गर्भधारण एवं हृदय रोग

गर्भधारण एवं हृदय रोग

pregnancyगर्भवती महिला जो हृदय रोग से पीडि़त है, जब तक वह किसी प्रकार की तकलीफ की शिकायत नहीं करती, तब तक वह चिकित्सक के लिए कोई चिंता का विषय नहीं मानी जाती। जब महिला की श्वासों की गति तेज हो चले, नाड़ी तेज और कई प्रकार से अनियंत्रित हो जाती है या उसे अत्यधिक थकावट महसूस हो, तब उसे यह सोचना चाहिए कि हृदय रोग अपनी प्रगति पर है जिससे शरीर में सूजन आ जाती है, गले की नसें फूल जाती हैं तथा कभी-कभी होंठ नीले होने लगते हैं। खांसी में खून भी आने लगता है तथा पेशाब में खराबी प्रारंभ हो जाती है।
हृदय रोग से पीडि़त गर्भवती महिला की सबसे खतरनाक स्थिति शिशु पैदा होने के समय उत्पन्न होती है क्योंकि उस समय नारी को बहुत कष्ट और पीड़ा के दौर से गुजरना पड़ता है जिसके लिए कभी-कभी हृदय असमर्थ हो जाता है और हृदय गति बंद हो जाती है। अमेरिका हृदय संस्थान के विशेषज्ञों ने इस प्रकार के हृदय रोग की बीमारियों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया हैं:-
1. प्रथम श्रेणी में वे गर्भवती महिलाएं आती हैं जिन्हें हृदय रोग तो होता है परन्तु उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती।
2. दूसरी श्रेणी में वे महिलाएं आती हैं जिन्हें अधिक काम करने से श्वास तीव्र हो जाती हैं।
3. तृतीय श्रेणी की महिलाएं यदि थोड़ा भी चलें तो उनकी श्वास फूल जाती है।
4. चतुर्थ श्रेणी की महिलाओं की श्वास सदैव तेज चलती रहती है तथा वे हार्ट फेल की स्थिति में रहती हैं। महिलाओं की इस स्थिति के काफी भयंकर परिणाम होते हैं। चिकित्सा विज्ञान की निरंतर प्रगति के फलस्वरूप यद्यपि हृदय रोग से पीडि़त गर्भवती महिलाओं की मृत्यु-दर में तो कमी आई है, फिर भी 1 से 2 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं इस रोग से पीडि़त पाई गई हैं जिनमें 2 से 3 प्रतिशत तक काल के गाल में समर्पित हो जाती हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं, बचपन में जोड़ों के दर्द और बुखार, हृदय में जन्मजात खराबी, जल-ग्रंथि के विकार, उच्च रक्तचाप और कमर तथा छाती की हड्डियों का टेढ़ा मेढ़ा होकर हृदय पर दबाव डालने के परिणामस्वरूप होता है। हृदय रोग आज उतना असाध्य नहीं रह गया है जितना कुछ वर्षों पूर्व था। चिकित्सा विशेषज्ञों के सहयोग से हृदय रोग से पीडि़त महिलाएं भी औषधियों व नियम संयम के आधार से अपनी जीवनचर्चा को सुधार कर सामान्य जीवन व्यतीत कर सकती हैं। हृदय रोग के भय से मुक्त रहने के लिए रोगी को आध्यात्मिक साधना व ईश्वरीय शक्ति पर भी आस्था रखनी चाहिए। इससे उसका मनोबल उच्च व दृढ़ होता है जो उसको स्वस्थ बनाए रखने में सहायक होता हैं।
गर्भधारण करने वाली महिलाओं को सदैव प्रसूति पूर्व चिकित्सा केन्द्रों के संपर्क में रहना चाहिए और ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि प्रसूति किसी ऐसे चिकित्सालय में हो जहां हृदय रोग विशेषज्ञ और इससे संबंधित सभी जांच की सुविधाएं उपलब्ध हों। ऐसी महिलाओं की संतान को संक्र ामक बीमारियों से मुक्त रहने के लिए टीके लगवाए जाने चाहिए और इनका उद्देश्य कम से कम संतानोत्पत्ति होना चाहिए।
इस प्रकार रोगों से प्रारंभिक बचाव की सुविधा दी जाए तो बहुत हद तक गर्भधारण करने वाली महिलाओं को हृदय रोगों से बचाया जा सकता है।
अर्पिता तालुकदार

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