीं, अन्य देशों से भी अपेक्षाकृत सस्ते उत्पादों को बनाने व बेचने में ज्यादा समर्थ है पर क्या कारण है कि चीन ज्यादा सस्ते उत्पाद बना भी सकता है और बेच भी सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद अपनी आर्थिक नीति के जिन प्रमुख बिंदुओं की घोषणा की, उसमें मेक-इन-इंडिया प्रमुख था। गौरतलब है कि 2007-08 में जहां हमारे औद्योगिक उत्पादन वृद्धि की दर जो 15 प्रतिशत से ज्यादा थी, 2011-12 के बाद के वर्षों में शून्य और कभी-कभी ऋणात्मक हो चुकी थी। इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर हार्डवेयर ही नहीं, छोटी-बड़ी उपभोक्ता वस्तुओं, फर्नीचर आदि सब कुछ चीन या अन्य देशों से आने लगा था। देश में कोई नया कारखाना नहीं लग रहा था और पहले चल रहे कारखाने भी चीन में शिफ्ट होने लगे।
1990 से 2010 के बीच चीन की वार्षिक औसत उत्पाद विकास दर 2.8 प्रतिशत थी, अमेरिका और जापान (क्रमश: 0.5 प्रतिशत और 0.2 प्रतिशत) से कहीं ज्यादा। चीन में बेहतरीन सप्लाई चेन से कच्चे माल से तैयार सामान तक सब कुछ उपभोक्ताओं तक पहुंचता है। चीन की खासियत यह है कि उसके पास इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चा सामान बहुतायत में है।
चीनी उत्पाद सस्ते इसलिए हैं क्योंकि उसके उत्पादन के लिए कोई शोध नहीं करना पड़ता जिससे शोध का खर्च बच जाता है। इसकी दो वजहें हैं। पहला, ऑर्डर ज्यादातर विदेशों से ही आता है, विकसित विचारों पर सामान बनाना होता है। दूसरा, आईपीआर यानी इंटैलैक्चुअल प्रॉपर्टी इंफोर्समैंट। इंटैलैक्चुअल प्रॉपर्टी के अंतर्गत ऐसे व्यवसाय आते हैं जो कलात्मक हों, जैसे संगीत, साहित्य व शोध आदि। यहां इस तरह के व्यवसाय कायदे-कानून की हद में काम आते हैं।
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भारत में नए स्टार्ट अप खुलने शुरू हुए हैं और सरकार का रवैय्या भी होल्डग हैंड वाला है। हमारे यहां औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने और उसे अपने ही देश में खपाने की बहुत संभावनाएं हैं। 1995 से अस्तित्व में आए डब्ल्यूटीओ समझौतों के अनुसार सभी सदस्य देशों द्वारा आयात शुल्क को शून्य या उसके आसपास रखने की प्रतिबद्धता निश्चित की गई थी। यही नहीं, आयातों को रोकने से गैर टैरिफ तरीकों को भी समाप्त करने की प्रतिबद्धता ली गई।
घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने का निर्णय लेने से पहले हमें डब्ल्यूटीओ से मिलने वाले लाभ-हानि का पुनर्मूल्यांकन करना जरूरी है।
डब्ल्यूटीओ की वर्तमान में पहली व्यवस्था मुक्त व्यापार की है। इस व्यवस्था में हमें यह फायदा हासिल है कि हमारे विनिर्माताओं को दूसरे देशों के बाजारों में आसानी से प्रवेश मिल जाता है। इसके जरिए भारतीय कपड़े, गलीचे एवं दवाएं भारी पैमाने पर निर्यात किये जा रहे हैं। जहां तक मुक्त व्यापार से नुकसान का सवाल है तो इसकी वजह से हमारे बाजार चीनी सामान से पट गए हैं। इससे हमारे उद्योगों के समक्ष संकट पैदा हो रहा है।
यह पूरी तरह सच नहीं है कि चीन दुनिया का सबसे कम पारिश्रमिक देने वाला देश है। श्रीलंका, वियतनाम जैसे और देश भी हैं जहां पारिश्रमिक चीन से 30 प्रतिशत कम दिया जाता है पर जो फर्क है वह है श्रमिकों की कार्यकुशलता। पिछले चार सालों में चीनी पारिश्रमिक हर साल 15 प्रतिशत बढ़ रहा है।
कुछ उपयोगी ब्यूटी टिप्स…!

न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार, आईफोन बनाने वाली एक चीनी फैक्टरी ने आठ हजार कर्मचारियों को आधी रात को ही काम करने के लिए उठा दिया था। किसी अन्य देश में तो यह सोचा भी नहीं जा सकता। उत्पादन क्षमता में पारिश्रमिक की बढ़ोतरी भी बराबर की है। चीन का उत्पाद विकास विश्व के ज्यादातर देशों से काफी आगे है।
भारत में अभी तक सरकारी खरीद में भी आयातित विदेशी वस्तुओं की भरमार रहती है। उसके कई कारण हैं। सरकार में प्रतिस्पर्धी निविदाओं के आधार पर खरीद होती है। ऐसे में सस्ते चीनी उत्पाद उपलब्ध होते हैं, वहां उन्हीं वस्तुओं की खरीद हो जाती है। चीन की तरक्की को सोशल मीडिया पर कोसने और देशभक्ति की छद्म भावना से भारत में विकास नहीं होगा। हमें तकनीकी व आर्थिक नीतियों में फेरबदल कर उत्पादन पर जोर देने की जरूरत है।
– नरेंद्र देवांगन

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