घर का खर्चा पति संभाले या पत्नी

घर का खर्चा पति संभाले या पत्नी

मेरी माताजी प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका थीं और मेरे पिताजी एक बड़ी दुकान में लेखापाल थे। माताजी की यह आदत थी कि पहली तारीख को जब वेतन मिलता तो पूरा वेतन ला कर पिताजी के हाथों में थमा देतीं। घर का सारा खर्च पिताजी संभालते थे। माताजी को जब कोई छोटी-छोटी घरेलू चीजें खरीदने की जरूरत महसूस होती तो उस का पैसा वे पिताजी से मांग लेतीं। पिताजी पूरे पैसे का, आमदनी और खर्च का इतना विस्तृत लेखा जोखा रखते थे कि उस की लेखा परीक्षा हम बच्चे भी आसानी से कर लेते थे। इस रीति का यह परिणाम हुआ कि घर के खर्चे में बड़ी मितव्यतता बरती जाती। घर के सदस्यों का स्वास्थ्य, बच्चों की शिक्षा जैसी अत्यंत जरूरी बातों को प्राथमिकता और वरीयता दी गई। यद्यपि उन दिनों दोनों का वेतन बहुत कम था तो भी आमदनी के करीब आधे भाग से रोजमर्रा का जीवन कट जाता और बाकी रकम बचा ली जाती। मरते वक्त पिताजी ने मुझ से कहा था एक पैसे का भी कर्जा चुकाना शेष नहीं रह गया है। तुम भी ऐसे जिओ ताकि तुम भी अपनी संतान से मरते वक्त ऐसा कह सको। मेरे सामने ऐसे कई उदाहरण हैं जहां पति अपना और पत्नी का भी पूरा वेतन अपने पास रखकर उसका मनमाना खर्च कर डालता हैं। ज्यादातर पैसे वह शराब पीने में और होटल में चिकन-बिरयानी खाने में उड़ा देता है। पत्नी की सामान्य जरुरतों को भी वह अनदेखा करता है। बार-बार मांगने पर भी वह उसे साड़ी खरीदने का पैसा भी नहीं देता। न ही वह आय-व्यय का कोई लेखा रखता है। रखता भी हो तो पत्नी से उसे छिपाए रखता है। फलत: पति-पत्नी में मनमुटाव होने लगता है। तनाव और खिंचाव इतना बढ़ जाता है कि दोनों एक दूसरे का मुंह भी देखना नहीं चाहते। यहां तक कि पत्नी किसी वकील से परामर्श करके तलाक पाने की दलील सोच लेती है। दूसरी तरफ ऐसी पत्नियां भी हैं, जो अपने वेतन का एक पैसा भी पति महोदय को देना आवश्यक नहीं समझती। उन का मानना है कि दोनों काम कर रहे हैं, दोनों को पारिश्रमिक मिलता है। उस पर उनका अपना अधिकार है। घर का खर्चा दोनों मिल कर वहन करें। बाकी जो बच जाता है, उसे अपने अपने बचत खाते में जमा करें। ऐसी पत्नियां भी कम नहीं हैं, जिनको यदि घर के खर्च का दायित्व सौंपा जाए तो आडंबरों और अनावश्यक मुद्दों को प्राथमिकता और वरीयता दे कर पूरा पैसा महीने की पांच तारीख तक खर्च कर डालती हैं। सख्त जरूरतों की पूर्ति के लिए कहीं न कहीं से ऊंचे ब्याज दर पर उधार लेने के लिए पति महोदय को विवश कर देती हैं। अब आप ही सोचिए, कौन-सा तरीका अच्छा है? 1962 में मेरी शादी जब हुई, तब मेरे एक बुजुर्ग मित्र प्रो. पी. जे. जोसफ जी ने बताया कि ऐसा करो, वेतन का पूरा पैसा पत्नी को दिया करो। पूरा खर्चा वही संभाले। पैसे का लेखा भी रखवाना। वह मितव्यतता सीखेगी। ज़रूरतें कम रखेगी। पैसा बचाएगी। कर्ज लेने की नौबत नहीं आएगी। मैंने उनकी नसीहत का अक्षरश: पालन किया। उन का अनुमान सच निकला।
– के.जी. बालकृष्ण पिल्लै

Share it
Top