चमत्कारी परिवर्तन लाएगा तीसरे चरण का मतदान : सियाराम पांडेय ‘शांत’

चमत्कारी परिवर्तन लाएगा तीसरे चरण का मतदान : सियाराम पांडेय ‘शांत’

तीसरा चरण बहुत मायने रखता है। वह चाहे जीवन का हो या चुनाव का। भगवान वामन ने अपने तीन चरणों में धरती, आकाश और पाताल नाप लिया था। तीसरे चरण के बाद महाराज बलि के सामने यह संकट हो गया था कि वे भगवान वामन का आधा पैर कहां रखवाएं। कमोवेश यही स्थिति राजनीतिक दलों की भी है। यूं तो उनके लिए हर चरण के मतदान अहम हैं, लेकिन पूरे प्रदेश की नजर तीसरे चरण के मतदान पर है क्योंकि इसी चुनाव में यह तय होगा कि मुलायम का आशीर्वाद अखिलेश के साथ है भी या नहीं। रविवार उत्तर प्रदेश के लिए खास है क्योंकि इस दिन कई दिग्गजों के भाग्य का फैसला होना है। सपा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की असल परीक्षा आज ही है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के लिए भी यह इम्तिहान का दिन है। तीसरे चरण में जिन 12 जिलों में मतदान होना है, वे 12 जिले राजनीतिक दलों के चेहरे पर 12 बजा रहे हैं। 69 सीटों को आंकिक नजरिए से देखें तो 69 के दोनों ही अंक उल्टे हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि भले ही इन 12 में से सात जिले सपा के मजबूत गढ़ रहे हों, लेकिन उसके गढ़ की मजबूती इस बार भी बदस्तूर जारी रहेगी, यह नहीं कहा जा सकता। यहां समीकरण उलट भी सकते हैं।
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इन सीटों पर जनता जनार्दन का निर्णय बेहद चमत्कारी हो सकता है। फर्रूखाबाद, हरदोई, कन्नौज, मैनपुरी, इटावा, औरैया, कानपुर देहात, कानपुर, उन्नाव, लखनऊ, बाराबंकी और सीतापुर जिलों की तासीर भी कुछ अलग किस्म की है। इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, बाराबंकी तथा फर्रूखाबाद तो सपा के बेहद मजबूत गढ़ है। इन जिलों में मुलायम सिंह यादव का वर्चस्व रहा है, लेकिन इस बार मुलायम सिंह यादव के चुनाव प्रचार न करने से मतदाताओं के बीच असमंजस के हालात हैं। वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अखिलेश यादव के प्रति उनकी नाराजगी खत्म हुई भी है या नहीं और यदि नाराजगी खत्म हो गई है तो वे यह क्यों कह रहे हैं कि अगर वे उन्हें मुख्यमंत्री न बनाते तो अखिलेश कभी मुख्यमंत्री नहीं बन पाते। वैसे भी मुलायम सिंह यादव ने भाई शिवपाल यादव और छोटी बहू अपर्णा के चुनाव क्षेत्र में ही प्रचार किया है। भले ही वे सपा के प्रति जनता के विश्वास और प्रेम की बात कर रहे हों लेकिन सच तो यह है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश को मथने की जिम्मेदारी अपने बड़े बेटे और बड़ी बहू पर डाल रखी है। जब कन्नौज की एक चुनावी सभा में डिंपल यादव यह कहती हैं कि साजिश तो ऐसी रची गई थी कि भइया के हाथ में केवल चाभी और भाभी ही रह जाती तो अभी भी मतभेद की बरबरारी का संशय तो होता ही है। सवाल उठता है कि क्या इतने मनोमालिन्य के बीच सपा अपना बेहतर प्रदर्शन कर पाएगी। हाल ही में इस तरह की खबरें आ रही थीं कि
सपा के गढ़ मैनपुरी में मतदान केन्द्र पर फायरिंग, मचा हड़कम्प
शिवपाल समर्थक मायावती की पार्टी बसपा को जिताने के लिए प्रयासरत हैं। इस सूचना के बाद अखिलेश समर्थकों के कान खड़े हो गए हैं। यूं तो इन 12 जिलों में 826 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन यहां के दो करोड़ 41 लाख मतदाताओं के ध्यानाकर्षण का केंद्र भाजपा, बसपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन ही है। इटावा सीट पर सर्वाधिक 21 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि बाराबंकी की हैदरगढ़ सीट पर सबसे कम तीन उम्मीदवार मैदान में हैं। इस चरण में जिन दिग्गजों के भाग्य ईवीएम में कैद होने हैं, उनमें शिवपाल सिंह यादव, मुलायम की छोटी बहू अपर्णा यादव कांग्रेस से भाजपा में आई रीता बहुगुणा जोशी, अखिलेश के चचेरे भाई अनुराग यादव, प्रदेश के कैबिनेट मंत्री अरविंद सिंह गोप, राज्यमंत्री फरीद महफूज किदवई, राज्यमंत्री राजीव कुमार सिंह, राज्यमंत्री नितिन अग्रवाल, बसपा छोड़कर भाजपा में गए बृजेश पाठक और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य पीएल पुनिया के बेटे तनुज पुनिया प्रमुख हैं। