चिंताजनक: मधुमक्खी और तितलियों की कमी खतरे का संकेत

चिंताजनक: मधुमक्खी और तितलियों की कमी खतरे का संकेत

 मधुमक्खी एवं तितली पृथ्वी पर पाए जाने वाले दो सुंदर कीट हैं। मधुमक्खी एवं तितली कीट परागण की क्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मधुमक्खियों के सिर पर 5 आंखें होती हैं लेकिन इन सबके बावजूद यह सिर्फ एक मीटर की दूरी तक ही देख सकती हैं। यह कीट फूलों से रस आदि चूसते समय वहां से परागण इसके पैरों पर चिपक जाते हैं तथा जब यह दूसरे पौधों के ऊपर जा कर बैठती हैं तथा जब यह छूट जाते हैं तो इस प्रकार उस पौधे पर फूल-फल आदि आ जाते हैं। इस प्रकार यह छोटा सा कीट हमारे लिए अनेक प्रकार के फलों, सब्जियों तथा अनाज के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है लेकिन दुर्भाग्य से आधुनिक कृषि में बढ़ते कीटनाशकों के प्रयोग से इनकी संया में चिंताजनक गिरावट आई है।
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तितली पृथ्वी पर पाया जाने वाला सुंदर कीट अद्भुत विशेषताओं वाला है। दुनियाभर में तितलियों की लगभग 20 हजार प्रजातियां पाई जाती हैं। यह सभी देशों में मिलती हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि इनकी लगभग 15 हजार प्रजातियां खतरे से घिरी हुई हैं। इनमें से कुछ तो विलुप्त ही हो गई हैं । तितली लेपिडोप्टेरा की सदस्य है तथा इसके जीवन चक्र की चार अवस्थाएं होती हैं जो इस प्रकार है- अंडा, लारवा, प्यूपा तथा प्रौढ़। तितली के अंडे छोटे, गोल एवं बेलनकार होते हैं। लारवा बढ़वार करने के लिए मोल्टिंग करते हैं। तितली का जीवन काल 2 से 9 माह का होता है। जीवन चक्र की इन अवस्थाओं को मेटामोरफोसिस कहते हैं। फूलों आदि से रस चूसने के लिए इनके मुंह पर आगे की ओर एक सूंड होती हैं जिसे परोबोसिस कहते हैं।
मधुमक्खी के जीवन चक्र की चार अवस्थाएं होती हैं- अंडा, लारवा, प्यूपा, प्रौढ़। क्वीन मक्खी जो मादा होती है, अंडे को उत्पन्न करती है। ड्रोन नई क्वीन मधुमक्खी के साथ मेटिंग (संभोग) करते हैं। वर्कर मक्खी कॉलोनी के लिए भोजन एकत्रित करती है। ऐसा कहा जाता है कि एक क्वीन मक्खी एक दिन में लगभग 2000 अंडे देती है। अंडे से लारवा निकलने में चार दिन का समय लगता है। लगभग 9 दिन के बाद लारवा खाना बंद कर देता है और उसके बाद प्यूपा बनता है। जीवन चक्र की प्यूपा अवस्था में ही मधुमक्खियों में टांग, आंख तथा पंख बनने प्रारंभ होते हैं। इसके बाद प्रौढ़ बनने का समय 1०-23 दिन के बीच का होता है। प्रौढ़ अवस्था मधुमक्खियों में मैटामोरफसिस की अंतिम अवस्था है। मधुमक्खियों तथा तितलियों से प्रति एकड़ लगभग 30-50 प्रतिशत तक उपज बढ़ोत्तरी होती है।
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मधुमक्खियों के विलुप्त होने के खतरे में सबसे अधिक योगदान फसलों पर कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग है। जंगलों का अंधाधुंध कटाव, मधुमक्खियों एवं तितलियों के शिकार का बढऩा, मनुष्य तथा सरकार की उदासीनता के कारण ये जीव नष्ट हो रहे हैं। मोबाइल फोन से निकलने वाली तरंगों के कारण ये अपने मार्ग से भटक जाती हैं, फिर मर जाती हैं। सीसीडी डिसऑर्डर के कारण आज अमेरिका तथा चीन से मधुमक्खियां विलोपन के कगार पर पहुंच गई हैं, जिससे वहां के कृषि उत्पादन में काफी कमी दर्ज की जा चुकी है। सीसीडी डिसऑर्डर के कारण मधुमक्खियां अपने दलों को छोड़ देती हैं।
मधुमक्खियों तथा तितलियों को बचाने के लिए कीटनाशकों का प्रयोग कम किया जाए। जंगलों को बचाया जाए। इनके गैर कानूनी शिकार को पूरी तरह बंद किया जाए। मनुष्य तथा सरकार के द्वारा इनको बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाए। मोबाइल फोन के टावर्स आदि को जंगलों तथा वनों आदि से दूर लगाया जाए। विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों में इनके अध्ययन तथा शोध में प्रयोग कम किया जाए। सभी फसलों में कुल परागण का लगभग 87 प्रतिशत कीटों द्वारा होता है जिनमें मुख्यत: मधुमक्खियां तथा तितलियां ही हैं। प्रतिवर्ष भारत में तितलियों के द्वारा किए गए परागण से हमें लगभग 200 करोड़ डॉलर प्राप्त होते हैं।
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हर साल लगभग 50 हजार तितलियों का विदेशों को निर्यात किया जाता है। बदकिस्मती से इनकी सुंदरता ही आज इनके विलुप्त होने का कारण है लेकिन यह समझना जरूरी है कि इनकी सुंदरता के साथ-साथ यह परागण की क्रिया में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हम बाघ, एशियन शेर, गेंडा जैसे बड़े जीवों को विलुप्त होने से बचाने का प्रचार- प्रसार तो करते हैं लेकिन जिस छोटे जीव पर पृथ्वी पर रहने वाले जीवों का अस्तित्व निर्भर है, उसको हम नहीं बचा सकते। इनके कीटों में मुख्यत: मधुमक्खी तथा तितली है। अगर दुर्भाग्यवश पृथ्वी से ये दो कीट पूरी तरह खत्म हो गए तो सालभर में शेर खत्म हो जाएगा, 3 साल में मनुष्य खत्म हो जाएंगे तथा धीरे-धीरे पृथ्वी के अन्य जीव भी खत्म हो जाएंगे। इसलिए फैसला हमारे हाथ में है। हम आज जो भी फैसला करेंगे, उसी पर ही पृथ्वी पर रहने वाले जीवों का अस्तित्व निर्भर है।
– नरेंद्र देवांगन

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