गांधी जी के आदर्श

गांधी जी के आदर्श

सच बोलने की प्रवृत्ति के गुण गांधी जी के भीतर बचपन से ही पनपने लगे थे। झूठ बोलना या किसी को धोखा देना उन्हें बिलकुल भी पसंद नहीं था। यह बात उनके बचपन की इस घटना से प्रमाणित हो जाती हैं:-
बात उस समय की है जब गांधी जी हाई स्कूल के प्रथम वर्ष के विद्यार्थी थे।
परीक्षा आरंभ होने को थी। उस समय परीक्षा का ढंग आज के ढंग से अलग था। परीक्षा के समय शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर निरीक्षण करने के लिए विद्यालय मे आये। उन्होंने विद्यार्थियों को अंग्रेजी के पांच शब्द स्लेट पर लिखने के लिए बोले। सभी बालक एक पंक्ति में बैठे उन शब्दों को लिख रहे थे।
स्कूल के शिक्षक महोदय घूमकर अपने सभी विद्यार्थियों की निगरानी कर रहे थे कि उनका कोई विद्यार्थी शब्दों के लिखने में कोई गलती तो नहीं कर रहा है। तभी उनकी दृष्टि गांधी जी की स्लेट पर पड़ गई। उन्होंने देखा कि गांधी जी ने एक शब्द की स्पेलिंग गलत लिख रखी है।
खुशियों के रंग, चूडिय़ों के संग
तभी शिक्षक महोदय ने इशारे से गांधी जी को बताया कि अमुक शब्द गलत लिखा है और इशारों में परामर्श दिया कि वह अपने से आगे वाले विद्यार्थी की स्लेट देखकर भूल सुधार लें लेकिन गांधी जी ने शिक्षक महोदय का दूसरे से नकल करने की सलाह को नहीं माना और चुपचाप बैठे रहे। उन्हें झूठ और कपट का सहारा लेना बिलकुल पसंद नहीं था।
गांधी जी की सच्चाई ने उन्हें एक दिन महापुरूष बना दिया।
– परशुराम संबल

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