गोल्ड नहीं रह गई अब ओल्ड लाइफ..बुजुर्गों के लिए बच्चों के पास टाइम ही नहीं..!

गोल्ड नहीं रह गई अब ओल्ड लाइफ..बुजुर्गों के लिए बच्चों के पास टाइम ही नहीं..!

 आधुनिकता और भागमभाग की दौड़ में आज हर कोई खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। इसमें सबसे अधिक संख्या वृद्धों की है। जीवन के सांध्यकाल में जब इन्हें सहारे की आवश्यकता होती है, तब इनके लिए किसी के पास समय नहीं रहता।
सारी जिन्दगी बाल-बच्चों को लायक बनाने में खून-पसीना बहाते-बहाते जिन्दगी के इस पड़ाव पर बुजुर्ग आते हैं तो पता चलता है कि उनके आसपास तो कोई है ही नहीं। जिन बाल बच्चों को उन्होंने गोदी में खिलाया था, जिनके आह भरने मात्र पर वे रात-रात भर जागा करते थे उनके लिए अब वे बोझ बन गये हैं। गाढ़ी कमाई से तिनका तिनका जोड़ कर उन्होंने जिस आशियाने को बनाया था, उस आशियाने में अब बीबी को छोड़कर और कोई साथ में रहने को तैयार नहीं होता।
बच्चे अपनी जिन्दगी में मस्त होते हैं। बुजुर्गों के लिए उनके पास टाइम ही नहीं होता। उनके पास पॉश मोहल्ले में बड़े व आलीशान भवन होते हैं किन्तु उस आलीशान भवन में बीवी के अतिरिक्त और कोई रहने वाला नहीं होता। बूढ़ी पत्नी के साथ जिन्दगी के बचे-खुचे पल बिताते कई ऐसे बुजुर्ग मिल जाते हैं, जो अपनी व्यथा भी दूसरे को नहीं सुना पाते। इनसे जब इनकी जिन्दगी के बारे में पूछताछ की जाती है तो दिल का दर्द इनकी जुबां से फूट पड़ता है।
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वृद्ध अकेले होते हैं। अगर कुछ होता है तो पड़ोसी भले ही काम आ जायें, अपनों को आने तक में काफी समय लग जाता है। दूसरी तरफ बाहरी चोर-उचक्कों का भी खतरा कम नहीं बना रहता। अगर उन्हें अकेले रह रहे वृद्ध की जानकारी मिल गई, तब तो वे किसी भी समय धावा बोलकर चोरी से लेकर हत्या तक कर बैठते हैं। बुजुर्ग हर दिन अपने बेटे-बेटियों के आने के इन्तजार में टकटकी लगाए रहते हैं किन्तु उनकी किस्मत में इंतजार और इंतजार के सिवाय कुछ नहीं हासिल होता। मन हुआ तो कभी बाजार निकल गए तो कभी पुराने दोस्तों से मिलने। यूं ही टाइम पास करनी उनकी मजबूरी बन जाती है। हकीकत यह है कि वृद्धों की सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम ही नहीं होता। या यूं भी कहा जा सकता है कि कोई खास परिपाटी या नियम ही नहीं है। सदियों पहले वाले पुराने स्टाइल पर वृद्ध के लिए एक नौकर को रख दिया जाता है और बच्चे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं।
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अनेक घटनाओं में यह देखा गया है कि नौकर या अपने ही परिजन वृद्ध के खून के प्यासे बन जाते हैं। पुलिस अनुसंधान करती रहती है और हत्यारा घूमता रहता है। इन घटनाओं के मूल में वजह चाहे संपत्ति पर कब्जा जमाकर हत्यारों की करोड़पति बनने की भूख हो या फिर कुछ और, ऐसी हालत में नौकर रखना भी वृद्धों के लिए खतरों से खाली नहीं होता।
बुजुर्गों का एकाकीपन कैसे दूर होगा, उनकी जान की सुरक्षा कैसे होगी? आदि बातों पर विचार करना आज के समय में स्वयं में एक मुद्दा बनता जा रहा है। बच्चे बुजुर्गों को अपने साथ रख नहीं सकते क्योंकि इससे उनकी स्वतंत्रता प्रभावित होती है और वे अपने काम-धन्धे को छोड़कर बुजुर्गों के साथ रह नहीं सकते। ऐसे में बुजुर्गों के दर्द को बांटने का अन्य रास्ता क्या होगा।
– परमानन्द परम

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