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां सपा की लाटरी लगी थी। 69 में से 55 सीटें जीतकर उसने यहां की बादशाहत हासिल कर ली थी। बसपा को छह और भाजपा को पांच सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था जबकि कांग्रेस ने भी दो सीटें जीतकर किसी तरह अपनी इज्जत बचाई थी, लेकिन इस बार हालात जुदा हैं। सपा का मुकाबला भाजपा और बसपा से तो है ही, उसके अपने भी उसके लिए मुसीबत का सबब बने हुए हैं। बसपा को भी इस बात का भरोसा है कि शिवपाल खेमे ने अगर अखिलेश को हराने का अपना मानस नहीं बदला तो उसे प्रदेश के राजपथ पर अपना हाथी मदमस्त चाल से चलाने में कोई खास दिक्कत नहीं होगी। हालांकि अखिलेश यादव को अपने काम पर भरोसा है लेकिन भाजपा और बसपा ने विधि व्यवस्था की विफलता का मुद्दा जिस प्रमुखता से उठाया है, उसका खामियाजा सपा को भुगतना पड़ सकता है। तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले इन जिलों के हजारों छात्र-छात्राओं को चार साल में एक बार भी छात्रवृत्ति नहीं मिल पाई है।  वजह चाहे जो भी रही हो। लैपटॉप वितरण में गड़बड़ी से भी युवा वर्ग अखिलेश यादव से नाराज है। हाईस्कूल पास होने वाले जिन छात्र-छात्राओं को आज तक टैबलेट नहीं मिल पाया, वे इस बार बड़ी तादाद में वोट डालेंगे। उनसे यह तो उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अखिलेश यादव की चुनावी वादाखिलाफी को सहज ही अपने हाथ से जाने देंगे। भले ही इटावा जिले में मुलायम सिंह यादव परिवार की गहन पकड़ हो लेकिन चुनाव में जीत-हार के लिए यह बहुत अहम कारक नहीं है। 2012 के चुनाव में इस जिले की चार में से एक सीट पर बसपा प्रत्याशी का जीत जाना इस बात का संकेत तो है ही कि मतदाताओं की मनःस्थिति पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अखिलेश यादव का अपने चाचा शिवपाल यादव के बीच चल रहा विवाद भले ही कथित रूप से थम गया हो लेकिन इस बिना पर विपक्ष यहां अपनी जीत का गुणा-गणित तो लगा ही सकता है। मैनी जिले की सभी चार सीटों पर 2012 में सपा की साइकिल जमकर चली थी, लेकिन इस बार नरेंद्र मोदी ने केवल सैफई और मुलायम कुनबे के विकास की बात कहकर यहां के यादवों और अन्य गांवों में प्रतिस्पर्धा की चिनगारी सुलगा दी है और इसका असर इस बार के चुनाव में देखने को मिल सकता है। मुलायम सिंह यादव द्वारा मैनपुरी सीट जीतकर छोड़ने और उसे अपने पोते तेज प्रताप यादव को सौंपने से भी यहां के लोग खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। कन्नौज अखिलेश यादव के लिए लकी चार्म माना जाता है। यहीं से सांसदी जीतकर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया था। अब वहां से उनकी पत्नी डिंपल यादव सांसद हैं। पिछले चुनाव में यहां की तीनों विधान सभा सीटों पर सपा का सिक्का जमा था लेकिन इस बार प्रधानमंत्री की रैली ने कुछ तो मानस बदला ही है। लोगों के दिमाग में यह बात तो गई ही है कि जो अखिलेश अपने पिता के नहीं हुए, वे हमारे कैसे हो सकते हैं। 2002 में भले ही मायावती सत्ता से दूर रही हों लेकिन बसपा ने औरैया जिले की सभी तीन सीटों पर जीत दर्ज की थी। 2007 में बसपा की सरकार बनी जरूर थी लेकिन सपा ने यहां से एक सीट जीत ली थी। 2012 में अलबत्ते यहां सपा का जादू खूब चला।
हरदोई: सपा और नरेश अग्रवाल के सामने अपना गढ़ बचाने की चुनौती..!
