घरेलू हिंसा से कब मुक्त हो पायेगी नारी…?

घरेलू हिंसा से कब मुक्त हो पायेगी नारी…?

 भारत में आज भी सामाजिक ताना-बाना ऐसा है जिसमें अधिकांश महिलाएं पिता या पति पर ही आर्थिक रूप से निर्भर रहती हैं तथा निर्णय लेने के लिए भी परिवार में पुरुषों पर निर्भर रहती हैं। महिलाओं को न तो घर के मामलों की निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाता है और न ही बाहर के मामलों में। विवाह से पूर्व वे पिता व विवाह के बाद पति के अधीन रहते हुए जीवनयापन करती हैं हालांकि देश के संविधान में महिलाओं को सदियों पुरानी दासता एवं गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाने के प्रावधान किए गए हैं। आाज 21वीं सदी में भी नारी घरेलू हिंसा से मुक्त नहीं हो पाई हैं। घरेलू हिंसा की घटनायें आदिकाल से लेकर आज तक घटित हो रही हैं। समय के साथ समाज की परिभाषायें अवश्य बदली हैं। आज मानव आधुनिक व वैज्ञानिक होने का दावा अवश्य कर रहा है लेकिन लिंग भेद की मानसिकता से उबर नहीं पाया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने घरेलू हिंसा पर हुए एक अध्ययन में पाया है कि दुनिया में हर छह में से एक महिला को अपने पति या संगी की हिंसा झेलनी पड़ी है। संस्था ने एक अंतरराष्ट्रीय जांच के बाद कहा है कि यह समस्या विश्वव्यापी है जिसकी जड़ें बहुत भीतर तक बैठी हुई हैं। रिपोर्ट कहती है कि महिलाओं के खिलाफ शारीरिक और मानसिक हिंसा का प्रभाव बहुत हद तक एक जैसा रहा है चाहे वो दुनिया में कहीं भी रहती हों। अध्ययन में भारत की स्थिति के बारे में कहा गया है कि यहां लगभग 70 प्रतिशत विवाहित महिलाओं के खिलाफ हाथ उठाए गए हैं। यह भी कहा गया है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ जो हिंसा होती है वह अन्य जगहों से कुछ अलग नहीं है। महिलाओं के लिए घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज उठाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसकी एक बड़ी वजह होती है महिलाओं को घरेलू हिंसा के खिलाफ कैसे शिकायत दर्ज करायी जाए, उसकी सही जानकारी नहीं होती है। भारत में घरेलू हिंसा के खिलाफ घरेलू हिंसा अधिनियम कानून 2005 मौजूद हैं।
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इस कानून के तहत अगर घरेलू हिंसा का शिकार हैं तो आप इसके खिलाफ आवाज उठा सकती हैं और पुलिस में इसकी शिकायत भी दर्ज करा सकती हैं।राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो 2014 के आंकड़े के अनुसार पति और सम्बंधियों द्वारा महिलाओं के प्रति की जाने वाली क्रूरता में 7. 5 प्रतिशत वृद्धि हुई है। घरेलू हिंसा अधिनियम देश का पहला ऐसा कानून है जो महिलाओं को उनके घर में सम्मानपूर्वक रहने का अधिकार सुनिश्चित करता है। इस कानून में महिलाओं को सिर्फ शारीरिक हिंसा से नहीं बल्कि मानसिक, आर्थिक एवं यौन हिंसा से बचाव का अधिकार भी शामिल है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दोगुने से भी अधिक हुए हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के तहत पति और रिश्तेदारों द्वारा किसी भी महिला को शारीरिक या मानसिक रुप से चोट पहुंचाना देश में सबसे अधिक होने वाला अपराध है। आंकड़ों के अनुसार पिछले दस सालों में आईपीसी धारा 498 ए के तहत 909713 मामले या यूं कहें कि हर घंटे 10 मामले दर्ज किये गये है। धारा 354 के तहत किसी भी महिला की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग करना जैसी वारदातें देश में होने वाला दूसरा सबसे अधिक अपराध है। पिछले एक दशक में इस तरह के करीब 470556 मामले दर्ज की गई है। महिलाओं को अगवा एवं अपहरण 315074 करने जैसी वारदातें देश में होने वाला तीसरा सबसे अधिक अपराध है। बलात्कार 243051 , महिलाओं के अपमान 104151 और दहेज हत्या 80833 अन्य देश में सर्वाधिक होने वाले अपराध है। पिछले एक दशक में दहेज प्रतिशोध अधिनियम, 1961 के तहत कम से कम 66,000 मामले दर्ज किये गये हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार इनके अपराधों के अलावा वर्ष 2014 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध में कुछ नई श्रेणियां भी जोड़ी गई हैं। इनमें बलात्कार के प्रयास 4234, आईपीसी की धारा 306 के तहत महिलाओं को आत्महत्या के लिए उकसाना 3734 एवं घरेलू हिंसा से बचाव 426 शामिल हैं।