गरीबों के लिए शौचालय बना फंदा

गरीबों के लिए शौचालय बना फंदा

खुले में शौच करने वाले आज स्थानीय निकायों की आमदनी का एक बड़ा जरिया बन गए हैं। पंचायतों से ले कर नगर निगमों तक ने फरमान जारी कर दिए हैं कि जो भी खुले में शौच करता पाया जाएगा, उससे जुर्माना वसूला जाएगा। यह जुर्माना राशि 50 रूपए से ले कर 5 हजार रूपए तक है। नगर निगम, नगर पालिकाएं, नगर पंचायतें और ग्राम पंचायतें रोज खुले में शौच करने वालों से जुर्माना वसूलते अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं।
जो लोग जुर्माना नहीं भर पा रहे हैं, उनके खिलाफ तरह-तरह की दिलचस्प लेकिन चिंताजनक कार्यवाहियां की जा रही हैं। इन्हें देख लगता है कि देश में लोकतंत्र और उसे ले कर जागरूकता नाम की चीज कहीं है ही नहीं। इन परिस्थितियों को देख ऐसा लगता है कि खुले में शौच करने वालों को जागरूक नहीं बल्कि जलील किया जा रहा है।
खुले में शौच से लोगों को रोकने के लिए सरकारी मुलाजिम किस कदर मनमानी करने पर उतारू हो गए हैं, यह अब आए दिन उजागर होने लगा है। स्वच्छ भारत अभियान अब एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर जा पहुंचा है जिसके शिकार वे गरीब दलित ज्यादा हो रहे हैं जिनके यहां शौचालय इसलिए नहीं हैं कि उनका कोई अपना घर ही नहीं है।
जिन गरीबों के पास अपने घर हैं भी, तो उन्हें मजबूर किया जा रहा है कि वे जैसे भी हो, पहले घर में शौचालय बनवाएं जिसके पीछे छिपी मंशा यह है कि जिससे गांव-देहातों के रसूखदार लोगों को बदबू व बीमारियों का सामना न करना पड़े। यह हर कोई जानता है कि अधिकांश एकदम गरीबों के पास रहने को पक्के तो दूर, कच्चे घर भी नहीं हैं, इसलिए वे खुले में शौच करने को मजबूर होते हैं। ऐसे में इसे जुर्म मानना उनके साथ नाइंसाफी नहीं तो क्या है?
शौचालय बनवाने के नाम पर हर जगह हेर-फेर और घोटाले सामने आने लगे हैं तो लगता है कि भ्रष्टाचार और मनमानी का लाइसेंस सरकारी मुलाजिमों के साथ उन दबंगों को भी मिल गया है जिनका समाज पर खासा दबदबा है। ये दोनों मिल कर शौच के नाम पर कार्यवाही नहीं बल्कि गुंडागर्दी कर रहे हैं। दिक्कत यह है कि कोई इनके खिलाफ आवाज नहीं उठा रहा। लोगों का पहला अहम काम जुर्माने और सजा से खुद को बचाना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने सरकारी अफसरों व मुलाजिमों के हाथ में एक कानूनी डंडा थमा दिया है जिसके आगे दूसरे हथियार ज्यादा दिनों तक टिक पाएंगे, ऐसा लगता नहीं क्योंकि खुले में शौच पर जुर्माने की रकम अब मजिस्ट्रेटों के जरिए वसूली जाएगी। अगर जुर्माने की राशि नकद नहीं भरी गई तो शौच करने वालों की जमीन-जायदाद कुर्क करने का हक भी सरकार को है। जिसके पास जमीन-जायदाद नहीं होगी, उसे जेल में ठूंस दिया जाएगा।
देशभर में सरकारी मुलाजिम शौच की आड़ में गरीब, दलित और पिछड़ों पर तरह- तरह के जुल्म ढा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का राज है वहां ऐसा ज्यादा हो रहा है। कुछ पीडि़तों को 1975 वाली इमरजैंसी याद आ रही है जब गरीब नौजवानों को पकड़-पकड़ कर उनकी नसबंदी कर दी गई थी।
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होना तो यह चाहिए था कि प्रशासन हर जगह लोगों में पल्स पोलियो मुहिम की तरह जागरूकता पैदा कर खुले में शौच के नुकसान गिनाकर लोगों को उनकी सेहत के बाबत आगाह करता, उन्हें शौचालय में शौच करने के फायदे गिनाता पर हो उलटा रहा है। सरकारी तंत्र 1975 की तरह बेलगाम हो कर कार्यवाही कर रहा है जिसकी बड़ी गाज गांव- देहातों के गरीबों, दलितों और पिछड़ों पर गिर रही है।
आजादी के समय देश की 70 फीसदी आबादी खुले में शौच के लिए जाती थी। इसमें से अधिकतर लोग दलित, पिछड़े और आदिवासी होते थे। हालात अब और बदतर हैं। अब खुले में शौच जाने वाले 90 फीसदी लोग इन्हीं जातियों के हैं। इन्हें आज कानून के नाम पर तंग किया व हटाया जा रहा है।
यह कड़वा सच आजादी के बाद आज तक कायम है कि अभी भी 85 फीसदी दलित गरीब ही हैं जो झुग्गी-झोंपड़ी बना कर रहते हैं। पढ़े-लिखे होने के बावजूद ये शौचालय की अहमियत नहीं समझते थे। अब आरक्षण के जरिए जो लोग सरकारी नौकरी पा गए हैं, वे घरों में शौचालय बनवा रहे हैं। इस सच का एक दूसरा पहलू यह है कि वे घर बनाने लगे हैं।
स्थानीय निकायों को ऐसे नियम, कायदे व कानून बनाने के हक होने चाहिए कि नहीं, यह अलग और बड़ी बहस का मुद्दा है पर प्रधानमंत्री को खुश करने की होड़ में यह कोई नहीं सोच रहा कि जिसकी जेब में जुर्माना देने लायक राशि होती, वह भला खुले में शौच करने जाता ही क्यों। यह मान भी लिया जाए कि कोई आठ-दस फीसदी लोगों की खुले में शौच करने की ही आदत पड़ गई है जबकि उनके घर पर शौचालय हैं तो इसकी सजा बाकी 90 फीसदी लोगों को क्यों दी जा रही है?
– नरेंद्र देवांगन

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