अब देखने वाली बात यह है कि इस बार भी सपा क्या वैसा ही प्रदर्शन कर पाएगी। बाराबंकी जिले में मुलायम और बेनी की जोड़ी मशहूर रही है। इस बार बेनी प्रसाद वर्मा सपा के साथ हैं तो लेकिन मन से नहीं क्योंकि अखिलेश यादव ने उनके बेटे का पत्ता साफ कर दिया और उनकी जगह अरविंद सिंह गोप को टिकट दे दिया। बेनी ने अपने बेटे को भाजपा से टिकट दिलाने की भी कोशिश की लेकिन उनकी दाल नहीं गली। ऐसे में वे कुर्मियों के बीच सपा के लिए कितने दिल से काम कर पाएंगे और उनकी नाराजगी क्या रंग लाएगी, यह देखने वाली बात होगी। कुर्मी बहुल इस इलाके की हैदरगढ़ सीट से चुनाव जीतकर राजनाथ सिंह 2002 में राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। उस साल भाजपा ने यहां की आठ में से चार सीटें जीती थीं, तीन सपा और एक बसपा के खाते में गई थी। 2007 में भी सपा को तीन सीटों से संतोष करना पड़ा था। वहीं पांच सीटों पर बसपा जीती। 2012 में सपा पांच सीटें जीत गई। बीजेपी को एक सीट मिली और बसपा टापती रह गई। लखनऊ में भाजपा अभी तक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर लड़ती रही है, लेकिन इस बार प्रचार से अटल जी का नाम तक गायब है। भाजपा को इस पर अपने काम पर भरोसा है। 2007 में यहां की आठ में से 4 भाजपा तो सपा ने एक सीट जीती थी। 2012 में भाजपा केवल एक सीट ही जीत पाई थी। सपा का सात पर परचम लहराया था। एक सीट कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी ने जीती थी। इस बार वे भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं। उनका मुकाबला मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव के साथ है। लखनऊ की सीटों पर भाजपा के प्रदर्शन को राजनाथ सिंह की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा है। वे यहां के सांसद हैं। इसलिए भी यह चुनाव उनके प्रभाव क्षेत्र के लिए आकलनकारी होगा। हरदोई सपा नेता नरेश अग्रवाल का जनपद है। 2012 में यहां की आठ में से छह सीटें सपा के खाते में गई थी। एक सीट पर नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन जीते थे। 2007 के चुनाव में केवल नरेश अग्रवाल ही सपा के लिए एक सीट जीत पाए थे और शेष पर बसपा का नीला ध्वज लहराया था। 2017 की जंग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद यहां अपने को उत्तर प्रदेश का गोद लिया बेटा कहा।
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बसपा और अन्य दलों ने भी यहां खूब रैलियां की हैं और इस चुनाव पर इन रैलियों का असर देखा भी जा रहा है। फर्रुखाबाद, कानपुर देहात, कानपुर, उन्नाव और सीतापुर में भी वोट डाले जाने हैं। पिछला चुनाव यहां मिश्रित परिणामकारी रहा है और इस बार भी अगर वैसे ही हालात बने तो इसमें अतिश्योक्ति नहीं होगी। 2012 में जिन सात जिलों का भरपूर साथ सपा को मिला था, इस बार भी कुछ वैसा ही होगा, इसकी उम्मीद नहीं के बराबर है। भितरघात का दंश उसे झेलना पड़ सकता है। सरकार के प्रति मतदाताओं के आक्रोश का भी सपा को नुकसान हो सकता है। कांग्रेस और सपा का गठबंधन इन 12 जिलों में साइकिल को कितनी गति देगा, यह तो चुनाव नतीजे के बाद ही पता चलेगा लेकिन कानून व्यवस्था के मुद्दे पर घिरी सरकार को यहां चौतरफा परीक्षा देनी पड़ रही है। लखनऊ में शिया मुसलमान अगर मौलाना कल्बे जव्वाद पर ऐतबार करते हैं तो यह सपा के लिए नुकसानदेह स्थिति होगी। मुसलमानों के मत जितने ही बंटेंगे, सपा उतनी ही मजबूत होगी। आर के चैधरी को जिस तरह भाजपा ने समर्थन दिया है, उससे दलितों के एक बड़े वर्ग का झुकाव भाजपा की ओर हो सकता है और अगर ऐसा होता है तो इससे मायावती और उनकी पार्टी को नुकसान होगा।

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