पिछले 10 सालों में आंध्रप्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के सर्वाधिक मामले 263839 दर्ज किए गए हैं। देश भर में महिलाओं की लज्जा भंग करने के सबसे अधिक मामले 35733 आंध्रप्रदेश में दर्ज की गई है जबकि पति या उनके रिश्तेदार द्वारा अत्याचार के मामले 117458 में राज्य दूसरे, लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग करने जैसी वारदात मामले 51376 में तीसरे एवं दहेज हत्या मामले 5364 में चौथे स्थान पर है। आंध्रप्रदेश के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले सबसे अधिक पश्चिम बंगाल में दर्ज 239760 किए गए हैं।
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 पश्चिम बंगाल में सर्वाधिक मामले पति या रिश्तेदारों द्वारा महिलाओं पर किए गए अत्याचार के मामले 152852 दर्ज किये गये है। महिलाओं के खिलाफ अपराध मामले में अपहरण 27371 एवं दहेज हत्या मामले 4891 में पांचवें स्थान पर है। महिलाओं के खिलाफ अपराध के 236456 मामलों के साथ उत्तर प्रदेश तीसरे, 188928 मामलों के साथ राजस्थान चौथे एवं 175593 के आंकड़ों के साथ मध्य प्रदेश पांचवें स्थान पर है। पिछले एक दशक में देश भर में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध में करीब आधे अपराध इन पांच राज्यों में हुई है। पिछले एक दशक में मध्य प्रदेश में सर्वाधिक बलात्कार के मामले 34143 दर्ज किए गए हैं। 19993 मामलों के साथ पश्चिम बंगाल दूसरे, 19894 मामलों के साथ उत्तर प्रदेश तीसरे एवं 18654 आंकड़ों के साथ राजस्थान चौथे स्थान पर हैं। राजस्थान में महिलाओं के साथ यौन हिंसा के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। राजस्थान में पिछले छह माह में अचानक अपराध का आंकड़ा बहुत बढ़ गया है। हालात ये हैं कि प्रदेश में रोज औसतन 10 से ज्यादा दुष्कर्म और 5 हत्याएं हो रही हैं। पिछले छह माह में 778 मामले हत्या और 1772 दुष्कर्म के प्रकरण सामने आए हैं। इसके बावजूद पुलिस का दावा है कि प्रदेश में शांति कायम है। 2014 में राजस्थान में 1637 हत्याओं के केस दर्ज हुए। हत्याओं के मामले में राजस्थान का देश में आठवां स्थान है। वर्ष 2014 में राजस्थान में दुष्कर्म की 3759 घटनाएं हुई। दुष्कर्म की घटनाओं में राजस्थान देश में दूसरे नंबर पर रहा। पिछले साल देश में सबसे ज्यादा धोखाधड़ी के केस 4316 राजस्थान में ही दर्ज हुए।महिलाओं के बिना हम किसी समाज की कल्पना तक नहीं कर सकते। वही समाज का एक मूलभूत अंग होती हैं तो हम यह सब क्यों भूल जाते हैं क्यों उन्हें इस तरह की प्रताडऩा से गुजरना पड़ता है। लिंगानुपात का घटना भी महिलाओं के लिए किसी अपराध से कम नहीं है। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश समेत देश के कई प्रमुख राज्यों में लिंगानुपात बहुत बड़ी समस्या है। इससे हम और आप यही कल्पना कर सकते हैं कि एक दिन भारत में महिलाओं की दयनीय स्थिति हो जाएगी। प्रधानमंत्री द्वारा चलाया गया बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान इस समस्या से निपटने में कारगर सिद्ध हो सकता है और हम सबको इसका समर्थन भी करना चाहिए। महिलाओं पर होने वाले दुष्कर्म जैसे अपराध को रोकने के लिए अपनी और समाज की सोच को बदलना होगा और इस तरह के जुर्म को रोकने के लिए आरोपियों के खिलाफ अपनी आवाज को बुलंद करना होगा।– रमेश सर्राफ धमोरा

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